नंदकिशोर नंदन
पच्चीस वर्षीय हरिया मुंडा आज यह सोच कर बंसी लेकर जलाशय के किनारे मछली मारने बैठा था कि वह अधिक से अधिक मछली मारेगा। गहरा काला रंग, छोटी-छोटी आंखें, छोटे-छोटे कान, पतली नुकीली नाक और मोटे होंठ। समूची देह पर एक पतली-सी लुंगी, जो किसी तरह उसके घुटने तक पहुंच रही थी। शायद उसे कभी इतने पैसे नहीं हुए कि वह एक गंजी भी खरीदता। वह इतना दुर्बल था कि उसकी छाती की सारी हड्डियां गिनी जा सकती थीं। उसने बंसी के कांटे में चारा लगाते हुए सोचा। आज उसे कम से कम दस किलो मछली मारनी होगी। तब जाकर कहीं बीमार मां के इलाज लायक पैसा होगा। बारह बजते-बजते इतनी मछली तो हो ही जाएगी। आज इतवारी हाट भी है। देखते-देखते सारी मछलियां बिक जाएंगी।
तभी उसे खयाल आया, पिछले कई दिनों से तीन-चार किलो से अधिक मछली कभी नहीं हो पाई। हरिया ने पानी में बंसी डालने से पहले सुबह के लालिमा भरे आकाश की तरफ प्रार्थना भरी आंखों से देखा। हे ईश्वर! आज जरूर कम से कम दस किलो मछली हो जाय। उस दिन समद चाचा ने कहा था- इस पोखर में तो एक-एक मछली पांच-पांच किलो की है। मारनेवाला होना चाहिए। मैं इसी पोखर से एक बार में बीस-बीस किलो मछली ले गया हूं। हरिया ने मन ही मन कहा- देखना चाचा, आज मैं भी कम से कम दस-बारह किलो मछली जरूर मारूंगा। विस्मय कि कांटा पानी में डालने के बाद आज उसे कोई ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। दो-तीन मिनटों के बाद ही बंसी का तंदुला डूबने लगा। शुरुआत अच्छी है। शायद ईश्वर ने उसकी प्रार्थना सुन ली है।
तंदुला डूब गया तो उसे महसूस हुआ, जरूर कोई बड़ी मछली फंसी है। उसने पूरी ताकत लगा कर झटके के साथ बंसी को खींचा तो मछली की जगह कांटे में ढाबुस फंसा देख कर उसे जोर का आघात लगा। बाहर जमीन पर कांटे में फंसा मेढक दर्द से छटपटा रहा था। उसे अपनी किस्मत पर तरस नहीं, गुस्सा आ गया। छोटी मछली भी नहीं, बड़ा-सा ढाबुस! उसने उसे पास के पत्थर पर पटक कर मार देने के खयाल से अपनी तरफ खींचना चाहा कि उसे दर्द से छटपटाती अपनी मां का चेहरा याद आ गया। ओह! यह मैं क्या करने जा रहा हूं। उसके जबड़े में कांटा फंसा है और खून भी बह रहा है। फिर बचपन में मां ही तो कहती थी- मेढक को कभी मत मारना, नहीं तो कान दुखने लगेगा। उसने जल्दी से मेढक के जबड़े में घुसा कांटा निकाला और बड़े इत्मीनान से उसे पोखर के किनारे पानी में छोड़ दिया। वह उसे पानी में रेंगकर जाते हुए देखता रहा। जब वह किसी तरह ओझल हो गया तो हरिया को खयाल आया उसे ज्यादा से ज्यादा मछली मारनी है।
हरिया ने फिर से कांटे में चारा लगाया और उसे पानी में डाल कर मछली फंसने का इंतजार करने लगा। जाने कैसे उसे बाप का चेहरा याद आने लगा। बाबू जिंदा था, तब वह कितना आजाद था? न मछली मारने की चिंता थी, न हाट में उसे बेचने की झंझट। दिन-दिन भर साथियों के साथ जंलग-जंगल, पहाड़-पहाड़ घूमता-फिरता था, धमाचौकड़ी मचाता चलता था। सांझ को कभी-कभार थोड़ी-बहुत सूखी लकड़ी ले गया तो ले गया। बिलकुल पंछी की तरह आजाद था। उसे याद आया, जब इलाके में कोई दारू की दुकान नहीं थी तो हम कितने चैन से थे। जब शहरी लोग आकर यहां बसने लगे तो पहले शराब की छोटी-मोटी दुकानें खुलीं, उसके बाद तो…।
बाबू को एक शहरी साहब की संगत में पीने की लत लग गई। रोज रात को कभी देशी ठर्रा तो कभी हड़िया पीकर आने लगा और आकर घर में हल्ला-गुल्ला करने लगा। मां जब कभी उसे न पीने की कसमें दिलाती, तो बाबू और अधिक बमक उठता और मां को लात-मुक्कों से पीटने लगता था। वह कभी-कभी उसे इतनी बेरहमी से पीटता था कि पीटते समय यह भी भूल जाता था कि वह उसकी पत्नी है, जिसके साथ उसने अभावों में भी जीते हुए कुछ सुख पाया है। शराब पी-पीकर मरने से पहले उस रात मां ने इतना ही तो कहा था, ‘शराब क्यों पीते हो? इतने लोग हर दिन जहरीली शराब पीकर मरते हैं। तुम्हें कुछ हो गया तो मुझे कौन देखेगा?’ बाबू ने उसे इतना पीटा कि वह तो खुद बेदम होकर गिर ही गया, मां पिटाई के असह्य दर्द से गिरी, सो कभी उठने-बैठने लायक भी न रही।
उस पर यह विपत्ति कि खाली पेट जहरीली शराब पीते रहने के कारण बाबू भी एक दिन टें बोल गया। एक तो मां का बुखार-दर्द से टूटा शरीर, उस पर पति का चले जाना। हरिया दर्द से कराहती हुई मां के बारे में सोचते हुए यह भी भूल गया कि वह अपने गांव सोनारी से तीन किलोमीटर दूर पोखर में मछली मारने बैठा है और जितनी ज्यादा मछली मारेगा, उतना ही अधिक पैसा होगा, जिससे वह शहर के बड़े डॉक्टर से मां का इलाज कराएगा। उसने जलाशय के जल पर तैरते तंदुले पर निगाह डाली और ईश्वर से फिर प्रार्थना की कि बड़ी मछली फंसे। कुछ ही मिनटों बाद तंदुआ पानी में डूब गया। उसने बंसी खींचनी चाही।
कुछ अधिक बड़ी मछली फंसी है- ऐसा उसने महसूस किया, इसलिए उसने तुरंत दूसरी बार जोर लगा कर बंसी खींची तो एक बड़ी-सी मछली पानी से बाहर कांटे में फंसी छटपटाती जमीन पर आ गिरी। उसने उसे कांटें से छुड़ा कर मिट्टी की बड़ी-सी हाड़ी में रखना चाहा, पर मछली कई बार उसके हाथ से छूट कर जमीन पर आ गिरी और तड़पी। उसके जबड़े से लगातार खून बह रहा था। हाथ में पहली दफा मछली आई तो उसने अंदाजा लगाया- वह डेढ़-दो किलो से कम की नहीं रही होगी। कई बार के प्रयास से ही वह उस मछली को हाड़ी के पानी में रख कर उपर से ढक्कन लगाने में सफल हुआ। अब वह दुगने उत्साह से भर गया था। उसने कांटे में चारा लगा कर उसे पानी में डाल दिया और गुनगुनाने लगा- ‘जंगल का राजा है तेरा नाम/ खून-पसीना तूने बहाया/ काली माटी में सोना उगाया/ भूस्वामी खाता है मलाई-रोटी/ लेकिन राजा दे तुझे चालव की कांजी/ तेरी मिहनत का इतना ही दाम…’
गाते-गाते हरिया दिवास्वप्न में खो गया। वह दो-तीन दिनों में बहुत अधिक मछलियां मारता और बेचता है। उससे उसे इतने रुपए हो जाते हैं कि वह अपनी बीमार मां को अपने गांव सोनारी से चालीस किलोमीटर दूर स्थित सरगुजा के लिए पहाड़ी-पथरीली सड़क पर एक खटारा बस में ले जा रहा है। मां उसकी जांघ पर सिर रखे दर्द से कराह रही है। ‘मां! अब दो घंटे में ही डॉक्टर साहब के पास पहुंच जाएंगे। फिर तो तुम उनकी दवा से जल्द ही ठीक हो जाओगी।’ हरिया रह-रह कर आंखें खोलती-बंद करती मां से कह रहा है। मां एक-दो शब्द भी बोलने की शक्ति खोती जा रही है। उसे क्या पता कि आदमी की आवाज की शक्ति या क्षीणता भी उसकी शारीरिक अवस्था का परिचय देती है। मां की बिगड़ती हालत देख कर वह बस के कंडक्टर से बार-बार पूछता है, जो कान में पंसिल खोंसे हर पांच मिटन पर यात्रियों को चढ़ाता-उतारता और टिकट बना कर देता जा रहा है। वह उसके सवाल से एकदम तटस्थ है। तभी हरिया चीख कर पूछता है- ‘बस सरगुजा कब पहुंचेगी, हुजूर? मेरी मां बहुत बीमार है। उसे बड़े डॉक्टर से दिखाना है।’
‘क्या हल्ला मचा रहा है? बस अपने वक्त से पहुंचेगी।’ बस के कंडक्टर ने उसे इतने तेज स्वर में डपट दिया कि वह बिल्कुल डर गया। उसने अपनी जांघ पर पड़ी मरणासन्न मां को देखा, तो वह धीरे-धीरे सुबकने लगा। कितने कठोर हैं लोग! कहीं कोई मेरी परेशानी बांटने वाला नहीं है। अगर मेरे ही गांव के आसपास अच्छा अस्पताल या कोई अच्छा डॉक्टर होता तो मां को इस हालत में सरगुजा लेकर क्यों आता? यह आजादी हम गरीबों के लिए नहीं है?
एक घंटे के बाद बस सरगुजा पहुंचने ही वाली थी। यही कोई सात-आठ किलोमीटर की दूरी रह गई होगी। एक छोटे-से कस्बे के पास बस रुक गई।
‘आइए, आइए डॉक्टर साहब! हो गई ड्यूटी?’ बस कंडक्टर ने बस का दरवाजा खोलते हुए कहा- ‘आप अभी ही तो गए थे?’
‘अरे भाई, ड्यूटी क्या है? महीने में दो-तीन दिन चला जाता हूं स्वास्थ्य उपकेंद्र में।’ कह कर हंसते हुए डॉक्टर ने बस में चारों तरफ निगाह दौड़ाई- ‘कहां बिठाओगे?’
‘बिठाता हूं न सर!’ कहते हुए बस के कंडक्टर ने हरिया के पास पहुंच कर कहा- ‘बुढ़िया का पैर समेटो।’
हरिया के पास वाली सीट पिछले बस-स्टॉप पर खाली हो गई थी। हरिया ने कंडक्टर और डॉक्टर दोनों की तरफ अत्यंत कातर निगाहों से देखा-मानो कह रहा हो- तनिक तो रहम करो। कैसे समेटूं अपनी बीमार मां के पैर। वह बहुत तकलीफ में है। उसने मां के पैर उस खाली सीट तक पहुंच रहे थे। डॉक्टर साहब को बिठाने में हो रही देरी से झल्लाए बस-कंडक्टर ने खुद ही आगे बढ़ कर उसकी मां के पैरों को बड़ी बेरहमी से हरिया की तरफ मोड़ कर डॉक्टर साहब को खाली सीट पर बिठा दिया, लेकिन हरिया की मां दर्द से कराह उठी। कहरने की आवाज अत्यंत क्षीण हो चुकी थी।
‘इस मुर्दा को कहां ले जा रहे हो?’ डॉक्टर ने रूमाल से अपनी नाक ढंकते हुए अत्यंत घृणा और बेरुखी से कहा। तो क्या मेरी मां मर गई? हरिया विकलता के साथ चीख उठा- ‘मां! मां!! आंखें खोलो मां।’ मां ने आंखें तो नहीं खोलीं, पर उसने महसूस किया- मां की नब्ज चल रही है। उसने गुस्से से डॉक्टर की तरफ देखा। डॉक्टर का चेहरा बिलकुल भावहीन था। हरिया को सहसा अपने गांव का साथी सुकना याद आने लगा, जो उसे तीन साल पहले सरगुजा के जंगल में कंधे पर बंदूक लिए मिल गया था। वह कस्बे के बाजार में सूखी लकड़ियां बेचने के लिए जंगल से निकल रहा था, तो सुकना ने ही उसे पुकारा था। वह सुकना को कंधे पर बंदूक लटकाए देख कर डर गया था। उसने कहा था, ‘तुम यह क्या कर रहे हो? मारना-मरना अच्छी बात नहीं है।’
‘क्या कर रहा हूं? यह तुम पूछते हो? जरा अपनी हालत देखो।’ सुकना ने उसे अपने हाथ में बंदूक लेने की अंतर्वेदना से अवगत कराना चाहा था- ‘हमारा जंगल, जमीन सब कुछ लूट कर हमें कंगाल बना कर अमीरों का घर भरने वाली इस जालिम व्यवस्था से लड़ने के सिवा कोई रास्ता नहीं है। तिल-तिल कर मरने से बेहतर है जालिमों से लड़ते हुए मर जाना।’ तब हरिया ने उसे हिकारत से देखा था, बल्कि सिर पर लकड़ियों का गठ्ठर उठा कर आगे चलते हुए थूक दिया था- हत्यारा कहीं का! ‘उतरो, सरगुजा आ गया। जल्दी उतरो।’ कंडक्टर हल्ला करने लगा। वह मां को उठा कर बस से नीचे लाना चाहता था, लेकिन उसने देखा कि मां मर चुकी है। वह जोर-जोर से चीखते हुए दिवास्वप्न से बाहर आ गया। वह मां की मृत्यु के सपने से इस कदर आहत हो उठा कि हाड़ी में पड़ी मछलियां और बंसी वहीं छोड़ कर तूफान की गति से घर की तरफ दौड़ गया।
हरिया दौड़ते-हांफते हुए झोपड़ी के अंदर गया- उसकी आंखों में मां को जीवित देखने की आकुलता भरी थी। वहां उसने जो देखा, वह बिलकुल पत्थर हो गया। मां के मुंह से झाग निकल रहा था और चेहरे पर मक्खियां भिनभिना रही थीं। हरिया के अंदर अब मां की मृत्यु से उपजी न कोई वेदना थी और न ही मां का इलाज न करवा पाने का कोई पछतावा। वह धधकती हुई आग में रूपांतिरत हो गया था। उसे वही घना जंगल और कंधे पर बंदूक टांगे सुकना बार-बार याद आने लगा।
