शंभु गुप्त
1. समय की कवायद में
सचमुच जिंदगी कितनी बहुवचनीय है
मैं दंग हूं
वाक्य में प्रयुक्त होते ही शब्द
किस कदर व्यंजक हो जाते हैं
यहां तक कि विरुद्धार्थवाही
मैं दंग हूं
दंग मैं इसलिए भी हूं कि
आदमी के वाग्यंत्र से निस्सृत शब्दों के अर्थों का
उनकी मुख-मुद्राओं से तालमेल खत्म है
पता नहीं यह कैसे होता है कि जब मैं
बोल रहा होता हूं शर्म
मेरी आंखें गर्व से दिपदिपा रही होती हैं
पता नहीं यह भाषा का कौन-सा अर्थविज्ञान है कि
जब मैं मुक्ति कहता हूं
मेरी आंखें गुलामी के आनंद के एक अंतरराष्ट्रीय ख्वाब में
खोने लगती हैं
पता नहीं इन दिनों ऐसा क्या हुआ है मित्रो!
मैं हंसता हूं तो अंदर ही अंदर
किसी षड्यंत्र पर भी काम कर रहा होता हूं
और जब रोता हूं
तो वह भी मेरी किसी योजना का हिस्सा होता है
देखो मित्रो!
समय की कवायद में
मेरे कदम
कितने सधे पड़ रहे हैं।
2. दोनों पक्षों से परे
इस झगड़े को
आगे बढ़ाना है मुझे
सहेजना है
जतन से
इसमें मेरा भविष्य
छुपा है
ये नीम पत्तियां
बेहद कड़वी हैं
पर कितनी तो
मीठी हो आती हैं ये
पच कर
एक सिक्का नाचता है
धरा पर
पहलू बदलता हुआ
इसके दोनों ही पक्षों से
परे है
इसका मूल्य।

