नीरज नीर

नदी नहीं चाहती है
दर्पण होना
मटमैली होना उसका
गौरव है
उर्वर गर्भ की निशानी
प्रमाण उसके जीवित होने का
नदी नहीं चाहती है एकाकी बहना
छोटी छोटी अंगुलियों को
अपने हाथों में थामे
छोटों को साथ लेकर चलना
बड़े में समाहित हो जाना
उसका आनंद है
कई कोणों से
जहां से आगे जाना मुमकिन नहीं होता
नदी बदल लेती है रास्ता
वह जानती है हठ का मतलब
विनाश होता है
नदी हठ करना नहीं चाहती
बहना उसकी मूल प्रकृति है
प्रेम की भी मूल प्रकृति है
बहिस्रावित होना
संताप और संत्रास से पीड़ित मानस को
संतृप्त करना और आप्लावित कर लेना
किसी स्त्री की तरह
नदी स्त्री है
और स्त्री प्रेम।