प्रतापराव कदम
किसका दुख
एल्यूमीनियम की भगोनी में
जले दूध की कालिख-सा दुख
रगड़ता हूं पत्थर से
निशान छोड़ जाता है
आती है जिस्म पर खरोंच
लकीर-सी दिखती है
इस लकीर को मिलाता हूं
छठी देवी ने जो लकीर खींची हाथों पर
कोई साम्य नहीं,
मिलाता हूं
चेहरे पर खींच आई लकीरों से
मिलती नहीं, खरोंच की लकीर
मेरे चेहरे की, कपाल की झुर्रियों से…
यह किसका दुख मांड दिया मेरे माथे
यह खरोंच नहीं मेरे हिस्से की
न यह दुख।
चार दिन
चार दिन मोहलत के
उसी में निपटाने सब काम
भीतर बाहर खरा होना उसमें
पड़ोसी की भी लेनी खैरखबर
जिनसे बिगाड़ है कोशिश करना सुधरे
जिनसे सुधरे हैं उनसे हो जाए घनिष्ठ
घनिष्ठ इतने रहा न जाए बगैर उनके
और मोहलत खत्म होने पर रहे संतोष
जिए भरपूर नहीं कोई कोर-कसर
प्रेम से कहना तेरी बदौलत मांगी मोहलत
ऋण जिनका उनसे मिलने जाना, कहना
इस जनम में तो नहीं हो पाए उऋण अगले में
लाठी भांजते से कहना लाठी बनो किसी की
हंसी से कहना रहो दिनों साथ
गुस्से को गरियाना
वजह पर चूके नहीं बेवजह नहीं फटके पास
चार दिन की मोहलत
उसी में निपटाने तमाम काम।

