लुई ब्रेल- जन्म : 4 जनवरी, 1809
निधन : 6 जनवरी, 1852
लुई ब्रेल फ्रांसीसी शिक्षक और आविष्कारक थे। उन्होंने नेत्रहीनों के पढ़ने-लिखने की प्रणाली यानी ब्रेल लिपि का आविष्कार किया था। उनका जन्म फ्रांस की राजधानी पेरिस से चालीस किमी दूर कूपर गांव में हुआ था। लुई के पिता शाही घोड़ों के लिए काठी बनाने का काम करते थे। लुई चार भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। वे महज तीन साल के थे, जब एक दुर्घटना में उनके आंखों की रोशनी चली गई। इसके बाद छड़ी के सहारे ही उनका जीवन चलने लगा।
चार्ल्स बार्बियर से मुलाकात
लुई जब दस साल के हुए तब उनके पिता ने उन्हें पेरिस के रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ में पढ़ने भेज दिया। यह उस समय का जाना-माना संस्थान था, जहां नेत्रहीनों को शिक्षित किया जाता था। लुई इतने होनहार थे कि उन्होंने जल्द ही शैक्षिक और व्यावहारिक ज्ञान सीख लिया। इसके चलते उनकी चर्चा होने लगी और उन्हें फ्रांसिस सैनिक चार्ल्स बार्बियर से मुलाकात का मौका मिला। चार्ल्स ने सैनिकों द्वारा अंधेरे में पढ़ी जाने वाली नाइट राइटिंग और सोनोग्राफी के बारे में लुई को बताया। यह लिपि कागज पर उभरी हुई होती थी और बारह बिंदुओं पर आधारित थी। लुई ने इसे उपयोगी समझा और जल्द ही इसे भी सीख लिया। सीखने के दौरान उन्हें इसकी खामियों को जाना और इसे दूर करने के इरादे से प्रयोग करना शुरू कर दिया।
ब्रेल लिपि का आविष्कार
महज पंद्रह साल की उम्र में लुई ने चौंसठ अक्षरों वाली एक कोड प्रणाली विकसित की। यह प्रणाली केवल छह बिंदियों पर आधारित थी, जिसके तीन बिंदु एक लाइन बनाते थे और विभिन्न बिंदु से विराम चिह्न को बनाया जाता था। इस प्रणाली में छह बिंदुओं का इस्तेमाल कर चौंसठ अक्षर और चिह्न बनाए और उसमें विराम चिह्न, गणितीय चिह्न के अलावा संगीत के नोटेशन भी लिखे जा सकते थे, इसे ब्रेल लिपि कहा गया। लुई ने 1824 में इस लिपि का आविष्कार कर नेत्रहीन लोगों की शिक्षा में क्रांति ला दिया। आज दुनिया के लगभग सभी देशों में इस लिपि का इस्तेमाल नेत्रहीनों द्वारा किया जाता है।
शिक्षक के रूप में
बाद में लुई ब्रेल को उसी संस्थान में शिक्षक के रूप में नियुक्ति दी गई। व्याकरण, भूगोल, गणित में उन्हें महारत हासिल थी। शुरुआत में लुई को अपने काम के लिए उपेक्षा का सामना करना पड़ा। उनके जीवनकाल में ब्रेल लिपि को मान्यता नहीं मिली और उनके निधन के लगभग सोलह साल बाद यानी 1868 में रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड यूथ मान्यता प्रदान की। लुई ने अपना पूरा जीवन इस प्रणाली को परिष्कृत और विस्तृत करने में लगा दिया। लुई को संगीत में काफी दिलचस्पी थी और वे कई तरह के यंत्र भी बजा लेते थे।
सम्मान
दुनिया भर के दृष्टिहीनों के जीवन में उजाला लाने के लिए लुई ब्रेल को न सिर्फ फ्रांस, बल्कि दुनिया भर में ख्याति मिली। 2009 में 4 जनवरी को जब लुई ब्रेल के जन्म को दो सौ वर्षों का समय पूरा हुआ तो भारत ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। इतना ही नहीं, लुई की मृत्यु के सौ वर्ष पूरे होने पर फ्रांस सरकार ने दफनाए गए उनके शरीर को बाहर निकाला और राष्ट्रीय ध्वज में लपेट कर पूरे राजकीय सम्मान से दोबारा दफनाया।
निधन : 6 जनवरी, 1852 को मात्र तंैतालीस साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
