होली मनाने को लेकर पिछले कुछ बरसों में एक अच्छी पहल यह हुई है कि रंग खेलने के नाम पर पानी की बर्बादी के प्रति लोग लगातार जागरूक हो रहे हैं। सोशल मीडिया में ‘सेफ होली’ का हैशटैग अब ‘ग्रीन होली’ की सामूहिक पहल तक पहुंच गया है। एक लोकपर्व के बहाने पानी से मनमानी पर रोक की चाह अगर लोगों के बीच स्वाभाविक तौर पर बढ़ी है तो यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि लाख खतरों के बावजूद हम अब भी लोक के सर्वथा लोप के खतरे तक नहीं पहुंचे हैं।

इस साल देश के कई हिस्सों में फगुनाहट का स्वागत बारिश की फुहारों ने किया है। वैसे फगुनाहट खुद में एक आगाह है पानी के साथ मनमानी करने से बचने का। गरमी का चढ़ता पारा पूरी दुनिया में हर साल रेकॉर्ड ही नहीं तोड़ रहा बल्कि सबक भी दे रहा है कि पानी से दूर होना जीवन से दूर होना है। प्राकृतिक रंग-गुलाल की तरफ होली का लौटना, बहुत कुछ कहता है। यह बताता है कि लोक और परंपरा से खिलवाड़ महज एक सांस्कृतिक स्फीति नहीं बल्कि यह हमारे जीने की सहूलियत को भी हमसे छीन लेगा। यही नहीं, इस खिलवाड़ के साथ जिस सामाजिक-सांस्कृतिक सलूक को बढ़ावा मिल रहा है, उसमें न तो हमारे आपसी सौहार्द के लिए कोई जगह होगी और न ही प्रकृति के साथ हमारा सुरक्षित साथ टिकाऊ रह पाएगा।

राग के साथ फाग
वाटर फन और वाटर पार्क के दौर में समय और समाज के बीच पानी और मनमानी का एक नया आवेगी सिलसिला आकार ले रहा है। इस सिलसिले को संजीदगी से समझने और पढ़ने की दरकार है। पानी की बर्बादी का बाजारू खेल भले नया हो, पर संस्कृति और समाज के साथ पानी का साझा पुराना है। होली इस साझे को उत्सवी बनाता है। लिहाजा यह उत्सव पानीदार बना रहे, यह एक बड़ी दरकार है। दरअसल, उपभोग की संस्कृति ने प्रकृति के दोहन के प्रति दुनिया को जिस तरह निर्मम बनाया है, वह असंवेदनशीलता हमें अपनी ही संस्कृति से काफी दूर ले गई है।

वह दौर गया, जब रिमझिम फुहारों के बीच धान रोपाई के गीत या सावनी-कजरी की तान फूटती थी। जिन कुछ लोक अंचलों में यह सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा थोड़ी-बहुत बची है, वह मीडिया की निगाह से दूर है। राग के साथ फाग खेलने से लेकर बारहमासा गाने वाले देश में आया यह परिवर्तन काफी कुछ सोचने को मजबूर करता है। यह फिनोमेना सिर्फ हमारे यहां का नहीं, पूरी दुनिया का है। पूरी दुनिया में किसी भी पारंपरिक परिधान से बड़ा बाजार स्विमिंग कास्ट्यूम का है।

दिलचस्प है कि अब शहरों में घर तक कमरों की साज-सज्जा या लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से नहीं, अपार्टमेंट में स्विमिंग पूल और फाउंटेन की उपलब्धता की लालच पर खरीदे जाते हैं। इस लालच के सामने अगर आप देश की उस तस्वीर को रखकर देखें कि पानी के बिना किसान खुदकुशी कर रहे हैं और गुजरात, महाराष्ट्र से लेकर राजस्थान तक में पेयजल के लिए महिलाएं सिर पर गगरी लिए पांच-छह किलोमीटर तक की यात्रा कर रही हैं तो स्थिति की भयावहता ज्यादा समझ में आएगी।

सांस्कृतिक मसला भी है पानी
आज एक तरफ यह आशंका जताई जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध किसी औपनिवेशिक विस्तार की हवस के कारण नहीं बल्कि पानी और उसे लेकर हो रही मनमानी को लेकर होगा, तो वहीं, पानी के साथ जिम्मेदार और संवेदनशील सलूक का रकबा लगातार घटता जा रहा है। घटाव की यह प्रक्रिया हमारे परिवेश में ही नहीं, हमारे भीतर भी तेजी से चल रही है। इस घटाव में पानी को लेकर सौंदर्यबोध तो क्या, हमारा पूरा विवेक ही एक उपभोक्तावादी सनक में बदल चुका है। लीक से उतरी होली इस स्फीति की बड़ी मिसाल के तौर पर हमारे सामने है। लिहाजा, यह लोकपर्व अगर अपनी ठेठ रंगत में लौटता है तो यह आज के लिए ही नहीं, आगे के लिए भी शुभ होगा। आखिर उत्सवी ही नहीं, सांस्कृतिक मसला भी तो है पानी।