राकेश पांडेय
देश की आजादी में गांधीजी के योगदान को लेकर अनेक पहलुओं पर चर्चा होती रहती है। किंतु अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में गांधीजी के उल्लेख की खास चर्चा नहीं हुई। ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में गांधी भारत के स्वाधीनता संग्राम में गांधीजी की जनमानस में व्याप्ति का जीवंत प्रमाण है। स्वतंत्रता संग्राम में देशभक्तों ने अपने-अपने तरीके से ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अपनी भूमिका निभाई थी। उन रचनाकारों और प्रकाशकों के साथ-साथ अनेक गुमनाम शब्द साधकों के तप को रेखांकित करना हमारा दायित्व भी है, जिन्होंने गांधीजी से मिले बिना उनके द्वारा प्रतिपादित सूत्रों, जैसे कि अहिंसा, सत्याग्रह, स्वराज, नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, खादी, चरखा आदि को आजादी की लड़ाई में जन-जन तक पहुंचाया। ये सभी गांधीजी से इतने प्रभावित थे कि उनके प्रयासों से पूरा देश गांधीमय हो उठा, घर-घर में गांधीजी के विचार आजादी का मंत्र बन गए।
कल्पना कीजिए कि उस समय संचार के साधन नाम मात्र के थे, किंतु देश भर में गांधीजी के भाषणों का प्रभाव व्याप्त था। लोग विचार के साथ-साथ व्यवहार में भी गांधीमय हो उठे थे। इस माहौल को बनाने में प्रतिबंधित लोक साहित्य की बड़ी भूमिका थी। लोगों के बीच इन छोटी-छोटी पुस्तिकाओं ने देश को अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट हो कर खड़े होने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। ये पुस्तिकाएं आम जनता द्वारा तैयार की जाती थीं। इनमें मूल भावना गांधीजी के बताए रास्ते पर चलते हुए अंग्रेजों से लड़ना थी। यह भाषा आज की हिंदी से भिन्न है। इसमें उर्दू-फारसी के शब्दों का काफी प्रयोग हुआ है। ये पुस्तिकाएं निशुल्क वितरित नहीं होती थीं। इनके मूल्य रखे जाते थे। फिर उस पैसे से और पुस्तिकाएं प्रकाशित की जाती थीं। उनके कई-कई संस्करण निकले हैं। इस काम में कई पुस्तिकाएं तो हस्तलिखित भी हैं। कई पुस्तिकाओं के लेखक नहीं हैं, केवल प्रकाशकों ने संकलित कर के प्रसारित कर दिया और साथ में अपना पता भी दे दिया कि ये पुस्तिकाएं उनके यहां से प्राप्त करें। कुछ लोगों के लिए ये व्यवसाय भी बन गया था। वे चाहते थे कि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तिका की कोई नकल न करे, इसलिए उस पर संदेश भी लिखते थे।आजादी से पूर्व रचा गया यह अद्भुत लोक साहित्य है जो अनेक लोक विधाओं में है। इनमें गांधीजी को लेकर कई लोकगीत, आल्हा, कजरी, दादरा, अहिरवा, गजल, भजन आदि रचे गए। अनेक शब्द गांधीजी के पर्याय बन चुके हैं जैसे कि चरखा।
चरखे पर एक कविता के अंश देखिए:-
हमें ये स्वराज्य दिलाएगा चरखा
खिलाफत का झगड़ा मिटाएगा चरखा
हमको घूं-घंू की धुर्पद सुनाएगा चरखा
मेरे हौसले सब बढ़ाएगा चरखा
(गांधीजी का चरखा, प्रतिबंधित दिनांक : 30 मार्च, 1930)
आजादी की लड़ाई में गांधीजी द्वारा अहिंसा का सूत्र दिए जाने से निर्बल लोगों में भी अंग्रेजों से लड़ने की इच्छा प्रबल हो उठी थी। जो लोग हिंसात्मक आंदोलनों के लिए स्वयं को उपयुक्त नहीं पाते थे, वे भी गांधीजी के आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगे थे। कवि ने भारतीय संस्कृति में सभी देवताओं को सबल लड़ते हुए रहने की बात कही, लेकिन शांति के साथ लड़ने का विचार गांधीजी के साथ आरंभ हुआ। एक कविता का अंश ये है-
राम बलराम कृष्ण पारथ परशु भीम,
जावत बदि ‘बली’
बेदहूँ पुरान में।
औरो शस्त्रधारी बड़े होत रहे किंतु,
गांधी प्रगटे ते शांतिधारी भे जहान में
(वंदेमातरम गांधी गौरव, प्रतिबंधित दिनांक : 9 दिसंबर, 1931)
इस प्रकार गांधीजी का अंगे्रजों से संघर्ष जन-जन में व्याप्त हो गया। जो लोग गुलामी को अपनी नियति मान बैठे थे, वे भी देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार हो गए। अंग्रेजी हुकूमत पर बने इस भारी दबाव को नीचे लिखी पंक्तियां इस तरह प्रकट करती हैं-
ऐ मादरे हिंद न हो गमगीन दिन अच्छे आनेवाले हैं।
आजादी का पैगाम तुझे हम जल्द सुनाने वाले हैं।।
मां तुझ को जिन जल्लादों ने दी है तकलीफ जईफी में।
मायूस न हो मगरूरों को अब मजा चखाने वाले हैं।।
(स्वराज संग्राम का बिगुल, प्रतिबंधित। दिनांक: 25 अगस्त, 1930)
आजादी की लड़ाई में इन पुस्तिकाओं के रचनाकारों ने तमाम लोक विधाओं में गांधीजी के विचारों को प्रचारित किया। गांधीजी की लोक स्वीकार्यता का आलम यह था कि किसी भी जाति-धर्म के लोग उनसे देश को आजाद कराने की प्रार्थना करते थे। इस प्रकार की कविता भी इस प्रतिबंधित साहित्य में देखने को मिली-
गांधी हौं न तेरे गुनगान के सुयोग्य ‘बलीह्ण
कविता की राखौं हौं न नेकहूँ शकति है।
प्राप्त सतसंगहूँ न काहू देश-भक्तहूँ को,
नहीं राजनीतिहूँ में मेरी कछु गति है।।
(गांधी गौरव, प्रतिबंधित दिनांक : 9 दिसंबर,1931)
अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधीजी ने पाया कि अनेक भारतीय नशा करते हैं। इसीलिए उन्होंने अपने सूत्र वाक्यों में शराबबंदी की भी बात की। इसका असर संपूर्ण भारतीय जनमानस पर हुआ और इस लड़ाई में अनेक भारतीयों ने स्वयं को नशा मुक्त भी किया। अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में शराब के ऊपर भी बहुत ही रोचक पंक्तियां मिलती हैं-
खाना खराब कर दिया बिलकुल शराब ने।
जो कुछ कि न देखा था दिखाया शराब ने।।
बुलबुल की तरह बाग में लेते थे बुए गुल।
संडास नालियों में गिराया शराब ने।
(महात्मा गांधी की आंधी, प्रतिबंधित दिनांक : 10 दिसंबर, 1930)
घर-घर में आजादी की चिंगारी सुलगी हुई थी। पुरुष घर से बाहर अपना योगदान दे रहे थे, तो महिलाएं भी अपनी भूमिका का निर्वाह करने में कहीं पीछे नहीं थीं। स्त्रियां भी विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को आत्मसात कर अपने वस्त्र और सौंदर्य प्रसाधनों में भी स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को वरीयता देने के लिए तत्पर थीं। इसका उल्लेख प्रतिबंधित साहित्य की कविताओं में देखने को मिलता है। जैसे:-
साड़ी ना पहनब विदेशी हो पिया देशी मंगा दे।
देशी चुनरिया, देशी ओढ़नियां, देशी लहंगवा सिला दे हो।।
पिया देशी मंगा दे ।। साड़ी—-।।
देशी चोली, देशी गोली देशी ही रंग में रंगा दे हो।
पिया देशी मंगा दे ।। साड़ी—-।।
(स्वराज गीतांजलि, प्रतिबंधित दिनांक : 21 दिसंबर,1931)
विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने के लिए घर-घर में वातावरण बन गया था। यह गांधीजी की ही देन थी। उनके विचारों से प्रभावित होकर विश्व के तमाम देशों का सामान जो, भारत में आता था, उसका खुलेआम बहिष्कार होने लगा और इन प्रतिबंधित पुस्तिकाओं में उनकी गूंज भी मिलती है-
टाई जापां की न इटली का रूमाल अच्छा है।
जो बने अपने वतन में वह माल अच्छा हैं ।।
मुझे मतलूब नहीं चीन का जर्री सागिर।
मेरे भारत का मुझे जामे सिफाल अच्छा है।।
(स्वराज गीतांजलि, प्रतिबंधित दिनांक : 21 दिसंबर,1931)
गांधीवादी आंदोलनों में गांधी टोपी सदा चर्चा में रही। बड़े-बड़े आंदोलन गांधी टोपी पहन कर हुये। देश की आजादी के मतवालों की पोशाक में गांधी टोपी मुख्य अंग थी। इस पर कुछ पंक्तियां देखिए:-
इक लहर मचा दी भारत में इन गांधी टोपीवालों ने।
‘स्वाधीन बनोह्ण यह सिखा दिया इन गांधी टोपीवालों ने।।
सदियों की गुलामी में फंसकर, अपने को भी जो भूले थे।
कर दिया सचेत उन्हें अब तो, इन गांधी टोपीवालों ने।।
(सत्याग्रह की आवाज, प्रतिबंधित दिनांक : 10 दिसंबर, 1930)
वीर रस के रचनाकारों ने भी अपनी कलम से गांधीजी के अहिंसात्मक संघर्ष को भी वीर रस काव्य शैली ‘आल्हाह्ण में भी अनेक रचनाएं की। उसमें ‘नमक सत्याग्रह आल्हाह्ण, ‘स्वराज आल्हाह्ण, ‘सत्याग्रह आल्हाह्ण आदि प्रमुख है। इसमें से आप ‘सत्याग्रह आल्हाह्ण की कुछ पंक्तियां देखिए-
गांधी जी ने लिखा मित्र वर बृटिश हुकूमत भारी पाप।
दलिद्र इसने बनाया भारत दुख से जनता करै विलाप।।
नाश हाथ की भई कताई स्वास्थ हरन अबकारी कीन।
भारी बोझ नमक के कर का दबी है जासे जनता दीन।।
(सत्याग्रह आल्हा, प्रतिबंधित सन 1930)
इसी क्रम में देवनागरी लिपि में एक पंजाबी रचना भी मिली जो चरखे पर केंद्रित है-
ये ना समझो चरखा मेरा कहन्दा घूं घूं घूं।
ये तो याद करेगा हेगा गांधी तूं तूं तूं।।
एक दिन सुपना मैनू आया।
सुपने दे बिच यह फरमाया।।
मोमिन बिच चरखे दे तार में अल्ला हूं हूं हूं।।
(गांधी संग्राम, प्रतिबंधित दिनांक : 9 दिसंबर,1941)
इस प्रकार सारे भारतीय जनमानस में गांधी और सिर्फ गांधी व्याप्त थे। सबके मध्य एक ही संदेश था कि गांधीजी से अंग्रेजी हुकूमत डरती है। इस पर रोचक ढंग से कविताएं लिखी गई हैं जिन्हें बाद में अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया।
इस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित की गई रचनाओं की एक बानगी देने की कोशिश की है ताकि यह अनुमान लगाया जा सके कि ब्रिटिश हुकूमत द्वारा प्रतिबंधित साहित्य में गांधीजी की व्याप्ति का प्रभाव यह प्रेरित करता है कि संघर्षो से मिली आजादी को हम सहजता से न लें।

