खानपान हो, प्रसाधन, चिकित्सा, घरेलू साजो-सामान या जीवन से जुड़ी दूसरी चीजें, मीडिया में उनका बढ़-चढ़ कर विज्ञापन किया जाता है। हर उत्पाद गुणवत्ता में अपने को दूसरे से बेहतर बताता है। इसके लिए नामचीन हस्तियों की मदद ली जाती है, ताकि आम उपभोक्ता का उत्पाद संबंधी दावों पर भरोसा मजबूत हो। मगर अनेक परीक्षणों और जांचों में पाया गया कि विज्ञापन में किए गए दावे हकीकत से काफी दूर होते हैं। कई बार उन वस्तुओं के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव भी देखे गए हैं। इसी के मद्देनजर उपभोक्ता कानून में बदलाव किया गया। अब भ्रामक विज्ञापन देने वाली कंपनियों के साथ-साथ विज्ञापन करने वाली हस्तियों को भी दंड का भागी बनाया जा सकता है। इस बारे में बता रही हैं नाज खान।
एक सप्ताह में गोरापन लाने और चंद दिनों में मोटापे से मुक्ति दिलाने जैसे भ्रामक विज्ञापनों से अब उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है। उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2019 में न सिर्फ ग्राहकों को पहले से अधिक अधिकार दिए गए हैं, बल्कि सिनेमा और खेल जगत से जुड़ी उन मशहूर हस्तियों पर भी लगाम लगाने की कवायद की गई है, जो किसी उत्पाद का भ्रामक विज्ञापन करते पाए जाते हैं। मतलब साफ है कि यह विधेयक न सिर्फ उपभोक्ताओं के अधिकारों को सशक्त बनाने के साथ उनमें वृद्धि करता है, बल्कि इसके आने से कंपनियों की भी उपभोक्ताओं के प्रति जिम्मेदारी और बढ़ गई है। इसके अलावा मिलावटी सामान बनाने और बेचने वालों पर भी कठोर कार्रवाई का प्रावधान इस विधेयक में किया गया है। दरअसल, इस विधेयक का मकसद उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार व्यवहार से होने वाले नुकसान से बचाना है।
वैश्वीकरण और बाजारीकरण के इस दौर में विज्ञापन का प्रभाव समाचार पत्र-पत्रिकाओं, रेडियो, टेलीविजन के साथ डिजिटल मीडिया में भी तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में भ्रामक विज्ञापन भी धड़ल्ले से दिखाए जा रहे हैं। यही वजह है कि छरहरा और आकर्षक बनाने, यौन शक्ति बढ़ाने जैसे भ्रामक विज्ञापनों की बाढ़-सी आ गई है। इसके मद्देनजर यह पहली बार है जब किसी उत्पाद का विज्ञापन करने वाली मशहूर हस्तियों को भी इसके दायरे में रखा गया है, यानी उनकी जवाबदेही तय की गई है। भ्रामक विज्ञापनों के बारे में जहां निर्माताओं के लिए जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है, वहीं विज्ञापन करने वाली हस्तियों के लिए सिर्फ जुर्माना रखा गया है। हालांकि अगर वे बार-बार भ्रामक विज्ञापन करते पाए जाते हैं, तो उन पर उत्पादों का समर्थन करने के एवज में प्रतिबंध लगाया जा सकता है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि इससे धड़ल्ले से चल रहे भ्रामक विज्ञापनों पर लगाम लग सकेगी।
क्या है उपभोक्ता संरक्षण विधेयक
करीब तीन दशक पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की जगह उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 प्रभावी होगा। इसके जरिए जहां खामियों को दूर करने के लिए कदम उठाए गए हैं, वहीं उपभोक्ता का हित सर्वोपरि रखा गया है। यही वजह है कि इसमें मिलावटखोरों और खराब सामान बेचने वालों पर कठोर कार्रवाई के साथ उपभोक्ताओं को भी अधिक सशक्त बनाते हुए उन्हें पहले से अधिक अधिकार दिए गए हैं। इसके प्रावधानों के तहत अब विज्ञापनों में झूठे वादे करने या गलत जानकारी देने पर कंपनियों, सेवा प्रदाताओं पर कार्रवाई के अलावा उस विज्ञापन को करने वाली नामचीन हस्तियों को भी सजा के तौर पर जुर्माना भरना पड़ सकता है। फिर चाहे वह विज्ञापन प्रिंट, टेलीविजन, ई-कॉमर्स, डायरेक्ट सेलिंग या टेलीमार्केटिंग किसी भी जरिए से किया जा रहा हो। अगर उसमें गलत और ग्राहकों को भ्रमित करने वाली जानकारी दी जाएगी, तो यह अपराध की श्रेणी में आएगा। इस विधेयक में इसे इस तरह परिभाषित किया गया है कि इसमें किसी भी उत्पाद या सर्विस की झूठी जानकारी देना, झूठी गारंटी देना, ग्राहक को उत्पाद की प्रकृति, गुणवत्ता या मात्रा को लेकर फुसलाना या जानबूझ कर सेवा प्रदाता या निर्माता की ओर से कोई जानकारी छिपाया जाना आदि आता है।
विधेयक के अहम प्रावधान
यह कानून इस साल के अंत तक पूरे देश में लागू हो जाएगा। इसके लागू होने के बाद दुकानदार या उत्पाद निर्माता उपभोक्ताओं को धोखा नहीं दे सकते। उपभोक्ताओं की सहूलियत के लिए इसमें कठोर प्रावधान किए गए हैं-
’इसके तहत अगर मिलावटी और नकली सामान से किसी उपभोक्ता को कोई नुकसान नहीं होता है, तो ऐसे में सामान बनाने वाले को छ: माह की जेल होगी और एक लाख रुपए तक का जुर्माना चुकाना पड़ सकता है।
’वहीं अगर उपभोक्ता को उस मिलावटी सामान के इस्तेमाल से मामूली नुकसान होता है, तो एक साल की जेल और तीन लाख रुपए जुर्माने की सजा रखी गई है।
’इसके अलावा अगर उपभोक्ता को किसी मिलावटी सामान से गंभीर नुकसान होता है, तो निर्माता को सात साल की जेल और पांच लाख रुपए का जुर्माना होगा।
’वहीं अगर उपभोक्ता की मृत्यु हो जाती है, तो सामान बनाने वाले को उम्र कैद की सजा भी हो सकती है और कम से कम दस लाख रुपए जुर्माना देना होगा।
’इसमें यह भी नियम बनाया गया है कि नकली सामान बनाने पर निर्माता का लाइसेंस रद्द किया जाएगा।
’साथ ही अगर कोई निर्माता अपने उत्पाद की बिक्री के लिए भ्रामक और तथ्य से हट कर विज्ञापन देता है, तो भी उत्पाद बनाने वाले को जेल जाना होगा।
’इस कानून के अंतर्गत पहली बार किसी उत्पाद का भ्रामक विज्ञापन देने पर निर्माता को दो साल की कैद और दस लाख रुपए जुर्माना होगा।
’वहीं दोबारा भ्रामक विज्ञापन पर पांच साल की कैद और पचास लाख रुपए तक का जुर्माना देना पड़ सकता है।
साथ ही उपभोक्ता की शिकायतें सुनने के लिए एक केंद्रीय प्राधिकरण भी बनाया जाएगा। इसके फैसले को उच्चतम न्यायालय में ही चुनौती दी जा सकेगी।
मनमाना रवैए पर लगेगी लगाम
हाल में अभिनेता राहुल बोस ने चंंडीगढ़ के एक होटल में दो केलों के लिए चार सौ बयालीस रुपए का बिल चुकाया। इस घटना को उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट पर भी साझा किया। कुछ समय पहले मॉल में फिल्म देखने के दौरान मिलने वाले पॉपकॉर्न की कीमत का मामला भी सुर्खियों में रहा था। यह नई बात नहीं है। पांच सितारा होटल या कुछ खास जगह पर उत्पादों के मूल्य उनकी कीमत से कहीं अधिक वसूले जाते हैं और ग्राहक न चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। वहीं ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ भी लगातार शिकायतें बढ़ रही हैं। ऐसे कई मामले हैं जब उपभोक्ताओं को आॅनलाइन सामान मंगाने पर नकली सामान मिलने जैसी शिकायतें भी आम होती जा रही हैं। ऐसे में इस विधेयक के प्रावधान उपभोक्ताओं को पहले से अधिक सशक्त बनाते हैं। विधेयक में उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करने और खराब सामग्री और सेवा के संबंध में शिकायतों के निवारण के लिए एक व्यवस्था बनाने का प्रयास किया गया है।
आॅनलाइन कर सकेंगे शिकायत
अभी तक उपभोक्ता को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए जिला उपभोक्ता फोरम और राज्य उपभोक्ता फोरम में जाना पड़ता था, लेकिन इस कानून के बाद अब उपभोक्ताओं को यह अधिकार मिल जाएगा कि वह कहीं भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे। यानी क्षेत्राधिकार को बढ़ाया गया है। इससे पहले नियम यह था कि उपभोक्ता ने जहां से उत्पाद खरीदा है या फिर जहां उस उत्पाद को बनाने वाली कंपनी का पंजीकृत कार्यालय है, वहीं पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती थी। वहीं उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय इस बात पर भी जल्द ही कोई निर्णय लेगा कि उपभोक्ता अपनी शिकायतें आॅनलाइन भी दर्ज करा सकें। इस व्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकारों को उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण में न्यायिक और गैर-न्यायिक सदस्य नियुक्त करने का भी अधिकार होगा। किसी शिकायत पर आयोग को इक्कीस दिन के अंदर फैसला लेना होगा कि उस शिकायत को सुना जाए या खारिज कर दिया जाए। वहीं आयोग को यह अधिकार भी होगा कि अगर उसे लगता है कि मध्यस्थता से कोई मुद्दा सुलझ सकता है, तो वह दोनों पक्षों में मध्यस्थता की पहल करेगा। इस नये कानून के तहत उपभोक्ताओं की निजी जानकारी को किसी अन्य से साझा करना अनुचित व्यापार व्यवहार के दायरे में आएगा।
उपभोक्ताओं को सशक्त अधिकार
अगर शिकायत करने वाला उपभोक्ता आवेदन कर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए पेश होना चाहता है, तो उसे इसकी अनुमति दी जा सकती है। इसके अलावा उपभोक्ता आयोग बिना शिकायतकर्ता की बात सुने उसकी शिकायत को खारिज नहीं कर सकता। उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार होगा कि उसकी शिकायत खारिज क्यों की गई। केंद्र सरकार एक उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी बनाएगी। इस अथॉरिटी को खराब, असुरक्षित उत्पादों और सेवाओं की जांच करने, रिफंड करने और जुर्माना लगाने का अधिकार होगा। हालांकि पहले नियम यह था कि उपभोक्ता आयोग तक आई शिकायतों तक ही जांच सीमित रहती थी, मगर अब उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी अगर किसी उत्पाद या सेवा में गड़बड़ी पाती है, तो वह उसके पूरे बैच की जांच जनहित में करा सकेगी। इस तरह वह उपभोक्ता के साथ जनहित का भी ध्यान रखेगी।
ई-कॉमर्स भी दायरे में
इस नए विधेयक के तहत अब ई-कॉमर्स कंपनियों की मनमानी पर भी लगाम लगेगी। अगर आॅनलाइन खरीदे गए किसी उत्पाद में खराबी पाई जाती है या ग्राहक को किसी तरह का नुकसान होता है, तो शॉपिंग कंपनियां यह कह कर बच नहीं पाएंगी कि वे सामान उपलब्ध कराने का जरिया भर हैं, बल्कि ग्राहक को हुए नुकसान के प्रति उनकी भी पूरी जवाबदेही होगी। साथ ही अब ई-कॉमर्स कंपनियों को भी अब ऐप या वेबसाइट के जरिए अपने बेचे जा रहे किसी भी उत्पाद के निर्माण, उसके दुष्प्रभाव समेत सभी जानकारियां ग्राहक को उपलब्ध करानी होंगी। वहीं अब तक कंपनियां ग्राहकों की खरीदारी का डेटा किसी तीसरे पक्ष को व्यावसायिक गतिविधि के लिए बेच दिया करती थीं, मगर अब इस पर भी अंकुश लगेगा। साथ ही उत्पादों को अनुचित तरीके से बढ़ावा देने और नकली सामान बेचे जाने पर उपभोक्ता संरक्षण अथॉरिटी ई-कॉमर्स कंपनियों पर मुकदमा कर सकती है। अब इसके दायरे में फूड डिलिवरी ऐप्स को भी लाया जा सकता है।
उपभोक्ताओं को मिलेगी मजबूती
इसमें एक ऐसा उपभोक्ता संरक्षण प्रधिकरण बनाया गया है, जो सामान खरीदने से पहले, खरीदने के दौरान और खरीदने के बाद यानी सभी तरह की शिकायतों को देखेगी।
उपभोक्ता जहां है वहीं से अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है, जबकि पहले वह जहां से सामान खरीदता था, उसे वहीं शिकायत दर्ज करानी होती थी।
साथ ही उसे वकील की जरूरत नहीं होगी। वह अपना मामला खुद देख सकता है। इससे लंबित मामलों का भार भी नहीं बढ़ेगा।
अगर जिला और राज्य स्तर पर उपभोक्ता के पक्ष में फैसला हो गया हो, तो राष्ट्रीय स्तर पर दूसरी पार्टी को उसके खिलाफ जाने का अधिकार नहीं होगा।

