श्री भगवान सिंह
जनतंत्र में शासन या राजसत्ता के साथ साहित्य का संबंध रचनात्मक संवाद का होना चाहिए। इसमें साहित्य की कोई अवमानना नहीं है, बशर्ते यह संवाद पुरस्कार या पद-प्राप्ति के लोभ से न किया जाए। गड़बड़ी तब होती है जब कुछ लेखक, कवि संवाद को पुरस्कार प्रबंधन का साधन बनाने लगते हैं या फिर दलीय या संगठन प्रतिबद्धता के शिकार होकर संवाद को पक्षपातपूर्ण बनाने लगते हैं।
सीसी और रूसी क्रांतियों में साहित्यकारों की भूमिका से यह धारणा प्रबल हुई कि राजसत्ता का प्रतिरोध करने में ही साहित्य की सार्थकता है। पर राजसत्ता के साथ साहित्य के संबंध को देखने का भारतीय दृष्टिकोण भिन्न रहा है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘रामायण’ शीर्षक निबंध में कवियों की दो श्रेणियों का उल्लेख किया है। उनका कहना है- ‘दूसरी श्रेणी के कवि वे हैं, जिनकी रचना के भीतर से एक समग्र देश, एक समग्र युग अपने हृदय को, अपनी अभिज्ञता को व्यक्त करके उसे मानव की चिरंतन सामग्री बना देता है। इसी दूसरी श्रेणी के कवि को महाकवि की संज्ञा दी जाती है। समग्र देश की, समग्र जाति की सरस्वती इन्हें अपना आश्रय बना पाती है। ये लोग जो रचना करते हैं वह किसी व्यक्ति-विशेष की रचना नहीं जान पड़ती। ऐसा लगता है कि जैसे वह विशाल वनस्पति के समान देश की धरती से पैदा होकर उसी देश को आश्रय और छाया दे रही है।’
रवि ठाकुर का यह कथन साहित्य के बारे में पूरी भारतीय सोच को प्रकट करता है। यानी हमारे यहां साहित्य को सत्य से दूर, मिथ्याधारित रूप में, जैसा कि यूनानी दार्शनिक प्लेटो का कहना था, नहीं देखा-समझा गया, बल्कि उसे समग्र देश, समाज, युग, पूरी प्रकृति की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा कि ‘काव्य शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक संबंधों की रक्षा और निर्वाह का साधन है।’
साहित्य के संबंध में भारतीय चित्त में रची-बसी ऐसी मान्यताओं की तार्किक परिणति के रूप में यह स्वत: सिद्ध हो जाता है कि जो साहित्य ‘समग्र देश’ ‘समग्र युग’ या ‘शेष सृष्टि’ की अभिव्यक्ति है, तो जो राजसत्ता इसी समग्र देश या युग का एक अनिवार्य अवयव है, ईकाई है, वह भी साहित्य के सर्वसमावेशी चरित्र में स्थान पाएगा ही। इसी सोच का परिणाम हुआ कि हमारे यहां राजनीति या राजसत्ता के विमर्श को साहित्य से बाहर नहीं रखा गया, न उसे राजसत्ता का प्रतिपक्षी मात्र माना गया। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के रूप में चार पुरुषार्थों को मान्य करते हुए साहित्य में इन चारों का समावेश होता रहा। अर्थ के अंतर्गत ही राजनीतिक विमर्श स्थान पाता रहा। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में राजा और प्रजा के पारस्परिक अधिकारों और कर्तव्यों का विशद विवेचन मिलता है।
अनेक कथाओं और आख्यानों से जानकारी मिलती है कि तपोवन में रह कर ऋचाओं, मंत्रों और ग्रंथों की रचना करने वाले ऋषियों का भी अपने युग के राजाओं से संवाद-सूत्र जुड़ा हुआ था। अनेक पौराणिक वृत्तांतों से ज्ञात होता है कि राजा स्वयं समय-समय पर तपोवनों में जाकर ऋषियों-मुनियों से संवाद कर राज्य-प्रबंधन हेतु दिशा-निर्देश प्राप्त किया करते थे। ‘महाभारत’ के रचयिता व्यास राजसत्ता से दूर रहते हुए भी समयानुसार राज दरबार में जाकर निर्भीकतापूर्वक परामर्श दे आते थे। जब-जब धृतराष्ट्र को अनीति, अधर्म की ओर अग्रसर होते देखा, तब-तब व्यास ने जाकर उसे समझाया, उचित परामर्श दिया और अवज्ञा करने पर उसे फटकार भी लगाई। वाल्मीकि के संबंध में भी कहा जाता है कि उन्होंने अपने आश्रम में निष्कासित सीता को आश्रय देकर प्रकारांतर से राजसत्ता के साथ संवाद का ही रिश्ता कायम किया था। विदेह कहे जाने वाले राजा जनक का दरबार तो अपने जमाने का महासंवाद-स्थल था।
विक्रमादित्य के शासन काल तक आते-आते तपोवन युग बीत चुका था। सर्वविदित है कि विक्रमादित्य ने कला, विद्या, साहित्य से संबद्ध नौ विभूतियों को अपने यहां राज्याश्रय दे रखा था, जो ‘नवरत्न’ कहलाते थे। इन्हीं नवरत्नों में एक थे कालिदास। कालिदास राज्याश्रय देने वाले राजा की बिरुदावली गाने वाले कवि नहीं थे, बल्कि राजसत्ता के साथ एक स्वस्थ, उच्च धरातल पर संवाद का संबंध बना कर रखने वाले थे। उनका महाकाव्य ‘रघुवंश’ अपने युग का एक महान राजनीतिक संवाद का आख्यान है। निस्संदेह, कालिदास ने इस काव्य में रघुवंशी राजाओं-दिलीप से लेकर रामचंद्र तक का गौरव गान किया है, लेकिन किन कारणों से किया है उसका उल्लेख वे भूमिका स्वरूप इन शब्दों में करते हैं- ‘जो राजा आजीवन शुद्ध रहते थे, जो फलप्राप्ति के लिए कार्य करते थे, जिनका समुद्र तट तक राज्य था और स्वर्ग तक रथ-मार्ग था, जो अग्नि में यथाविधि आहुति दिया करते थे और प्रार्थियों की इच्छा-पूर्ति करते थे, जो अपराध के अनुसार दंड देते थे और उचित समय जाग उठते थे, जो त्याग के लिए अर्थ संचय करते थे, सत्य के लिए मितभाषी थे, यश के लिए विजयोन्मुख थे और संतान-प्राप्ति के लिए विवाह करते थे, जिनका बचपन विद्यार्जन में बीतता था, जो यौवन में विषय पूर्ति करते थे, वार्धक्य में मुनि-वृत्ति ग्रहण करते थे और योग-साधना के बाद जिनका देहांत होता था-रघुवंश के उन्हीं राजाओं का मैं गुणगान करूंगा।’
प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक भारत में लिखे जानेवाले साहित्य की मुख्यधारा का राजसत्ता के साथ संबंध संवाद का रहा, केवल प्रतिरोध या विरोध का नहीं रहा। मगर यह तथ्य भी ध्यान रखने लायक है कि राजसत्ता के साथ संवाद को उन साहित्यकारों ने धन या पद प्राप्त करने का साधन नहीं बनाया। दरअसल, राजसत्ता का साहित्य में प्रतिरोधी स्वर ब्रिटिश शासन की उपज है। मुगलकाल तक तो साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों के साथ राजसत्ता का अपवादस्वरूप एकाध घटना को छोड़ कर, सौहार्दपूर्ण संवाद का रिश्ता कायम रहा, क्योंकि मुगलों ने अपने विदेशीपन को छोड़ कर इस देश को अपना वतन कबूल कर लिया था। लेकिन यह बात अंग्रेजों के साथ नहीं घटित हुई। वे अपने विलायती रुआब में रह कर विदेशी होने का अहसास करते हुए यहां के आवाम पर हुकूमत करना चाहते थे, इसलिए यहां के संवेदनशील, स्वाभिमानी लोग पराधीनता का दंश महसूस करने लगे और इस पराधीनता के विरुद्ध 1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद साहित्य के क्षेत्र में राजसत्ता के विरुद्ध प्रतिरोधी स्वर उभरने लगा। यह स्वर उत्तरोत्तर व्यापक होता गया जब तक देश उपनिवेशवादी शासन के जुए से मुक्त नहीं हो गया।
यहीं पर यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या एक लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था में जनता द्वारा चुनी गई सरकार के प्रति साहित्य का दायित्व केवल विरोध का होगा या संवाद का? जब हमारे यहां प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक राजतंत्र-राजाओं के साथ सहमति-असहमति का संवाद होता रहा, तो फिर जनता द्वारा चुनी गई सरकार के प्रति क्यों केवल विरोध का ही संबंध होना चाहिए? जनतंत्र में शासन या राजसत्ता के साथ साहित्य का संबंध रचनात्मक संवाद का होना चाहिए। इसमें साहित्य की कोई अवमानना नहीं है, बशर्ते यह संवाद पुरस्कार या पद-प्राप्ति के लोभ से न किया जाए। गड़बड़ी तब होती है जब कुछ लेखक, कवि संवाद को पुरस्कार प्रबंधन का साधन बनाने लगते हैं या फिर दलीय या संगठन प्रतिबद्धता के शिकार होकर संवाद को पक्षपातपूर्ण बनाने लगते हैं। पक्षपातपूर्ण विरोध और समर्थन से साहित्य लोकतंत्र में अपनी विश्वसनीय भूमिका हर्गिज नहीं निभा सकता।
इसलिए वर्तमान लोकतांत्रिक, जनतांत्रिक शासन-प्रणाली में आवश्यक है कि सभी लेखक, कवि और संस्कृतिकर्मी अपने को सांगठनिक बाड़ों और दलीय प्रतिबद्धताओं से मुक्त करते हुए अपने लेखन से प्रजातांत्रिक-जनता द्वारा मताधिकार से चुनी गई सरकारों से संवाद करें। व्यास, वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास की परंपरा से पाथेय ग्रहण करते हुए सत्ताधारियों को जनहित में चेताएं, उनकी आंखों में अंगुली डाल कर उनके कर्तव्य की ओर ध्यान आकृष्ट करें, बगैर किसी पुरस्कार, पद-प्राप्ति के लोभ के। केवल फ्रांसीसी राज्य क्रांति या रूसी क्रांति का तोतारटंत पाठ करते हुए साहित्य को प्रजातांत्रिक शासन-व्यवस्था का मात्र प्रतिपक्ष के रूप में देखना न जनतांत्रिक है, न भारतीय साहित्य चिंतन परंपरा इसकी अनुमति देती है। ०
