उनका वास्तविक नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकाली था। उनका जन्म कर्नाटक के धारवाड़ में हुआ था। घर में संगीत का वातावरण होने की वजह से कुमार गंधर्व ने बचपन में ही पक्के रागों का अनुकरण करना शुरू कर दिया था। फिर उन्होंने पुणे में प्रोफेसर देवधर और अंजनी बाई मालपेकर से संगीत की शिक्षा प्राप्त की थी। ग्यारह साल की उम्र में ही वे इतने सिद्ध गायक बन चुके थे कि मंचों से गाना शुरू कर दिया। उनके पक्के रागों पर पकड़ और गले की साधना को देखते हुए ही उन्हें कुमार गंधर्व कह कर पुकारा जाने लगा। तबसे उनका यही नाम पड़ गया।

जब कुमार गंधर्व ने गायन के क्षेत्र में कदम रखा, तब संगीत राजघरानों की चारदीवारों से बाहर निकल कर आम श्रोताओं के बीच आ गया था। हालांकि तब भी अलग-अलग घराने अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने शिष्यों को अनुकरणात्मक संगीत की शिक्षा दिया करते थे। कुमार गंधर्व की शिक्षा इससे अलग हुई।

कुमार गंधर्व ने संगीत में नया प्रयोग करना शुरू किया

प्रोफेसर देवधर अपने शिष्यों को अलग-अलग घरानों की गायकी सिखाने के बाद उनसे कहते थे कि इनके बीच से तुम अपना रास्ता निकालो। इस तरह कुमार गंधर्व ने संगीत में प्रयोग करना शुरू किया। उन्होंने पारंपरिक रागों में प्रयोग करना शुरू किया और इस तरह उन्होंने अपनी गायकी की एक अलग राह बनाई। वे किसी एक घराने से बंध कर नहीं रहे, न अपना कोई घराना बनाया।

उन्हें क्षयरोग ने पकड़ लिया और चिकित्सकों ने उन्हें गाने से मना कर दिया, तब वे हवा-पानी बदलने और आराम करने के लिए मध्यप्रदेश के देवास आ गए। वहां मालवा की समशीतोष्ण जलवायु में स्वास्थ लाभ करने लगे। उस दौरान संगीत को लेकर उनका मन बेचैन रहता था। वे जिस घर में स्वास्थ लाभ कर रहे थे, वह देवास के बाहरी हिस्से में था, और वहां हाट लगा करता था। कुमार जी वहीं बिस्तर पर पड़े-पड़े मालवी महिलाओं को उधर से आते-जाते गीत गाते सुना करते थे।

पग-पग पर गीतों से चलने वाले मालवी लोकजीवन से उनका साक्षात्कार हुआ

वहीं पग-पग पर गीतों से चलने वाले मालवी लोकजीवन से उनका साक्षात्कार हुआ। संगीत वे सीखे हुए थे और शास्त्रीय गायन में काफी प्रसिद्धि भी प्राप्त कर चुके थे, मगर जब मालवी लोकगीतों का माधुर्य उनके कानों में पड़ा, तो जैसे उन्हें नया जीवन मिल गया। वहीं से एक नए कुमार गंधर्व का जन्म हुआ। स्वस्थ होने के बाद मामा मजूमदार के घर एक छोटी-सी महफिल में गाते हुए उन्होंने अचानक कहा, ‘अब मुझे गाना आ गया है’।

मालवा के लोकगीत में कुमार गंधर्व को शास्त्रीय तत्त्वों का दर्शन हुआ था

दरअसल, मालवा के लोकगीत में कुमार गंधर्व को शास्त्रीय तत्त्वों का दर्शन हुआ था। उन्होंने लोकधुनों का शास्त्रीय रागों से मेल कराया और नई बंदिशें तैयार करनी शुरू कीं। इस तरह उन्होंने कबीर के पदों को मालवी लोकधुनों के रंग में उतारा और गाना शुरू किया, तो लगा जैसे कबीर के पदों को कुमार के कंठ की ही तलाश थी। फिर तो कुमार गंधर्व और कबीर एक-दूसरे के पर्याय होते गए। जिस ढंग से कुमार गंधर्व ने कबीर के पदों को गया है, वैसा तब तक किसी ने नहीं गया था।

शास्त्रीय रागों में तैयार बंदिशें होने के बावजूद उनमें लोक-तत्त्व ही प्रमुख था। फिर तो कुमार गंधर्व की कबीर-गायन शैली तमाम गायकों के लिए अनुकरणीय हो गई। कबीर के अलावा उन्होंने बहुत सारे मालवी गीतों को शास्त्रीय परंपरा में ढाला। इस तरह कुमार गंधर्व ने लोक-शैली को शास्त्रीय परंपरा में ढालने की एक नई परंपरा विकसित की।