नीरज कुमार मिश्र

परिवार में जितना महत्त्वपूर्ण स्थान मां का है उतना ही पिता का है। पिता का नाम आते ही ऐसे शख्स का चेहरा सामने आ जाता है, जो अपने सपनों को अपनी संतानों की आंखों में देखता है। शायद ही कोई कविमन ऐसा हो, जो अपने परिवेश और परंपरा में इस सृजनात्मक बीज (पिता) की तलाश न करता हो। अवसर पाते ही पिता पूरी संवेदना के साथ कविता में चुपचाप अपना स्थान बना कर लेते हैं।

‘पित: तुम्हारी मुझे आती है’ में पिता के जीवनानुभव ही मुक्तिबोध की प्रेरणा की दिशा निर्धारित करते हैं- ‘पित:, तुम्हारी मुझे आती है याद जब/ पित:, तुम्हारी वीर-जीवन-इतिहास-कथा/ देती है मेरी प्रेरणाओं की दिशाएं बता/ आंसू पोंछ जाती हैं वे/ धीरज बंधाती हैं वे/ संग्राम का शिल्प मुझे अचूक सिखा जाती हैं वे/ संघर्ष में मुझे देती है सत्य की महान व्यथा।’ सही मायने में पिता का महत्त्व हमें तब पता चलता है जब हम खुद पिता बनते हैं। क्या सच में हम अपने पिता के बारे में सोचते हैं, जैसे ‘चीनी चाय पीते हुए’ में अज्ञेय अपने पिता के बारे में सोच रहे हैं। शायद नहीं, क्योंकि पिता के बारे में सोचने से खुद की कलई खुलने का डर है- ‘हम कुछ दूसरे हो सकते थे/ पर सोच की कठिनाई यह है कि दिखा देता है/ कि हम कुछ दूसरे हुए होते/ तो पिता के अधिक निकट हुए होते/ अधिक उन जैसे हुए होते/ कितनी दूर जाना होता है पिता से/ पिता होने के लिए।’ पिता ही हैं, जो उम्मीद और विश्वास को बनाए रखते हुए अपना पूरा जीवन काट लेते हैं। उनके जाने के बाद बचती है उनकी स्मृति और घर का खालीपन। मंगलेश डबराल अपनी कविता ‘पिता की स्मृति में’ उनके जाने के बाद के खालीपन को महसूस कर रहे हैं- ‘धीरे-धीरे टूटती दीवारों के बीच तुम पत्थरों की अमरता खोज लेते थे/ खाली डिब्बों फटी हुई किताबों और घुन लगी चीजों में जो जीवन बचा हुआ था उस पर तुम्हें विश्वास था/ जब मैं लौटता तुम उनमें अपना दुख छिपा लेते थे/ सारी लड़ाई तुम लड़ते थे, जीतता सिर्फ मैं था।’ जिन बच्चों के सर से जल्दी ही पिता का साया उठ जाता है, उन अनाथ बच्चों का जीवन अंधेरे से घिर जाता है। ‘दिवंगत पिता के प्रति’ कविता में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना समाज में व्याप्त इसी अंधेरे के बीच पिता की आवाज को उम्मीद की तरह देखते हैं- ‘जाने कैसा रहस्य भरा करुण अंधकार फैल जाता था/ और ऐसे में आवाज आती थी पिता/ तुम्हारे पुकारने की,/ मेरा नाम उस अंधियारे में/ बज उठता था, तुम्हारे स्वरों में/ मैं अब भी हूं/ अब भी है यह रोता हुआ अंधकार चारों ओर/ लेकिन कहां है तुम्हारी आवाज/ जो मेरा नाम भर कर/ इसे अविकल स्वरों में बजा दे।’

पिता की उपस्थिति बच्चों को आश्वस्त रखती है कि उनका संसार अभी जीवित है। कुंवर नारायण की कविता ‘पिता से गले मिलते’ में नचिकेता इसीलिए आश्वस्त है- ‘पिता से गले मिलते/ आश्वस्त होता नचिकेता कि/ उनका संसार अभी जीवित है।’ जब बेटे थक कर हताश होते हैं तो उस समय अपने कंधों में पिता का कर्मरत हाथ ही महसूस करते हैं। आज कितने नचिकेता ऐसे हैं, जो अपने पिता को वचन देते हैं कि उन्हें कभी दुख नहीं देंगे। सुभाष राय अपनी कविता ‘तुम्हारा नचिकेता’ में ऐसे पिता का नचिकेता बनना चाहते हैं, जो जीवन के हर मुश्किल समय में शक्ति प्रदान करते हैं- ‘जब कभी आत्मीय प्रवंचनाएं घेरतीं हैं मुझे/ तुम्हीं मृत्यु से संवाद करने की शक्ति सौंपते हो/ और मैं नचिकेता हो जाता हूं।’ कुछ ऐसे बेटे भी हैं, जो अपने पिता के अंदर छिपी शक्ति रूपी आग को किसी भी कीमत पर बुझने नहीं देना चाहते। राकेश रेणु की कविता ‘पिता के लिए’ इसी चाहत को व्यक्त करती है- ‘लेकिन नहीं दबा रहने दूंगा मैं/ माटी के ढूह के नीचे/ उसकी आग/ धीरे-धीरे बुझ जाने के लिए/ निकाल लाऊंगा/ अपनी हथेलियों पर/ दबे अंगारे/ और समेट लूंगा सब/ अपने भीतर/ मरने बुझने नहीं दूंगा उसे/ मेरे साथ जिएगा वह।’ पिता जिम्मेदारी का दूसरा नाम है। जितेंद्र श्रीवास्तव अपनी कविता ‘पिता होना’ में इसी बात का समर्थन करते हैं कि ‘पिता होना, जिम्मेदार आदमी हो जाना है/ इस तरह जिम्मेदार हो जाना/ जिसमें ‘स्व’ का विलय हो जाना/ स्वयं सृजित संसार में/ निहायत जरूरी हो जाना।’ इसी जिम्मेदारी के तहत पिता पूरी जिंदगी बच्चों को पालने-पोसने में ही निकाल देता है। स्वप्निल श्रीवास्तव की ‘पापा’ कविता ऐसे ही पिता के दर्द से उपजी है- ‘बच्चों को पालने पोसने में/ पापा की उम्र निकल गई/ बच्चों की छोटी मोटी जरूरतों के लिए/ पापा निरंतर खर्च होते रहे/ चुकाते रहे कर्ज की किश्तें।’ ऐसे ही कर्ज में डूबे पिता की आकृति मिथिलेश श्रीवास्तव की कविता ‘आकृतियां’ में भी उभरती है- ‘उत्तर की दिशा में छत के नीचे/ कोने में है एक छोटी होती हुई आकृति/ पिता जैसी/ सफेद सूजी हुई मांसपेशियों वाली/ थकी और कर्ज में डूबी।’ आज न जाने हम जैसे कितने बेरोजगार पिता समाज के सामने बेफिक्री का नाटक करते हैं। अरुण देव की कविता ‘बेरोजगार पिता’ में ऐसे ही पिता की कहानी है- ‘मित्र ने छिपाया अपने पिता होने को/ एक बेरोजगार का यों भी पिता हो जाना/… पर उसकी बेफिक्री में कभी-कभी दिख जाते/ एक बेरोजगार पिता के झुके हुए कंधे।’

हर पिता अपने बच्चों के लिए अपने दुखों को छिपा कर अपनी इच्छाओं और सपनों से निरंतर लड़ाई लड़ता है। इस आंतरिक जंग में बोधिसत्व की कविता ‘हार गए पिता’ की तरह ही हम सबके पिता अंतत: हार जाते हैं- ‘इच्छाएं कई और थीं पिता की/ जो पूरी नहीं हुर्इं/ कई और सपने थे… अधूरे../ वे तमाम अधूरे सपनों के साथ भी जीने को तैयार थे/ पर नहीं मिले उन्हें तीन-चार साल/ हार गए पिता/ जीत गया काल।’ वहीं भारत यायावर की कविता ‘पिता के बारे में’ ऐसे पिता का बिंब है, जो लगातार जिंदगी की जंग में कभी हारता नहीं है- ‘पिता, जिंदगी भर तुम्हें/ जिंदगी का साथ रहा/ इसीलिए जिंदगी भर तुम/ लड़ते रहे जिंदगी की लड़ाई/ अब तुम्हारे नहीं रहने पर भी/ तुम्हारी लड़ाई/ और बल से लड़ रहा हूं/ तुम कभी नहीं हारे थे, पिता न कभी हारोगे।’ चंद्रकांत देवताले कहते हैं कि ‘प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता’- ‘तुम्हारी निश्चल आंखें/ तारों-सी चमकती हैं मेरे अकेलेपन की रात के आकाश में/ प्रेम पिता का दिखाई नहीं देता।’ वहीं दूसरी तरफ कवि दिविक रमेश की कविता ‘जबकि उदास भी नहीं हूं मैं’ एक बेटे के अंदर पनपी उस टीस को व्यक्त करती, जिसने अब तक अपने पिता से प्यार का इजहार नहीं किया-‘मैं बहुत प्यार करता हूं पिता/ नहीं कह सका जिसे, आज तक/ और आज भी, कह कहां पा रहा हूं/ आज, बहुत प्यार आ रहा है मुझे/ अपने बच्चों पर/ शायद वैसा ही, जैसा आता था पिता को।’ बड़े होते बच्चों से पिता लगातार दूर होते जाते हैं। पिता से बच्चों की दूरी भी बढ़ती जाती है। कवयित्री विपिन चौधरी अपनी कविता ‘पिता के साथ एकमात्र तस्वीर को देखते हुए’ में इस दूरी को दूसरी तरह से देखती हैं- ‘पिता और मुझमें/ खुदा और बंदे जितना फासला है/ नजदीकी इतनी कि चाहे तो उन्हें छू भी लूं/ दूरी इतनी की आकाशगंगा अपनी लंबाई मांग ले।’ समकालीन कविता में ऐसे और बहुत से कवि हैं, जिन्होंने अपनी कविता के केंद्र में पिता को रखा है। ०