शिखर चंद जैन
दार्जिलिंग उन दिनों एक शांत और खुशनुमा शहर हुआ करता था। चारों ओर कुदरत ने अपने दोनों हाथों से हरियाली बिखेर रखी थी। सभी शहरवासी भाईचारे से हिलमिल कर साथ रहते थे। शहर के अंतिम छोर पर एक पहाड़ी थी। इसी पहाड़ी के पार तलहटी में बहती झील के किनारे एक छोटा-सा शांत और सुंदर गांव था, सुंदरपुर। वहीं रहता था एक गरीब चरवाहा सोम। सोम इतनी मधुर बांसुरी बजाता था कि इंसानों के साथ-साथ पेड़-पौधे भी उसकी बांसुरी की तान पर मदहोश हो जाते थे। एक दिन सोम झील किनारे बैठा बांसुरी बजा रहा था। उसके मवेशी इधर-उधर घास चर रहे थे। झील में दो हंस, कहीं दूर देश से आए हुए थे। उन्हें भी सोम की बांसुरी की धुन बड़ी प्यारी लगी। वे तो उसकी बांसुरी के दीवाने ही हो गए। ये हंस बादलों की राजकुमारी मेघा के मित्र थे। हंस दुनिया के कई देशों का भ्रमण करते रहते थे। इसलिए बादलों की राजकुमारी मेघा उनसे दुनिया भर के हालचाल पूछती रहती थी। कुछ दिनों भ्रमण के बाद दोनों हंस जब अपने देश लौटे तो राजकुमारी मेघा उनसे मिली। हंसों ने मेघा को दुनिया की कई रोचक बातें बताई और बांसुरी वाले चरवाहे के बारे में खासतौर पर बताया। मेघा ने उसकी प्रशंसा सुनी तो वह चरवाहे से मिलने के लिए आतुर हो गई। बोली, ‘उस चरवाहे को यहां ले आओ न!’
हंस बोले, ‘वह शरीर से इतना कमजोर है कि इस बर्फीले इलाके में चाह कर भी नहीं आ पाएगा। किसी तरह आ भी गया तो बीमार पड़ जाएगा।’ इस पर राजकुमारी मेघा ने कहा, ‘मैं बसंत ऋतु से कह देती हूं, वह सुंदरनगर चली जाएगी। तब तो सर्दी कम हो जाएगी। तब वह यहां आराम से आ सकेगा?’ राजकुमारी के आदेश से चारों ओर बसंत ऋतु छा गई, मौसम सुहाना हो गया। सोम बहुत खुश हुआ। वह सोचने लगा, ‘मैं सर्दी के कारण कई रातों को सो नहीं सका, चलो अब आराम से सो सकूंगा।’ सोम सचमुच गहरी नींद में सो गया। दोनों हंस उसे लेने सुंदरपुर आ पहुंचे। मगर सोम तो मजे से सो रहा था। हंसों ने उसकी नींद खुलने का इंतजार किया। कई दिनों के इंतजार के बाद सोम उठा, तो हंस खुश हुए। पर सोम ने बांसुरी नहीं बजाई। वह इधर-उधर घूम कर सुहानी धूप और मजेदार मौसम का आनंद लेने लगा। मानो बांसुरी को तो वह भूल ही चुका था। इसी तरह कई दिन और बीत गए, तो हंस ऊब गए। वे राजकुमारी के पास लौट गए। उन्होंने मेघा से कहा, ‘बसंत के मौसम में मस्त होकर उस चरवाहे ने बांसुरी बजाना ही बंद कर दिया है।’
मेघा को गुस्सा आ गया। उसने काले बादलों को आदेश देकर सुंदरपुर में मूसलाधार बारिश करवा दी, साथ ही बिजली चमकने लगी। सोम अपनी झोंपड़ी में बारिश रुकने का इंतजार करने लगा। जब बहुत समय बीतने पर भी बारिश नहीं रुकी तो उसे ऊब होने लगी। तभी उसे अपनी बांसुरी की याद आई। उसने बांसुरी की तान छेड़ दी।बादलों ने बांसुरी की मनमोहक तान सुनी तो वे बारिश करना ही भूल गए। काफी देर बार जब सोम ने बांसुरी बजाना बंद किया तो वे वापस लौट गए। लौट कर बादलों ने अपनी राजकुमारी मेघा से कहा, ‘वह इतनी अच्छी बांसुरी बजाता है कि हम पानी बरसाना ही भूल गए।’ गुस्से में भरी मेघा बादलों के झुंड के साथ सुंदरपुर गांव के ऊपर गई। सोम अब तक बांसुरी बजा रहा था। ‘जा, आज से तू मोर बन जा।’ मेघा ने गुस्से में कहा। सोम तुरंत मोर बन कर बादलों को ताकने लगा। ‘मुझे किस बात की सजा दी गई है?’ मोर बने सोम ने पूछा।
‘तेरी बांसुरी की तान से मेरे बादल पानी बरसाना ही भूल गए। अब तू मोर बन कर नाच।’ मेघा ने कहा। ‘जरूर नाचूंगा, लेकिन मेरी आवाज सुन कर बादल मेरी ओर दौड़ कर आएंगे तो उन्हें कैसे रोकोगी?’ मोर ने इठला कर पूछा। मेघा ने सुना तो उसे पश्चाताप हुआ। उसने अपनी हार मान ली और बोली- ‘ठीक है, मैं तुम्हारी बांसुरी की आवाज तुम्हारे कंठ में समाने का वरदान देती हूं। तुम्हारी आवाज ही नहीं, पक्षियों में तुम्हारा रंग-रूप भी सबसे निराला होगा। बस, अब एक बार अपना स्वर सुना दो।’ मोर बना सोम मधुर स्वर में गा-गा कर झूमने लगा। बादल भी उल्लसित होकर झूम उठे और झमाझम बारिश करने लगे। आज भी मोर और बादल एक-दूसरे को देख कर झूम उठते हैं। तभी से उनकी दोस्ती बिल्कुल पक्की हो गई है। मोर ज्यों ही उन्हें पुकारता है, बादल दौड़े चले आते हैं।
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