पूनम नेगी
वे नहीं जानते कि खिलौने, गुब्बारे, चॉकलेट, गुड़िया-गुड्डों, झूलों और किताबों की दुनिया कैसी होती है। तमाम जागरूकता अभियानों और बालश्रम कानूनों के बावजूद समाज में बढ़ती संवेदनहीनता का नतीजा है बाल मजदूरी। सुख-सुविधाओं की चाह में हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग आज इस कदर स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो गया है कि छोटे-छोटे मासूमों से मजदूरी कराने में उसे जरा भी हिचक-तकलीफ नहीं होती। लोगों की खुदगर्जियों के कारण बाल मजदूरी के दलदल में छोटे-छोटे बच्चों की जिंदगी गुलाम बन कर रह गई है। इन भोले चेहरों की हंसी बुझ गई है। जिस उम्र में इनके हाथों में खिलौने और किताबें होनी चाहिए; वह उम्र अमीर घरों में झाडू-पोछा करने, बर्तन-कपड़ा धोने, ढाबों-होटलों और कल-कारखानों में खटने और कचरा बीनने में गर्क हो रही है।
एक ओर आज हम दुनिया की सर्वाधिक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था हैं। इक्कीसवीं सदी का अत्याधुनिक भारत आज प्रगति के पथ पर काफी तेजी से आगे बढ़ रहा है। विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित कीर्तिमान हमें गौरवान्वित करते हैं, मगर दूसरी ओर बाल मजदूरी का अभिशाप इस सुनहरी तस्वीर का ऐसा विद्रूप पहलू है, जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए शर्म की बात है। बाल मजदूरी आज की एक विकराल वैश्विक समस्या है। इस बुराई के फैलने का मूल कारण हमारी उदासीन मानसिकता है, जिसके चलते ऐसी दोषपूर्ण परिस्थितियां या तो हमें दिखाई ही नहीं देतीं या फिर हम देख कर भी उन्हें अनदेखा कर देते हैं। स्पष्ट है कि जब हम इस कुरीति को बड़ी सामाजिक बुराई के रूप में स्वीकार ही नहीं करते, तो स्वाभाविक है कि उसे सुधारने की कोशिशें भी रस्मअदायगी भर होती हैं। यही वजह है कि हमारे भीतर इन बाल श्रमिकों के प्रति संवेदना किसी खास दिन पर ही जागती है या फिर कोई बहुत बड़ी घटना होने पर।
गौरतलब है कि 1986 में बने बालश्रम कानून के तहत बालश्रम को ऐसे कार्यों के रूप में परिभाषित किया गया, जो एक बच्चे के स्वाभाविक शारीरिक विकास के लिए के लिए हानिकारक हैं। मगर व्यावहारिक धरातल पर देश में इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। विश्व बैंक की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बाल मजदूरों की सर्वाधिक संख्या का मूल कारण गरीबी, अशिक्षा और भारतीय समाज की सामंती विचारधारा है। बेरोजगारी, पारंपरिक पैतृक व्यवसाय और माता-पिता की प्रताड़ना के अलावा वैश्वीकरण, निजीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के साथ सस्ते श्रम की आवश्यकता से भी देश में बालश्रम को बढ़ावा मिल रहा है। जनसंख्या वृद्धि पर रोक न लग पाना भी बालश्रम का प्रमुख कारण है। हम जब तक इन बुनियादी प्रश्नों के प्रति गंभीर नहीं होते, किसी जादू की छड़ी या सिर्फ कानून के भरोसे बालश्रम से देश को मुक्ति नहीं दिलाई जा सकती है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक आज विश्व में इक्कीस करोड़ अस्सी लाख बाल श्रमिक हैं और भारत में लगभग पांच करोड़। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनकी संख्या तकरीबन दो करोड़ है। इनकी सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है और दूसरे नंबर पर बिहार है। लोग इन बच्चों को कम दिहाड़ी पर रखते हैं, लेकिन काम बड़ों से ज्यादा लेते हैं। बालश्रम पर यूनिसेफ का अध्ययन बताता है कि भारत में लगभग पांच करोड़ श्रमिक बच्चों में लगभग उन्नीस प्रतिशत घरेलू नौकर हैं, बाकी अस्सी प्रतिशत असंगठित और कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। तमाम ऐसे बच्चे भी हैं, जिनके मां-बाप मामूली पैसों की खातिर उन्हें ऐसे ठेकेदारों के हाथों सौंप देते हैं, जो इन्हें आधा पेट खाना खिला कर उनसे होटलों, कोठियों, कारखानों में बारह-सोलह घंटे की हाड़तोड़ मजदूरी कराते हैं। यही नहीं, भूल-चूक हो जाने पर इनकी निर्मम पिटाई आम है। ये बाल कामगार पटाखे बनाते, कालीन बुनते, वेल्डिंग करते, ताले और बीड़ी बनाते हैं। खेत-खलिहानों में खटते हैं। कोयले और पत्थर की खदानों से लेकर सीमेंट फैक्ट्रियों तक उनकी गुलामी की दुनिया है। कूड़ा बीनते, भट्ठों पर र्इंट ढोकर परिवार का पेट पालते हैं।
वेल्डिंग का जोखिम भरा काम करने से किसी की आंख चली गई, किसी को टीबी, कैंसर हो गया, तो किसी की जिंदगी में यौन शोषण का जहर फैल गया है। इनसे मादक पदार्थों की तस्करी भी कराई जा रही है। दूर देशों को इनकी तस्करी भी की जाती है।
बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी के मुताबिक बाल दासता एक मानसिकता है। निर्बल को गुलाम बनाने वाली सोच है। कई बीमारियों की जड़ है। इसके कारण कई जिंदगियां तबाह होती हैं। यह एक सुसंगठित अपराध है, जो पैसे कमाने का जरिया बना हुआ है। यह मानव तस्करी, बाल बंधुआ मजदूरी कराने वाला गठजोड़ है, जो भ्रष्टाचार से भी जुड़ा हुआ है। आज दुनिया भर में सोलह सौ अरब डॉलर सालाना युद्ध कार्यों पर खर्च किया जा रहा है। जबकि महज चालीस अरब डॉलर सालाना खर्च करने से दुनिया का हर बच्चा शिक्षा पा सकता है। बच्चे सरकारों की प्राथमिकता में नहीं हैं। सबसे कम बजट शिक्षा, स्वास्थ्य और बाल सुरक्षा का है।
सचमुच कितना विरोधाभास है कि एक ओर तो हम दुनिया के सर्वाधिक युवा राष्ट्र होने पर गर्व करते हैं, मगर वहीं सर्वाधिक बाल मजदूरी का कलंक भी हमारे माथे पर लगा है। भारत के बालश्रम प्रतिबंध एवं नियमन संशोधन अधिनियम के तहत चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराने पर दो साल की सजा का प्रावधान है। मगर राजनीतिक और सामाजिक इच्छाशक्ति के अभाव में यह कानून बौना साबित हो रहा है। दरअसल, बच्चों को मजदूरी के दलदल से निकालने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, हम सबकी है। इस सामाजिक बुराई के खात्मे के लिए सरकारों और समाज को मिल कर पूरी इच्छाशक्ति से जुटना होगा तभी हम अपने माथे पर लगा यह बदनुमा कलंक मिटा सकेंगे। गरीबी, लाचारी और अशिक्षा के चलते आज भी देश में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जो बाल मजदूरी के दलदल में फंसे हुए हैं।
देश से बाल मजदूरी का खात्मा करने के लिए सबसे पहले देश से गरीबी को खत्म करना जरूरी है। इसके लिए सरकार को कुछ और कड़े कदम उठाने होंगे। अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ेगा। लेकिन सिर्फ सरकार के कड़े कदम उठाने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए देश के हर नागरिक को बाल मजदूरी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। हम सभी की जिम्मेदारी है कि जहां भी बाल मजदूर दिखें, उन्हें काम से रोक कर समस्या को दूर करने का प्रयास करें तथा प्रशासन को सूचना दें। इसमें हमारी भागीदारी हमारा नैतिक कर्तव्य है। गरीब बच्चों की विवशता के कारण हमारा समाज उनका शोषण करता है। फिर वे जूठन खाते, बुझे हुए सिगरेट-बीड़ी के टुकड़ों से धुआं उड़ाते, कुपोषण के शिकार बन कर कभी-कभी अपराधी भी बन जाते हैं। बाल मजदूरी की एक सबसे बड़ी वजह अशिक्षा भी है। इसके लिए बच्चों में सबसे पहले शिक्षा के स्तर को बढ़ाना होगा। जब तक बच्चे शिक्षित नहीं होंगे, तब तक बालश्रम जैसी समस्या खत्म नहीं होगी।

