रिनाला खुर्द
रिनाला खुर्द की सारी कथाएं एक नहीं, कई-कई छूट गई, बिछड़ गई चीजों को खोजने, पाने और पाकर खो देने का मार्मिक कौतुक रचती हैं। इसमें मधु अपनी नरगिस को ही नहीं, या चाईजी अपने संदूक को ही नहीं खोजते, इसमें सियासत की शतरंज की बिसात बना कर दो टुकड़ों में तोड़ दिए गए शरीर, अपने अलग कर दिए रिश्तों, खेत-खलिहानों, घर-बगीचों और अपने ही जिस्म से अलग काट दिए अंगों की खोज में विकल भटकते हैं। 1947 में देश विभाजन पर बहुत-सी कहानियां और उपन्यास लिखे गए हैं। लेकिन ईशमधु तलवार का यह छोटा-सा उपन्यास अपने आकार से बड़ी कथा इसलिए भी कहता है, क्योंकि यह विभाजन के दशकों बाद की स्मृतियों का विचलनकारी वृत्तांत है। महत्त्वपूर्ण यह है कि ये स्मृतियां सिर्फ किन्हीं कुछ पात्रों की निजी स्मृतियां नहीं रह जातीं, वे दो समुदायों, दो देशों, दो इतिहासों और मिथकों के अटूट, अविभाज्य, निरंतर अंतरसंबंधों की कहानी भी बन जाती है।
इस उपन्यास को पूरा पढ़ जाने के बाद फिर से वही अनुत्तरित सवाल उठ खड़ा होता है कि ऐसा क्यों है कि 1989 के बाद, जब पश्चिम में दो टुकड़ों में तोड़ दिए गए देशों के बीच की दीवारें ढह जाती हैं, तरह-तरह की सियासतों द्वारा खींची गई तमाम सहजद्वंद्वियां टूट-बिखर रही हैं, पूरब में क्यों वे दीवारें और मजबूत होती जा रही हैं, खाइयां चौड़ी और गहरी क्यों होती जा रही हैं। उपन्यास में सूखी नदी के स्रोत की तलाश के माध्यम से प्रेम के उस विलुप्त होते स्रोत की तलाश की कोशिश भी बड़ी शिद्दत से दिखाई देती है, जिसके ऊपर नफरत की दीवार खींच दी गई। उपन्यास में किस्सों के भी अनेक स्रोत हैं, जो अंत तक पढ़ने वाले का ध्यान नहीं हटने देते।
रिनाला खुर्द : ईशमधु तलवार; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 150 रुपए।
कथा विराट
सरदार पटेल इस उपन्यास के महानायक हैं। अन्य अनेक समकालीन राजनीतिक व्यक्तियों की भांति सरदारश्री को लेखन या आत्मकथा-लेखन में कोई रुचि नहीं थी। वे मात्र कर्म में विश्वास रखते थे। आत्मश्लाघा से कोसों दूर थे। यही कारण है कि सरदार पटेल के पत्रों और भाषणों के अनेक वृहद संकलन तो उपलब्ध हैं, पर उनकी लिखी कोई पुस्तक सुलभ नहीं है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान और उसके पश्चात सरदारश्री ने गुरुतर दायित्वों का निर्वाह किया। स्वातंत्र्योत्तर काल में मात्र सवा-तीन वर्ष का जीवन उन्हें मिल सका। उस अत्यल्प अवधि में उन्होंने राष्ट्र-निर्माण के इतने काम किए, जितने दूसरे नेतागण कई दशक में भी नहीं कर सकते। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि सरदार पटेल के जीवनकाल में मौलाना आजाद, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, मधु लिमये आदि जो उनके प्रमुख आलोचक हुआ करते थे, उन्होंने उनके महाप्रयाण के बाद न सिर्फ उनके बारे में अपनी राय बदली और उनकी भरपूर प्रशंसा की, बल्कि सरदार पटेल के बारे में अपनी पूर्व धारणाओं को लेकर पश्चाताप भी किया।
अपने विरोधी वामपंथियों को सरदार पटेल ने चुनौती देते हुए अनेक बार निरुत्तर किया था। जहां तक स्वयं पर व्यक्तिगत प्रहार का प्रश्न है, उसके उत्तर में उन्होंने ओजस्विता के साथ एक बार कहा था- ‘मुझे किसी से सोशलिज्म सीखने की जरूरत नहीं। मैंने वर्षों पहले ही फैसला किया था कि यदि सार्वजनिक जीवन में काम करना हो, तो अपनी मिल्कियत नहीं रखनी चाहिए। तब से आज तक मैंने अपनी कोई चीज नहीं रखी। न मेरा कोई बैंक एकाउंट है, न मेरे पास कोई जमीन है और न मेरे पास अपना कोई मकान है।’ भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गए आधुनिक महाभारत की यह वृहद कथा उपन्यास में अठारह अध्यायों में दिलचस्प और तथ्यपरक ढंग से शृंखलाबद्ध है। यह सन 1915 से 1950 तक के पैंतीस वर्षों के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण का एक सजीव इतिहास है।

कितना समय कठिन
कितना समय कठिन’ नवगीतकार घमंडीलाल अग्रवाल के सत्तर नवगीतों का संग्रह है। इसके नवगीत बार-बार आश्वस्त करते हैं कि चाहे कितना कठिन समय हो, उसको पार करने में हम जरूर सफल होंगे। ये नवगीत समय की नब्ज पर हाथ रखते हैं और समाज की उस पीड़ा का बयान करते हैं, जो हर मानव के हृदय में विराजित हैं। ये उन विसंगतियों पर भी प्रहार करते हैं जो आए दिन जहां-तहां देखने को मिल जाती हैं। इन नवगीतों में युगानुरूप अभिव्यक्ति के सहज दर्शन होते हैं और ये कुछ नया करने को आतुर हैं। यथार्थपरक जनचेतना एवं जनसंवाद धर्मिता वाले इन सार्थक गीतों में भविष्य की संभावनाएं भी छिपी प्रतीत होती हैं। नवगीत के मानकों को इन्होंने पूरे मन से आत्मसात किया है। सहज भाषा-शैली, ग्राह्य कथ्य व कूट-कूटकर भरी संवेदनशीलता इन नवगीतों की अतिरिक्त विशेषताएं हैं। संग्रह के शीर्षक गीत ‘कितना समय कठिन’ की निम्न पंक्तियों की व्यंजना देखते ही बनती है: ‘हुई मतलबी उजली रातें/ अवसरवादी दिन/ द्वार-द्वार पर लिखा हुआ है/ कुत्तों से बचना/ रखना सावधानियां वरना/ होगी दुर्घटना/ हमसे अपना साया ही अब/ ले बदले गिन-गिन।’

मैं भी
मैं भी’ (मी टू) एक आंदोलन की भांति विश्व के पटल पर अतीसा मिलोना द्वारा ट्विटर पर एक टिप्पणी से उभर कर छा गया है। नारी जगत पुरुषों द्वारा यौनाचार, असंगत व्यवहार एवं बलात्कार जैसी घटनाओं का शिकार रहा है। न केवल किसी विशेष शहर या देश में, बल्कि पूरे विश्व में स्त्रियां ऐसे व्यवहारों से पीड़ित हैं। समय के बदलते दौर में भी पुरुषों की मानसिकता में कोई रचनात्मक सुधार नहीं देखा गया और स्त्रियां ऐसे व्यवहारों को झेलती रही हैं। प्रस्तुत काव्य संकलन में ऐसी ही कुछ आपबीती व्यथाओं की चर्चा है, जिसे कवि ने प्रस्तुत कर समाज को झकझोरने का प्रयास किया है। ‘मैं भी’ शीर्षक के माध्यम से सभी की व्यथा को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। इसका शिकार केवल एक नहीं अनेक महिलाएं हैं और न केवल महिलाएं, पुरुष भी हैं, जिन पर इस तरह के अत्याचार होते आ रहे हैं। ‘मैं भी’ में एक नए प्रयोग की कविताएं हैं, जो नारी मन की व्यथाओं का आइना है समाज के लिए। उन पर सोच-विचार की जरूरत है। समाज के परिष्कार की जरूरत है ताकि ‘यत्रार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ का वास्तविक आचरण बन सके।


