मेरी फितरत है मस्ताना
गलियां, तेरे संग यारा, कौन तुझे यूं प्यार करेगा, मेरे रश्के-कमर, मैं फिर भी तुमको चाहूंगा- जैसे दर्जनों लोकप्रिय गीत लिखने वाले मनोज ‘मुंतशिर’, फिल्मों में शायरी और साहित्य की अलग जगाए रखने वाले चुनिंदा कलमकारों में से एक हैं। उनकी काबिलियत इससे भी आंकी जा सकती है कि मनोज दो बार आइफा अवार्ड, उत्तर प्रदेश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘यश भारती’, दादा साहब फाल्के एक्सेलेंस अवार्ड समेत फिल्म जगत के तीस से भी ज्यादा प्रतिष्ठित पुरस्कार हासिल कर चुके हैं। फिल्मी पंडित और समालोचक एक स्वर में मानते हैं कि ‘बाहुबली’ को हिंदी सिनेमा की सबसे सफल फिल्म बनाने में मनोज ‘मुंतशिर’ के लिखे हुए संवादों और गीतों का भरपूर योगदान है। रुपहले परदे पर राज कर रहे मनोज की जड़ें अदब में हैं। देश-विदेश के लाखों युवाओं को शायरी की तरफ वापस मोड़ने में मनोग जी भूमिका सराहनीय है। ‘मेरी फितरत है मस्ताना…’ उनकी अंदरूनी आवाज है। जो कुछ वे फिल्मों में नहीं लिख पाए, वह सब उनके पहले कविता संकलन में हाजिर है।
मेरी फितरत है मस्ताना : मनोज ‘मुंतशिर’; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

चारु रत्न
कुंदर महानगर में रहने वाली पैंतीस साल की सुखी महिला, एक चीज, जिससे आज तक निकल नहीं पाई- डर। ऐसा कुछ नहीं, जो उसके आने के साथ जोड़ दिया जाए, सिवाय इसके कि उसकी रोने की आवाज दादी को तीर की तरह चुभी थी। पापा के दफ्तर के लोगों ने बेटी के होने के बारे में जाने बिना ही टोक दिया था, विजय, तेरा चेहरा उतरा हुआ क्यों है? इन सबसे बेखबर मां के प्यार के साथ वह पल रही थी। जिंदगी तब बिल्कुल बदल गई, जब उसके जीवन की उस गलती के लिए, जो उसने की ही नहीं थी, मां ने बिना सुने ही सजा सुना दी। जहां हर लड़की को शादी के बाद मायका खोने का दुख होता, वह चाहने लगी, शादी जल्दी हो तो अच्छा है, उसे अपनी पहचान बनाने का मौका दोबारा मिलेगा। यहां तक के सफर में जाने कितने मौके आए, जब उसे लगा, उसका जीना बेवजह है, पर आत्महत्या! वह भी बुजदिल लोग कहां कर पाते हैं? बस एक ही काम वह पूरी शिद्दत से करते हैं- समझौता। ऐसे ही समझौतों और उतार-चढ़ाव की कहानी है- चारु रत्न की कहानी। शादी के सालों बाद कैसे वह अपने छोटे से शौक के सपने देखती है और अपने डर को जीतने की एक-एक सीढ़ी चढ़ती है। जीवन के विविध रंगों को उकेरता, मानवीय संबंधों को रेखांकित करता उपन्यास है ‘चारु रत्न’।
चारु रत्न : स्वाति गौतम; प्रभात प्रकाशन, 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली; 400 रुपए।

कितने भस्मासुर
एक था राजा। एक सुबह उसने देखा, कि ढेर सारे प्रजा जन उसके राजमहल के आगे गुहार कर रहे हैं। राजा यह देख कर आश्चर्यचकित, द्रवित हुआ कि उन लोगों के चेहरे निस्तेज थे, पैर टेढ़े-मेढ़े अशक्त थे। राजा ने अपने प्रधानमंत्री को बुलवाया और कहा, ‘मंत्रीवर, मैं इनकी दशा देख कर बहुत दुखी हूं। राजकोष से तुरंत पौष्टिक आहार एवं औषधियों का प्रबंध किया जाए, ताकि इनके पैर बलिष्ट हो सकें व चेहरे तेजस्वी।’ मंत्री राजा के कान के पास आकर फुसफुसाया, ‘दुहाई हो महाराज की, यदि इनके पैर बलिष्ठ हो गए, और शरीर स्वस्थ हो गए, तो यह इतना झुक कर हमें प्रणाम नहीं करेंगे।’ राजा यह सुन कर अपनी घनेरी मूंछों के बीच मुस्कुराया, और उपस्थित प्रजाजनों को ‘निशुल्क बैसाखियां’ प्रदान करने की घोषणा कर दी। राजा की जय-जयकार से महल की दीवारें हिल गर्इं। ‘न्याय’ शीर्षक इस लघुकथा का संदेश अपने में स्पष्ट है। ऐसी ही अनेक कथाएं ‘कितने भस्मासुर’ में हैं, जो अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही हैं। संग्रह में संकलित इकहत्तर लघुकथाओं में हर एक का अपना रस है। कथाओं की भाषा सरल और सहज है। पठनीयता के पैमाने पर भी यह किताब खरी उतरती है।
कितने भस्मासुर : योगेंद्र शर्मा; नमन प्रकाशन, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए।

