मार्क्सवाद का अर्धसत्य
अनंत विजय की पुस्तक का शीर्षक ‘मार्क्सवाद का अर्धसत्य’ एक बार पाठकों को चौंकाएगा। क्षण भर के लिए उसे ठिठक कर यह सोचने पर विवश करेगा कि कहीं यह पुस्तक मार्क्सवादी आलोचना अथवा मार्क्सवादी सिद्धांतों की कोई विवेचना या उसकी कोई पुनर्व्याख्या स्थापित करने का प्रयास तो नहीं है। मगर पुस्तक में जैसे-जैसे पाठक प्रवेश करता जाएगा उसका भ्रम दूर होता चला जाएगा। अंत तक आते-आते यह भ्रम उस विश्वास में तब्दील हो जाएगा कि मार्क्सवाद की आड़ में इन दिनों कैसे आपसी हित और स्वार्थों के टकराहट के चलते व्यक्ति विचारों से ऊपर हो जाता है। कैसे व्यक्तिवादी अंतर्द्वंद्वों और दुचित्तेपन के कारण एक मार्क्सवादी का आचरण बदल जाता है।
पिछले लगभग एक दशक में मार्क्सवाद से हिंदी पट्टी का मोहभंग हुआ है और निजी टकराहटों के चलते मार्क्सवादी बेनकाब हुए हैं, अनंत विजय ने सूक्ष्मता से उन कारकों का विश्लेषण किया है, जिसने मार्क्सवादियों को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां यह तय कर पाना मुश्किल हो गया है कि विचारधारा बड़ी है या व्यक्ति। व्यक्तिवाद के बहाने अनंत विजय ने मार्क्सवाद के ऊपर जम गई उस गर्द को हटाने और उसे समझने का प्रयास किया है।
‘मार्क्सवाद का अर्धसत्य’ दरअसल, व्यक्तिवादी कुंठा और वैचारिक दंभ को सामने लाता है, जो प्रतिबद्धता आड़ में सामंती, जातिवादी और बुर्जुआ मानसिकता को मजबूत करता है। आज मार्क्सवाद को उसके अनुयायियों ने जिस तरह से वैचारिक लबादे में छटपटाने को मजबूर कर दिया है, यह पुस्तक उसी निमर्म सत्य को सामने लाती है। एक तरह से कहा जाए तो यह पुस्तक इसी अर्धसत्य का मर्सिया है।
मार्क्सवाद का अर्धसत्य: अनंत विजय; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 695 रुपए।
रामदरश मिश्र की लंबी कविताएं
आम जन-जीवन को समग्रता के साथ सकारात्मक दृष्टि से अपने साहित्य में कह देने और काली रात के यथार्थ को स्वीकार करते हुए भी उसमें पल रहे सपनों को देख पाने का साहस रामदरश मिश्र के साहित्य की विशेषता है। सहजता के साथ अपने समय की जटिलताओं को साहित्य के माध्यम से संप्रेषित करने में सिद्धहस्त मिश्र जी आज के उन हिंदी साहित्य के पुरोधाओं में शामिल हैं, जिनको जाने बिना समकालीन हिंदी साहित्य को जानने और समझने का दावा नहीं किया जा सकता। एक महत्त्वूर्ण साहित्यिक काव्य-विधा के रूप में विकसित हो रही लंबी कविता के साथ-साथ मिश्र जी चले हैं। हिंदी में लंबी कविता की समझ, परख और पहचान बिंदुओं के निर्धारण में जिन बड़े साहित्यकारों और आलोचकों का योगदान रहा है, उनमें उनका नाम भी अग्रिम पंक्ति में रखा जा सकता है। लंबी कविता क्या है? इसकी रचना प्रक्रिया क्या है? ऐसे प्रश्नों पर विचार और चिंतन करते हुए शोधार्थियों के लिए मिश्र जी की लंबी कविताएं ही नहीं, उनके द्वारा किया गया आलोचना कर्म भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है।
मिश्र जी की लंबी कविताओं में ‘समय देवता’ और ‘साक्षात्कार’ चर्चित रही हैं। इन कविताओं में जीवन और समाज के यथार्थ को उकेरने के लिए प्रयोग किए गए काव्य-बिंबों में बनावटीपन नहीं है, बल्कि समाज, देश, समय और परिवेश से जुड़े कड़वे सच को रचनात्मकता और सजीवता के साथ प्रस्तुत करने के लिए एक सहज माध्यम के रूप में उभर कर आए हैं। उनकी प्रतिनिधि रचनाओं में शुमार ‘समय देवता’ में नाम-पट्ट का जूते के फटे तल्ले-सा औंधा लटकना, चलते नंगे पांवों में जलती सिगरेट का धंसना, सांस की आंच से शीशे का चटकना, प्रकाश का हांफना, बरसाती पौधे की तरह भूख का उगना आदि बिंब सामाजिक यथार्थ को दर्शाने के लिए प्रयोग में लाए गए हैं। इस संग्रह में मिश्र जी की ऐसी तैंतीस लंबी कविताएं संकलित हैं।
रामदरश मिश्र की लंबी कविताएं : संपा.- वेद मित्र शुक्ल; अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1 ई, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा दिल्ली; 500 रुपए।
अभिनव पांडव विमर्श
प्राचीन क्लासिक ग्रंथों को आधार बना कर रचना करना और उनमें समयानुसार नवीन उद्भावनाएं करना उद्भ्रांत के सृजनात्मक जीवन की मुख्य विशेषता है। उनकी त्रेता, रुद्रावतार, राधामाधव, स्वयंप्रभा, प्रज्ञावेणु, वक्रतुंड, ब्लैकहोल, अनाद्यसूक्त जैसी रचनाएं प्राचीन आख्यानों, मिथक का सृजनात्मक आधार लेकर चलती हैं। उन्होंने महाभारत की कथा के ‘ब्लैक स्पाट्स’ या ‘ब्लैक होल्स’ को रेखांकित कर उनका जो क्रिटीक प्रस्तुत किया और उनका समानांतर भाष्य खड़ा किया और अंतत: कवि-कल्पना को खुल खेलने का अवसर दे अंत में अपने मुख्य चरित्र युधिष्ठिर को जिस तरह से कलिकाल के क्रांतिकारी कार्यकर्ता के रूप में उकेरा है, उसे ऐसे अन्य प्रयोगों को कड़ी के रूप में देखने पर अनेक चीजें स्पष्ट हो सकती हैं।
कवि का मकसद क्या है, यह अंत के दो सर्गों ‘यम धर्म’ और ‘कल्कि धर्म’ में खुलता है। बीच के तीन सर्ग ‘यक्ष धर्म’, ‘धर्म रथ’ और ‘उत्तर धर्म’ इन अंत के दो सर्गों की भूमिका बनाने के लिए थे। यानी कि पहले दो सर्गों में काव्य के नायक युधिष्ठिर की निर्मित मूर्ति को ध्वस्त करने का जो प्रयास कवि ने किया, बाद के तीन सर्गों में उसके पुनर्निर्माण का भागीरथ प्रयत्न दिखाई पड़ता है। ‘कल्कि सर्ग’ में युधिष्ठिर कल्कि अवतार के रूप में आम नागरिक की तरह उतरता है। एक शब्द में कहा जाय तो कवि की यह परिकल्पना ‘फैंटास्टिक’ है यानी अद्भुत, अभूतपूर्व, अतिमानवीय और अलौकिक। महाभारत के युधिष्ठिर को समकालीन क्रांतिकारी चिंतकों का असली वारिस बना दिया। इस पुस्तक के प्रकाशन से एक ओर जहां महाभारत के पुनर्पाठ की प्रेरणा मिलेगी, वहीं उसके संबंध में कवि द्वारा उठाए प्रश्नों और उसमें की गई नई कल्पनाओं को व्यापक स्वीकृति मिलेगी।
अभिनव पांडव विमर्श : डॉ. कर्ण सिंह चौहान; इंडिया नेटबुक्स, सी-122, सेक्टर-19, नोएडा; 225 रुपए।
हमारा जनतंत्र और मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएं
इधर के कवियों में मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएं अपनी सादगी और लोगों के दुख को ईमानदार ढंग से अभिव्यक्त करने के कारण पाठकों में अपनी साख और विश्वसनीयता कायम किए हुई हैं। हिंदी के एक वरिष्ठ अलोचक कह गए हैं कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि कर्म कठिन होता जाएगा।’ एक जिम्मेदार कवि इस चुनौती को स्वीकार करने से बच नहीं सकता। लोगों की संचित चित्तवृत्तियों और स्मृतियों की अभिव्यक्ति कवि-कर्म का अनिवार्य धर्म है। विस्थापित लोगों की स्मृतियों को बहुत मार्मिक ढंग से मिथिलेश श्रीवास्तव ने उकेरा है। जो कवि या रचनाकार आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की आलोचना कर रहे हैं, वे कबीर की भूमिका में हैं। हिंदी कविता में लोकतंत्र की पड़ताल करने वाले कवियों की लंबी और मजबूत परंपरा रही है। मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएं नागार्जुन, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, धूमिल और आलोक धन्वा की राजनीतिक संवेदना को अपने ढंग से आगे बढ़ा रही हैं।
हमारा जनतंत्र और मिथिलेश श्रीवास्तव की कविताएं : संपा. मनोज कुमार सिंह; शिल्पायन, 10295, लेन नं. 1, वैस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली; 495 रुपए।
