जगो देवता जगो
प्रस्तुत कहानी संग्रह के लेखक शंकर कथालेखकों की पीढ़ी के एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं और अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए उनकी एक विशिष्ट पहचान है। प्रचार और शोर-शराबे से अलग रह कर उन्होंने प्रगतिशील लेखन आंदोलन और लघुपत्रिका आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने अपनी ऊर्जा और सक्रियता का एक बड़ा हिस्सा साहित्यिक पत्रकारिता की नई भूमिका के अन्वेषण में लगाया। उन्होंने इस क्रम में अविस्मरणीय कहानियां भी लिखी हैं, जो साहित्य के गंभीर हलकों में सम्मान के साथ पहचानी और सराही गई हैं।
लेखक ने अपनी कहानियों में समसामयिक जीवन-स्थितियों और उनके मानवीय सरोकारों को संलग्नता, स्वाभाविकता और वैचारिकता की गहरी समझ के साथ संवेदनात्मक अभिव्यक्ति दी है। ‘ठिकाने’, ‘ध्वजा’, ‘बत्तियां’, ‘बालकनी’, ‘पहिए’, ‘इम्तिहान’, ‘इश्तहार’, ‘लपटें’, जैसी उनकी कहानियां सामाजिक अंतर्वस्तु, कथाकला, वैचारिकता और सूक्ष्मतर संवेदना की अन्विति के दृष्टांत हैं।
संग्रह में शामिल ‘बत्तियां’ से अलग मुसलिम समुदाय के प्रति दुर्भावना और अंधविश्वास रखने वाले लोगों के लिए ‘रोशनी का काम’ कर रही कहानी ‘इम्तिहान’ को सामाजिक दृष्टिकोण की कलात्मक अभिव्यक्ति है। ‘जगो देवता, जगो’ सांप्रदायिकता से फासिज्म की ओर बढ़ते भारतीय समाज की तस्वीर दिखाने वाली ‘नए अनुभव की अद्वितीय कहानी’ है और ‘पहिए’ किसानों के प्रतिरोध संघर्ष और ‘सत्ता बनाम आम’ की कहानी बयां करती है।
जगो देवता जगो : शंकर; प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 250 रुपए।
कण्व की बेटी
हमारा समय स्त्री संवेदना के लिए हमारे सांस्कृतिक इतिहास का सबसे चुनौतीपूर्ण समय है। हमारे समाज की पुरुषवादी सत्ता आज तक स्त्री के समर्पण और प्रेम को अपना सहज अधिकार समझती आई है। शकुंतला का चरित्र भी एक ऐसा उदाहरण है, जहां स्त्री को पुरुष के उच्छृंखल आचरण के सामने असहाय देखा जा सकता है। ‘कण्व की बेटी’ का उपन्यासकार अपनी कहानी में दुष्यंत के अहंवादी और प्रमादी पौरुष पर पूरी ताकत से चोट करता है और असहाय शकुंतला के बरअक्स एक निर्भीक और स्वाभिमानी शकुंतला को खड़ा करता है। एक बार दुष्यंत द्वारा प्रणय-यात्रा के मंझधार में अकारण छोड़ जाने के बाद ‘कण्व की बेटी’ का स्वाभिमान जाग जाता है। गर्भवती शकुंतला इस वंचना की चुनौती स्वीकार कर समाज से न्याय लेने को तन कर खड़ी हो जाती है। दुष्यंत द्वारा अपनी भूल की क्षमा मांग लेने पर भी उसे रिक्तपाणि लौटा देने वाली शकुंतला हमारे चुनौतीपूर्ण समय की नई नायिका है। समाज से अपना स्वाभिमान छीन कर लेने वाली ‘कण्व की बेटी’ इस विडंबनापूर्ण समय को दी गई चेतावनी है।

कण्व की बेटी : शैलेश कुमार मिश्र; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 325 रुपए।
कारागार प्रबंधन, एक सुधारवादी दृष्टिकोण
लेखकद्वय ने इस पुस्तक में अपने अनुभवों के आधार पर क्रमानुसार कारागार की कार्य प्रणाली के अनुरूप हर तत्त्व को समझाने का प्रयास किया है। किसी व्यक्ति ने अगर अपराध किया है और कारागार में आया है तो उससे किस तरह का व्यवहार किया जाए, जिससे कैदी में सुधार की भावना का विकास हो, साथ ही कारागार कर्मियों में भी यह भावना विकसित हो कि अपने संरक्षण में आए कैदी की मानसिकता को अपराधमुक्त बना सकें। यह इस पर निर्भर करता है कि कारागार कर्मचारियों और बंदियों के मध्य कितने अच्छे तथा आत्मीय संबंध हैं, जिनसे उनका दिन-प्रतिदिन सामना होता है।

दोनों में से कोई भी पक्ष बिना एक-दूसरे की सहभागिता और सहयोग के सफल नहीं हो सकता। इनके मध्य यह भी अत्यंत प्रभावकारी कारक है कि कारागार का वातावरण कितना मानवीय या अमानवीय है और दोनों मुख्य पक्ष कर्मचारी तथा बंदी एक-दूसरे के प्रति कितने आत्मीय हैं। विजय विक्रम सिंह, जो स्वयं एक जेल अधीक्षक भी हैं, का प्रयास है कि हर कर्मचारी चाहे वह बड़े पद पर हो या छोटे पद पर, उसे कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करना चाहिए। कारागार प्रबंधन, एक सुधारवादी दृष्टिकोण : विजय विक्रम सिंह, विभाकार मिश्र; शिल्पायन प्रकाशन, 10295, लेन नं. 1, वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा, दिल्ली; 175 रुपए।

