श्रीकृष्ण रस
भारतीय जीवन में श्रीकृष्ण और उनकी लीला के विविध रूप गहराई तक भिने हुए हैं। प्रतीकों, उत्सवों और तमाम जीवन व्यापारों में कृष्ण आज भी सजीव हैं और जन-जन की आस्था के आधार बने हुए हैं। भारतीय नृत्य, संगीत और चित्रकला में भी कृष्ण अनेकश: उपस्थित देखे जा सकते हैं। उनका चरित्र बहुआयामी है। नायक, योद्धा, मित्र, गोपी, नीतिविद जाने कितने रूप इस लीला पुरुषोत्तम ने धरे हैं, जो जीवन के कड़वे-मीठे सच का साक्षात अनुभव कराते हैं। कृष्ण जैसा संघर्षमय जीवन केवल कृष्ण का ही है। समस्त लोक के कल्याण के लिए कृष्ण ने अपने को सदैव सन्नद्ध रखा, पर स्वयं किसी तरह की आसक्ति से कभी विचलित नहीं हुए। गोपियों के साथ महारास हो या भीषण युद्ध क्षेत्र हो, गुरु का आश्रम हो या राज-भवन श्रीकृष्ण हर अवसर पर देश-काल की मर्यादा का सम्मान करते हैं। ‘श्रीकृष्ण रस’ अखंड जीवन के लिए आमंत्रण है। सकारात्मक भाव, सर्वभूतहित की चेतना और जीवन का अविरल प्रवाह ही श्रीकृष्ण रस है। इसी रस की उद्भावना इस संकलन में प्रस्तुत रचनाओं में प्रकट हुई है। आजकल के विशृंखलित हो रहे जीवन में जब मोह, लोभ और मद जैसी आपदाओं से लड़ने के लिए आंतरिक शक्ति चाहिए, ‘श्रीकृष्ण रस’ एक सबल आधार प्रदान करेगा।


श्रीकृष्ण रस : विद्यानिवास मिश्र; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 495 रुपए।

चौबारे पर एकालाप
इस कविता संग्रह की कविताएं एक विडंबनात्मक समय-बोध के साथ जीने के एहसास को और सघन बनाती हैं। औसत का संदर्भ, नए समय के नए संबंध, खुरदुरापन, स्थितियों के बेढब ढांचे, वजूद की अजीबोगरीब शर्तें, तेजी से बदलता परिवेश, जिनमें जीवन जीने की बुनियादी लय ही गड़बड़ायी हुई है। अपने इस वर्तमान को कवि देखता है, रचता है और कई बार उसका यह विडंबना बोध सिनिकल होने की हदों को भी छूने लगता है। एक तर्कहीन समय और बहुत सारे छद्म के बीच जीते हुए इन कविताओं का अंदाज किसी हद तक एक अगंभीर मुद्रा को अपना औजार बनाता है। जीवन जिसमें सपने, स्मृतियां, उदासी, खीझ, तिक्तता और लाचारी एक दूसरे में घुल मिल गए हैं। इन कविताओं में बहुत सारे विषय और परिस्थितियां हैं, मूर्त और अमूर्त स्थितियों का मिश्रण है, परिदृश्य की एक स्थानिकता है, एक धीमी लय, एक तलाश और अस्त व्यस्तता है, जगमगाहट के पीछे से झांकते अंधेरे कोने-कुचाले हैं, विद्रूपताएं हैं और स्थिति विपर्यय का एहसास है। इस शक्ति-तंत्र में घिरे हुए सामान्य जन की एक गृहस्थी है, जहां घर-कुनबे की मार्मिकता है, जहां वह खुद के पास खुद होने के एहसास को पाना चाहता है।


चौबारे पर एकालाप : अनूप सेठी; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 220 रुपए।

एक नींद हजार सपने
अपने छोटे-छोटे सुखों को महसूस करते और पहाड़ जैसे दुखों से लड़ने को अपनी आदत में शुमार किए लोगों की दुनिया से भूपी जैसा पात्र उठा लेने की सामर्थ्य रखती हैं अंजू शर्मा। उनके पहले कहानी संग्रह ‘एक नींद हजार सपने’ में ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें पढ़ते हुए आप कहीं पाएंगे कि प्रेम-जनित इच्छाएं किसी बंधन की कैद स्वीकार नहीं करतीं, तो कहीं महसूस करेंगे कि तमाम विपरीत माहौल के बावजूद भरोसा अभी कायम है। इनके चरित्र, कहानी पढ़ लेने के बाद भी आसानी से पीछा नहीं छोड़ते। कहीं गुलाबो सामने आ खड़ी होती है, तो कहीं चौरासी में सब कुछ खो चुके सरदार जी। कहीं रेवा और स्वरा तो कभी ‘बंद खिड़की खुल गई’ जैसी वह स्थिति सामने आ खड़ी होती है, जहां विश्वास की घनी धूप के ढलते ही एक परछाई सिर भले ही उठा ले, पर इंसानी जज्बे के आगे वह खुद-ब-खुद बहुत पीछे छूट जाती है। अंजू शर्मा की विशेषता है कि वे एकदम अकेले छूट गए इंसान की तकलीफ भी महसूस करती हैं और बखत के चक्के के गुलाम बने लोगों की नियति भी। बंधी-बंधाई परंपराओं से बाहर निकल एक स्त्री का फैसला सुनाने का साहस तो उनमें है ही, वे गहरे होते विश्वास के रंग को भी खूब पकड़ लेती हैं।
एक नींद हजार सपने : अंजू शर्मा; सामयिक प्रकाशन, 3320-21, जटवाड़ा, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए।