प्रेम का पहला कोण

हमारे जीवन के आसपास बिखरी, अकृत्रिम, निरंतर स्पंदित-सी कहानियां हैं अजयश्री के इस संग्रह में। संग्रह की पहली कहानी ‘क्या नाम दूं’ सबसे लंबी है। इसकी विशेषता संवाद बहुलता के साथ जीवन के क्षिप्रता के साथ आने वाले अनेक अप्रत्याशित मोड़ हैं, जिन्हें आधुनिक जीवन की दृष्टि से हम असंगत भी नहीं कर सकते। अन्य कहानियां आकार में छोटी होते हुए भी मन पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं। ‘मेवालाल’ कहानी चौंकाने वाली और मार्मिक है। सभी पंद्रह कहानियां वैविध्यपूर्ण हैं। लेखक अमर्यादा के मध्य मर्यादा तलाशता दिखता है। उसके पात्र भटकते भी हैं और शीघ्र ही संभल भी जाते हैं। रिश्ते-नातों के मध्य छद्म भी अजयश्री बखूबी उजागर करते हैं। कहानी ‘सिंदूर वाला डिब्बा’ इन अर्थों में एक विशिष्ट कहानी है। लेखक की भाषा बहुत स्वाभाविक है। इसी तरह एक दिलचस्प कहानी है- ‘खानदानी अटैची’। इसके वर्णन में लेखक अपनी पूरी रौ में दिखते हैं। ‘मौगड़ा’ कहानी बेहद पूजनीय है। संग्रह की एक कहानी ‘बिआह-बीए’ देशज भाषा में पूर्णत: संवादों के माध्यम से कही गई है। इन कहानियों का कथा प्रवाह इतना सहज एवं वेगवान है कि रोचकता प्राय: आदि से अंत तक बनी रहती है।
प्रेम का पहला कोण : अजय श्री; अंजुमन प्रकाशन, 942, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद; 150 रुपए।

सुधीर तैलंग के तीर
यह पुस्तक तुधीर तैलंग के राजनीतिक और समसामयिक विषयों पर तटस्थ, लेकिन मारक क्षमता रखने वाले कुछ चर्चित कार्टूनों का सफरनामा है जो आपको सिर्फ मुस्कराने के लिए ही नहीं, समाचारों के अतीत में जाकर उस समय के इतिहास को उकेरने के लिए विवश कर देंगे। बकौल सुधीर- ‘कार्टून किसी भी भाषा में बनाइए, यदि वह असरकार है तो उसका असर पड़ेगा ही। हिंदी का बढ़िया कार्टून अंग्रेजी में घटिया नहीं हो जाएगा। सवाल तो स्वयं को रोज सुधारने और मांजने का है। मैं हर रोज सोचता हूं कि आज से बेहतर कार्टून बनाऊं, यह मेरी रोज की जिद है। कई बार मुझे लगता है, यह देश कार्टूनिस्टों के लिए ही आविष्कृत किया गया था। आजादी की लड़ाई में हजारों लोगों ने इसलिए कुरबानी दी थी कि एक दिन हमारे देश के सारे नेता मिलकर कार्टूनिस्ट नाम के जीव की सेवा करेंगे, न कि जनता की। मैं मानता हूं कि सारे नेता आज पूरे वक्त कार्टूनिस्ट के लिए ही काम कर रहे हैं।’ शायद वे देश के सबसे ग्लैमरस कार्टूनिस्ट थे। जहां देश के अन्य कार्टूनिस्ट अपने कॉलम की जद्दोजहद में लगे थे, वहीं वे समाज के अन्य क्षेत्रों में भी अपनी कला की धमक बखूबी पहुंचा रहे थे। फिर चाहे फिल्म हो या फैशन शे, मीडिया में अपनी पहचान बनाए रखनी ही या राजनीतिक गलियारों में, सुधीर तैलंग इसके माहिर खिलाड़ी थे। सामाजिक सरोकारों के प्रति भी वे हमेशा सजग रहे।


सुधीर तैलंग के तीर : सुधीर तैलंग; प्रतिभा प्रकाशन, 1661, दखनीराय स्ट्रीट, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली; 350 रुपए।

लाल अंधेरा
यह बस्तर क्षेत्र की सच्चाइयों को फिक्शन के माध्यम से सामने लाने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज अधिक है। मूल कहानी का नायक सूदू किसी को भी संवेदना से भर सकता है। आजादी के बाद व्यवस्था के परिवर्तन में सूदू जैसे लोग अनसुने रह गए। उपन्यास में मर्मस्पर्शी विवरण हैं कि जब माओवादी बस्तर में पहुंचते हैं तब सूदू के जीवन में क्या प्रभाव पड़ता है। सूदू की बेटी माओवादियों की बंदूक थाम लेती है जबकि उसका बेटा सोमारू सलवाजुडुम की ओर से बंदूक पकड़ लेता है। एक ही परिवार का इस तरह का विभाजन बस्तर में आम त्रासदी है। यह केवल सूदू की कहानी नहीं है। यह कहानी उस विषयवस्तु के इर्दगिर्द भी बुनी गई है जिसकी इन दिनों व्यापक चर्चा होती है- शहरी माओवाद। यह उपन्यास अपने विषय को चरितार्थ करता है। इसमें नक्सलवाद के उद्भव व विकास का ब्योरा तो है ही, यह भी साफगोई से कहा गया है कि यदि बस्तर अंचल का माओवाद की विभीषिका का समाधान करना है तो बंदूक के साथ-साथ कलम से होने वाले हमलों का भी समुचित उत्तर तैयर रखना होगा।


लाल अंधेरा : राजीव रंजन प्रसाद; यश पब्लिकेशंस, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 199 रुपए।