कुली लाइन्स
यह इतिहास है विश्व के सबसे बड़े पलायन और आप्रवास का, जो लगभग भुला दिया गया। लाखों लोग समंदर से जहाज पर भेजे गए, ऐसे कागजों पर हस्ताक्षर करवा कर, जिन्हें न वे समझ सकते थे, न पढ़ सकते थे। कहानी एक विशाल साम्राज्य के लालच की और हिंदुस्तानियों के संघर्ष की। हिंदुस्तान से दूर कई हिंदुस्तानों की। हिंद महासागर के रियूनियन द्वीप की ओर 1826 ई. में मजदूरों से भरा जहाज बढ़ रहा था। यह शुरुआत थी भारत की जड़ों से लाखों भारतीयों को अलग करने की। क्या एक विशाल साम्राज्य के लालच और हिंदुस्तानियों के संघर्ष की यह गाथा भुला दी जाएगी? एक सामंतवादी भारत से अनजान द्वीपों पर गए ये अंगूठा-छाप लोग आखिर किस तरह जी पाएंगे? उनकी पीढ़ियों से हिंदुस्तानियत खत्म तो नहीं हो जाएगी? लेखक पुराने आर्काइवों, भिन्न भाषाओं में लिखे रिपोर्ताजों और गिरमिट वंशजों से यह तफ्तीश करने निकलते हैं। उन्हें षड्यंत्र और यातनाओं के मध्य खड़ा होता एक ऐसा भारत नजर आने लगता है, जिसमें मुख्य भूमि की वर्तमान समस्याओं के कई सूत्र हैं। मॉरीशस से कनाडा तक की फाइलों में ऐसे कई राज दबे हैं, जो ब्रिटिश सरकार पर गैर-अदालती सवाल उठाते हैं। और इस जिम्मेदारी का अहसास भी कि दक्षिण अमेरिका के एक गांव में भी वही भोजन पकता है, जो बस्ती के एक गांव में। ‘ग्रेट इंडियन डायस्पोरा’ आखिर एक परिवार है, यह स्मरण रहे। इस किताब की यही कोशिश है।

कुली लाइन्स : प्रवीण कुमार झा; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 299 रुपए।
जो दिखता नहीं
जीवन की विकट दुरूहताओं को अपने अनोखे कथा शिल्प से मनोवैज्ञानिक पड़ताल राजेंद्र दानी की सृजनात्मकता निकष है। पिछले लगभग चालीस वर्षों से कथा लेखन में अनवरत सक्रिय शीर्षस्थ कथाकार राजेंद्र दानी का यह पहला उपन्यास ‘जो दिखता नहीं’ के केंद्र में एक ऐसा निम्न मध्यवर्गीय परिवार है, जो पिछले तीन दशक में अपने तमाम संघर्षों के बलबूते अपनी विपन्नता, अपने अभाव, अपने वर्गीय तनाव, अपने संत्रास और अपनी तमाम तरह की निराशाओं से कथित रूप से उबर तो गया, पर नए और उन्नत दर्जे में पहुंच जाने के बाद उसे पता भी न चला कि कब एक अदृश्य संक्रमण के बाद उसे भव्यता और संपन्नता की लालसा में एक रसहीन और प्राणहीन जीवन को अपना लिया है, जहां एक नई अर्थहीनता की शुरुआत हो रही है, जहां कथित शिखर में निहित एक बीहड़ ढलान है और जहां शेष जीवन की अस्मिता भयावह रहस्यमयता के दुर्दमनीय शिकंजे में बुरी तरह फंस चुकी है। अपने इस आख्यान में राजेंद्र दानी ने न केवल इस काल विशेष में अवतरित भूमंडलीकरण और उदारीकरण के दौर में चिह्नित इन भीषण, भयावह जीवन स्थितियों के नेपथ्य में निहित अदृश्य कारकों की शिनाख्त की है, बल्कि उसे अपने रचना कौशल से संप्रेषणीय और पठनीय भी बनाया है।

जो दिखता नहीं : राजेंद्र दानी; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 270 रुपए।
पोले झुनझुने
यह अर्पण कुमार की आज के संश्लिष्ट यथार्थ की शिनाख्त करती कविताओं का संकलन है। यकीनन, यह ऐसी ‘अर्द्धरात्रि’ है, जब अंधेरा ही कुछ के लिए रोशनी है। वही उनकी ताकत है और वही उनका सुकून। यह हकीकत डराती है कि उन्हें उजाले की दरकार नहीं है। कवि ने अंधेरे को अलग-अलग कोणों से देखा और चीन्हा है, यहां तक कि वह दिल्ली को भी अंधेरे में देखना चाहता है, अलबत्ता उसे पता है कि अंधेरे में दिल्ली का चेहरा फक दिखेगा। स्वीकार और स्वाद की धीमी आंच पर सींझने की ख्वाहिश, कवि को अलग पायदान पर खड़ा कर देती है। उसका यह गर्वीला कथन है कि ‘मैंने किसी को नहीं दिया हक कि कोई मेरे गले की नाप ले।’ उसका आत्म-केंद्रीयता या तुनकमिजाजी से वास्ता नहीं है। वह आतताइयों, वधिकों और तानाशाहों के खिलाफ है। ऐसी कविताएं, आधुनिक पारदियों की बेहिचक शिनाख्त करती हैं। पोले को पोला कह कर कवि उस बच्चे की कतार में जा खड़ा होता है, जो राजा को नंगा कहने का साहस रखता है। इन कविताओं में वैविध्य है। कवि प्रेम का आकांक्षी है और प्रेमाकुल भी। इस हिंस्र, असहिष्णु और अराजक समय में प्रेम किसी ताकत, यकीन और आश्वस्ति से कम नहीं है। प्रेम करते हुए निश्चिंत होना इसी विश्वास का प्रतिफल है। यह अकारण नहीं है कि धूप की उष्ण गोद, कवि के लिए सर्वाधिक निरापद और गर्म कोना है। अर्पण कुमार ने जागने की क्रियाओं को बड़े फलक पर उकेरा है। उनके चाक्षुष बिंब आकर्षित करते हैं। यकीनन, जागना दुनिया की सबसे खूबसूरत क्रिया है। वह बदलाव का प्रस्थान बिंदु भी है। इसी क्रम में कवि के लिए धूप से खूबसूरत कोई दूसरा उपहार नहीं है। वह जानता है कि घर न हो तो कहीं भी जाया जा सकताहै। ‘हैव नॉट’ के साथ खड़े इस कवि के लिए ‘हैव नॉट’ होना, सिर धुनने या हताशा या अवसाद का वायस नहीं है। वह ‘नदी के बराबर एक और नदी उतारने’ का ख्वाहिशमंद है।

पोले झुनझुने : अर्पण कुमार; लोकमित्र, 1/6588, पूर्वी रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली; 250 रुपए।
उजाले की मौत
कंप्यूटर युग में कंप्यूटर के समान ही गुणग्राही है लघुकथा। आपको विश्व की कोई भी जानकारी चाहिए, दुनिया के किसी भी कोने में संदेश प्रेषित करना है- इंटरनेट पलों में आपकी समस्या का समाधान कर देता है। इसी प्रकार आज के व्यस्त जीवन से कुछ क्षण चुराकर आप साहित्य की लघु परंतु विशाल आयामों को सकेंद्रित करती इस विधा के माध्यम से बौद्धिक रसपान का आनंद ले सकते हैं। प्रसिद्ध कथाकार अशोक गुजराती की लघुकथाएं इस मापदंड पर पूरी तरह खरी उतरती हैं। इनमें उन्होंने अलग-अलग विषयों को उठाया है। समाज में व्याप्त विडंबनाओं पर व्यंग्यात्मक प्रहार करने की कला में वे निष्णात हैं। इन सभी लघुकथाओं को अद्यतन चर्चित एवं निष्पादित श्रेष्ठ लघुकथा के लिए आवश्यक पैमानों की कसौटी पर आप कस कर देखें तो पाएंगे कि हर दृष्टि से ये सारी रचनाएं परिपूर्ण हैं। इन लघुकथाओं से गुजर कर उनके अंत को आत्मसात करने के पश्चात पाठक को ऐसा लगेगा, जैसे वह पर्वतारोहण के किसी अभियान पर निकला हो और शिखर पर पहुंचकर खुले आसमान के नीचे अपने फेफड़ों को ताजा हवा से उत्फुल्ल कर आत्मिक संतुष्टि तथा प्रफुल्लता की अनुभूति का अनुभव कर रहा हो। विकलता भरा उसका यही संतोष निर्धारित करता है इन लघुकथाओं के रचयिता की यशस्विता का!
उजाले की मौत : अशोक गुजराती; ग्रंथ अकादमी, भवन संख्या-19, पहली मंजिल, 2, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए।

