श्रीशचंद्र मिश्र

बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सतहत्तर साल पुराने कानून को निरस्त कर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। उसने निर्देश दिया था कि अठारह साल से कम उम्र की पत्नी से यौन संबंध बनाने को बलात्कार माना जाए। ऐसा करने वाले पति को पास्को कानून के तहत उम्र कैद तक की सजा हो सकती है। करीब डेढ़ सौ साल पहले अस्तित्व में आए आईपीसी (इंडियन पीनल कोड) में पहली बार विवाह, वैवाहिक या यौन संबंध की न्यूनतम उम्र अठारह साल तय की गई है। पहले आईपीसी की धारा 375 (2) में पंद्रह साल से ज्यादा उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित करने पर कथित बलात्कार के आरोप में सजा देने का कोई प्रावधान नहीं था।

इस मुद्दे पर अभी बहस जारी है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल करना व्यावहारिक होगा या नहीं? पिछले साल मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कहा था कि बाल विवाह एक सामाजिक सच्चाई है। संसद इस पर कानून बना सकती है, लेकिन शीर्ष अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। सरकार की दलील थी कि धारा 375 (2) में फेरबदल से उस लड़की का वैवाहिक जीवन तबाह हो जाएगा, जिसकी अठारह साल से कम उम्र में शादी हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि परंपराओं की आड़ में अपराध की इजाजत नहीं दी जा सकती। बहरहाल, अब सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बाद सवाल उठता है कि क्या बाल विवाह की प्रथा को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है?

पिछली जनगणना के आधार पर जुटाए गए सरकारी आंकड़ों की मानें तो 2011 में उससे पहले के दस सालों की तुलना में बाल विवाह कम हुए। 2001 में जहां अठारह साल से कम उम्र की चौवालीस फीसद लड़कियों की शादी कर दी गई थी वहीं 2011 में यह तीस फीसद रह गया। हिंदुओं और मुसलमानों में यह फर्क अपेक्षाकृत कम आया। सिख और ईसाई समुदाय में यह सुधार ज्यादा दिखा। मोटे तौर पर समाज और परिवार में बच्चों की संख्या पर नियंत्रण और लड़कियों को उपयुक्त शिक्षा दिलाने की बढ़ती मानसिकता को इसका श्रेय दिया जा सकता है। आंकड़े बताते हैं कि निरक्षर लड़कियों का छोटी उम्र में विवाह करने का आंकड़ा जहां अड़तीस फीसद रहा, वहीं महज पांच फीसद ग्रेजुएट लड़कियों की शादी निर्धारित उम्र से पहले हुई।

दस सालों में सुधार निश्चित रूप से हुआ, लेकिन यह आंकड़ों का एक ही पहलू कहा जा सकता है। सुधार मुख्य रूप से महानगरों और बड़े शहरों तक ज्यादा सीमित था। गांव-कस्बों में स्थिति ज्यादा नहीं बदली दिखी। 1978 में शादी की न्यूनतम उम्र तय करने वाला कानून बना था, जिसके मुताबिक लड़कियों की शादी अठारह साल की उम्र से पहले नहीं होनी चाहिए। लड़कों के लिए न्यूनतम उम्र इक्कीस साल तय हुई। 2011 की जनगणना के आधार पर जो सुधारवादी आंकड़े सामने आए, उसी जनगणना के मुताबिक देश में दस से चौदह साल आयु वर्ग के सत्ताईस लाख बयालीस हजार सात सौ चौदह बच्चे विवाहित थे। इनमें लड़कियों की संख्या ज्यादा थी। राजस्थान में तो 2001 के बाद दो लाख तिरपन हजार चार सौ तिरानबे बाल विवाह हुए, जो पूरे देश में हुए ऐसे बेमेल गठजोड़ का 9.24 फीसद था। हालांकि सरकारी आंकड़ों ने इस प्रचलित धारणा को झुठलाया कि राजस्थान में बाल विवाह का चलन सबसे ज्यादा है। कुछ राज्य उससे भी आगे दिखे। आबादी के अनुपात में बड़े राज्यों में दस से चौदह साल के विवाहित बच्चों की संख्या ज्यादा रही।

बाल विवाह की कुप्रथा किसी राज्य विशेष तक सीमित नहीं है। पूरे देश में यह सामाजिक व्याधि पनपी हुई है। कहीं कम है, तो कहीं ज्यादा। झारखंड में 2001 से 2011 के बीच पचहत्तर हजार सत्ताईस (2.74 फीसद), ओडिशा में उनसठ हजार पांच सौ तेरह (2.17 फीसद) और असम में अड़तालीस हजार आठ सौ सड़सठ (1.78 फीसद) बाल विवाह हुए। दक्षिण भारतीय राज्यों में सिर्फ केरल में कम बाल विवाह हुए। शिक्षा के प्रचार-प्रसार की वजह से वहां यह कुप्रथा ज्यादा प्रचलित नहीं हो पाई। लेकिन बाकी तीन दक्षिणी राज्यों में स्थिति बिगड़ी हुई रही। कर्नाटक में एक लाख पैंतालीस हजार दो सौ सत्ताईस बाल विवाह हुए, जो कुल संख्या का 4.16 फीसद था। तमिलनाडु में 3.08 फीसद से चौरासी हजार पांच सौ उन्यासी और आंध्र प्रदेश में 5.30 फीसद से एक लाख पैंतालीस हजार दो सौ सत्ताईस बाल विवाह होना बताता है कि भाषा और परंपराएं भले अलग हों, लेकिन बुनियादी मानसिकता इन राज्यों में भी बाकी देश से अलग नहीं है। दिल्ली में फीसद भले 0.60 रहा, लेकिन दस साल में सोलह हजार चार सौ उनतालीस बाल विवाह होना चौंकाने वाला आंकड़ा रहा।

कम उम्र में शादी मानसिक, शारीरिक और चिकित्सीय जटिलताएं तो पैदा करती ही हैं, कई तरह के अभिशाप भी उससे जुड़ जाते हैं। खासकर लड़कियों के लिए। विधवा होने का दंश तो सिर्फ एक पहलू है। ऐसे मामलों में अलगाव और तलाक भी बढ़ रहा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक एक लाख छिहत्तर हजार साठ लड़के-लड़कियों को इस तरह की समस्याओं से जूझना पड़ा। उत्तर प्रदेश (इकतीस हजार छह सौ चौरानबे), महाराष्ट्र (28 हजार 551), बिहार (15 हजार 526), पश्चिम बंगाल (13 हजार 130(गुजरात 11 हजार 289), मध्य प्रदेश (10 हजार 660) और आंध्र प्रदेश (10 हजार छह) इस मोर्चे पर सबसे आगे रहे। राजस्थान में दो लाख 53 हजार 493 बाल विवाह जरूर हुए, लेकिन विधवा होने या अलगाव और तलाक के मामले 6,727 ही हुए। कर्नाटक में यह अभिशाप 8,836, तमिलनाडु में 7,002, ओडिशा में 5,385, झारखंड में 4,599, पंजाब में 3,902, असम में 3,817, हरियाणा में 2,794, छत्तीसगढ़ में 2,791 और केरल में 2,327 लड़के-लड़कियों को झेलना पड़ा।

जनगणना के सात साल पुराने आंकड़ों में महानगरों और बड़े शहरों में बाल विवाह की घटती दर और आबादी को देखते हुए बाल विवाह की संख्या को आनुपातिक रूप से मान कर उस पर संतोष नहीं किया जा सकता और न ही उसकी तरफ से आंखें मूंदी जा सकती है। कहने को इस कुप्रथा को रोकने के लिए कानून बरसों से बना हुआ है और अब सुप्रीम कोर्ट ने इसमें नया प्रावधान कर कानून को असरदार बना दिया है। लेकिन व्यवहार में उस पर सख्ती से क्या अमल हो पाएगा? एक तो यह चलन परंपराओं से जुड़ा हुआ है, जिसे तोड़ पाना आसान नहीं होता। राजनीतिक स्तर पर इस मामले में हस्तक्षेप से परहेज किया जाता है। बाल विवाह को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण मिलने के कई मामले सामने आते भी रहे हैं।

बाल विवाह को तत्काल खत्म करने की जरूरत रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह राय भी दी कि इस प्रथा को प्रश्रय देने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। स्थिति सचमुच भयावह है। सुप्रीम कोर्ट ने 2005 के तीसरे राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों को अपने निष्कर्ष का आधार बनाया था। उसके मुताबिक छियालीस फीसद महिलाओं की शादी अठारह साल से कम उम्र में कर दी गई थी। सामाजिक तथा महिला संगठनों का मानना है कि दो करोड़ तीस लाख से ज्यादा लड़कियों की शादी उनके बालिग होने से पहले कर दी गई। कानून बदलने से पहले कर दी गई। कानून बदलने से इन आंकड़ों को नया विस्तार नहीं मिलेगा, इसे लेकर संदेह है। जरूरत सामाजिक और पारिवारिक सोच बदलने की है। यह गैर-सरकारी और गैर-राजनीतिक अभियान से ही संभव हो सकता है।