भारतीय लोक समाज रागात्मक समाज है। यह प्रेम की धुन पर नाचने वाला है। बच्चन ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पश्चिम का समाज और सिनेमा विज्ञान, तकनीक, बौद्धिकता पर बल देता है, जबकि भारतीय समाज और सिनेमा प्रेम, शृंगार और मानवीय साहचर्य पर बल देता है। इसे विद्यानिवास मिश्र दूसरे ढंग से कहते थे कि भारतीय समाज में पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ झगड़ा कर साथ रहते हैं। आपस में लड़ते, झगड़ते, उलझाते, सुलझाते रहते हैं, जबकि पश्चिम में लड़ते-झगड़ते ही अलग हो जाते हैं। यहां संबंध और रिश्तों के बीच प्रेम एक मूल्य की तरह बना रहता है, जबकि पश्चिमी लोगों के बीच आजादी और तलाक मूल्य बन जाता है। भारतीय संस्कृति में तलाक एक बुराई और नकारात्मक चीज है, जबकि पश्चिम में यह व्यक्ति की आजादी। यहां सामुदायिकता और प्रेम की भावना प्रबल है, जबकि पश्चिमी लोगों में व्यक्तिवाद और स्वतंत्रता के मूल्य महत्त्वपूर्ण हैं।
प्रेमाख्यान लिखने वाले महाकवि जायसी ने भारतीय आदर्शात्मक प्रेम को रेखांकित करने के लिए पद्मावत में ‘जहवां राम तहां संग सीता’ लिखा। यह रामकाव्य का स्थायी मूल्य ही है। भारतीय फिल्मों में भी साथ जीने-मरने की कसमें खूब खाई गई हैं। संस्कृत साहित्य के केंद्र में भी प्रेम, शृंगार और प्रकृति ही है। कालिदास प्रेम, सौंदर्य और प्रकृति के ही कवि माने जाते हैं। उन्होंने ‘कुमारसंभव’ में ‘शिव-पार्वती के उद्दाम वासनामय, रति श्रम क्लांत प्रेम का चित्रण किया है। प्रेम को फिजिकल बनाया। आदिकवि का रचना स्रोत भी मिथुनरत क्रौंच वध ही था।
प्रेम और शृंगार भारतीय लेखकों का उपजीव्य रहा है। कामसूत्र भारतीय साहित्य को नैरेट करता रहा है। जयदेव और विद्यापति तो आज के युवाओं के ‘डेटिंग स्टाइल’ के कवि हैं। कृष्ण पहले से ही मिलन के निर्धारित समय और स्थान पर पहुंच कर राधा का इंतजार कर रहे हैं और व्याकुल होकर बार-बार बुलावा भेज रहे- ‘समय संकेत-निकेतन बैसल, बेरि-बेरि बोलि पठाव’। कृष्ण काव्य में ‘डेटिंग’ के बहुत चिह्न मौजूद हैं। राधा और कृष्ण दोनों डेटिंग करते हैं। शुक्लाभिसारिका और कृष्णाभिसारिका नायिका भेद डेटिंग के ही नाम हैं। पुराने जमाने में बसंतोत्सव और मदनोत्सव डेटिंग के ही रूप थे।
संस्कृत से लेकर रीतिकालीन कवियों ने प्रेम को जितना आध्यात्मिक बनाया, उतना ही फिजिकल भी बनाया है। जायसी सुहागरात को प्रेम और यौनिक आक्रमकता से भर देते हैं- ‘कंचुकि चूर चूर भै ताने/ टूटे हार मोंति छहराने’ या ‘अधर अधर सों चाखन कीजै’। वे तो यहां तक कहते हैं कि प्रेम का सुरा पी लेने से हृदय में मरने-जीने का डर ही खत्म हो जाता है- ‘सुनु धनि पेम सुरा के पिएं/ मरन जियन डर रहै न हिएं’। प्रेम के महान आख्यान और वृत्तांत रचने वाले सूफी और रीतिकालीन कवियों ने देह को शृंगार, प्रेम, आकर्षण और उपभोग की चीज बनाया- ‘केलि के राते अघाने नहिं, दिनहि में लला पुनि घात लगाई’। पद्माकर की बालाएं होली के दृश्य-प्रसंग में कृष्ण को गली में नंगा कर चलता करती हैं और धमकाती भी हैं- ‘लला फिर खेलन आइयो होरी’। साथ में यह दोबारा लौट कर आने का भाव-संकेत भी छोड़ जाती हैं। मध्यकालीन कवियों के लिए यह सब त्याज्य चीज नहीं है बल्कि जीवन के सहज प्रसंग हैं। आधुनिकतावादी कवि-आलोचक इसे दबाते-छिपाते गए। जहां देह खुली भी वहां आलोचना का नैतिक आग्रह या पूर्वाग्रह हावी होता गया और उसे ढक दिया। मानो प्रेमालाप किसी और जहां की चीज हो।
