लगातार तीसरी बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर झारखंड के गोड्डा से सांसद बने निशिकांत दुबे का जन्म 28 जनवरी, 1969 को बिहार के भागलपुर में हुआ। इनकी गिनती लोकसभा के उन सांसदों में होती है, जो पूरी तैयारी से जनहित के मुद्दे उठाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से प्रबंधन की पढ़ाई की और उसी दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संपर्क में आए और काफी समय उसके विस्तारक रहे। भाजपा की युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा में सक्रिय रहने के बाद स्वदेशी जागरण मंच में सक्रिय हुए। पंजाब और हरियाणा के प्रभारी रहने के दौरान ही स्वदेशी मेले की शुरुआत करवाई। गाय काटने वाले बूचड़खानों पर रोक लगवाने के लिए साढ़े सात सौ किलोमीटर की पदयात्रा की। अपनी लोकसभा सीट को आदर्श लोकसभा सीट बनाने का दावा करते हैं।

निशिकांत दुबे केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों पर दावा करते हैं कि हम चीजों को बेच नहीं, बल्कि बचा रहे हैं। खनिजों और अन्य संसाधनों से भरपूर झारखंड के विकास में पिछड़ने की वजह वहां लंबे समय तक मजबूत और स्थिर सरकार का न होना बताते हैं। उन्होंने दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव में सहयोगियों के साथ मिल कर पैंसठ से ऊपर सीटें लाएंगे। बातचीत कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : कुछ दिनों में झारखंड में चुनाव होना है। पिछली बार भी केंद्र में सरकार होने के बावजूद भाजपा को वहां बहुमत नहीं मिल पाया था। इस बार क्या स्थिति लग रही है? बहुमत आएगा या नहीं?
निशिकांत दुबे : बहुमत तो पिछली बार भी आया था। पिछली बार आजसू के साथ गठबंधन में चुनाव लड़े थे, करीब पैंतालीस सीटें आई थीं। पर खुद हम सैंतीस सीटों पर रह गए थे। इस बार हमारा लक्ष्य पैंसठ से ऊपर सीटों का है। लोकसभा के जो नतीजे इस बार आए हैं, अगर उसके आधार पर देखें, तो इस बार अपने दम पर और अपने साथियों के साथ पैंसठ से ऊपर सीटें लाएंगे और इस बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी।

पंकज रोहिला : झारखंड में नक्सली गतिविधियां बढ़ी हैं। इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या केंद्र का सहयोग ठीक से नहीं मिल पाया है या राज्य सरकार खुद नाकाम रही है?
’कुछ विशेष क्षेत्रों की आप बात कर रहे हैं। संपूर्ण रूप से देखें तो पिछले पांच साल में नक्सली गतिविधियों में कमी आई है। इसकी वजह यह है कि केंद्र सरकार एक योजना चलाती थी-इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान। इसमें पहले हमारे सत्रह जिले आते थे, अब वे घट कर बारह रह गए हैं। पांच जिले अब मुक्त हो गए हैं। इस दौरान कोई बड़ा नक्सली हमला नहीं हुआ है। जिस नक्सल क्षेत्र विशेष की बात हो रही है, वहां नक्सलवादी अब अपनी वैचारिक लड़ाई से बाहर हो गए हैं। मेरा मानना है कि यह अब एक लेवी वसूलने का साधन बन गया है। उसमें एक समूह दूसरे को, दूसरा समूह तीसरे को मार रहा है। इसमें विकास एक बड़ा मुद्दा है कि बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लोग नक्सली समूह से जुड़ जाते हैं। पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रधानमंत्री खुद उसकी निगरानी कर रहे हैं। जैसे शौचालय बनना था, तो गांव-गांव शौचालय बन गए, सभी घरों में बिजली पहुंच गई, हर गांव तक सड़क पहुंच गई। सस्ता चावल हर किसी तक पहुंच रहा है। इस कारण से वहां नक्सली गतिविधियों में काफी कमी आई है। मैं कहूंगा कि केंद्र की ज्यादा आक्रामक नीति के कारण केवल झारखंड में नहीं, इसके समीपवर्ती दूसरे राज्यों में भी इसका प्रभाव पड़ा है। मैं मानता हूं कि अगर इसी तरह चलता रहा, तो जो छिटपुट घटनाएं हो रही हैं, वे भी नहीं रह जाएंगी।

मृणाल वल्लरी : झारखंड में भीड़ द्वारा की गई हिंसा की घटनाओं को आप कैसे देखते हैं?
’कोई भी सभ्य समाज मॉब लिंचिंग को उचित नहीं ठहरा सकता। उसकी निंदा ही की जा सकती है। किसी आदमी को मारना भारतीय संस्कृति का परिचायक नहीं है। जो भी ऐसा करता है, वह गलत है। अगर आप अलग-अलग घटनाओं को अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में देखेंगे, तो कई बार वोट बैंक की राजनीति भी इन चीजों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती है। मॉब लिंचिंग की घटनाओं को वहां जाकर देखने की जरूरत है कि हकीकत क्या है। देखने की जरूरत है कि जिन्हें दोषी माना जाता है, वे वास्तव में मॉब लिंचर हैं या नहीं, या पुलिस उन्हें बेवजह फंसा रही है। अगर इसे हम देख पाएंगे, तो ऐसी घटनाओं पर काबू पाया जा सकता है।

मृणाल वल्लरी : लेकिन माना जा रहा है कि मौके पर इंसाफ करने की जो प्रवृत्ति है, यह पिछले चार-पांच सालों में ज्यादा बढ़ी है। ऐसे लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिलने के आरोप हैं।
’अगर ऐसी घटनाओं के इतिहास में जाएं, तो अनेक उदाहरण मिलेंगे, जो मामूली उत्तेजना के चलते हुई थीं। नोआखली की घटना भी तो एक मामूली उत्तेजना के कारण ही हुई थी न! भारत का एक इतिहास रहा है। इसमें तीन-चार सालों को नहीं देख सकते। भागलपुर का दंगा मेरे सामने हुआ था। उसमें हुआ बस यह था कि शुक्रवार का दिन था और मस्जिद के आगे से र्इंटा ले जाया जा रहा था, पर वे उसे ले नहीं जाने दे रहे थे। उसी पर गोली चल गई। दंगा हो गया। तो, यह जो संघर्ष 1914-15 के बाद बहुत बढ़ा है। उसके बाद से सैंतालीस तक के इतिहास को देखेंगे, तो आज की भारत की स्थिति भी वही दिखाई देती है। मुसलिम लीग की स्थापना के बाद कांग्रेस ने चुनावी रणनीति बनाने का प्रयास किया और देश दंगों की तरफ चल पड़ा, जो विभाजन का कारण भी बना। तो, आज भी अगर हम इसे वोट बैंक की राजनीति से अलग हट कर नहीं देखेंगे, तो नतीजा वही रहने वाला है। इसलिए सभी दलों को मिल कर सोचना है कि हम देश को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।

सूर्यनाथ सिंह : मगर ऐसी घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी प्रशासन की है। क्या इसे न रोका जा पाना सरकारों की विफलता नहीं मानी जानी चाहिए?
’प्रशासन बहुत कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है। सारे राज्य पैसे की कमी से जूझ रहे हैं। अगर दूसरे देशों की तुलना में इस देश में अपराध कम हैं, तो इसलिए कि आज भी यह देश पाप और पुण्य से चलता है। आप किसी भी पुलिस बल की बात कर लीजिए, हर जगह संसाधनों की कमी है। हर किसी व्यक्ति को सुरक्षा दे पाना पुलिस के वश की बात नहीं। जैसे मैं झारखंड का उदाहरण दूं, तो वहां आर्थिक संकट इतना है कि हम सोच नहीं पाते कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन दे पाएंगे कि नहीं दे पाएंगे। जब तक एक सामाजिक क्रांति नहीं होती, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल बना रहेगा। जब तक हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति नहीं छोड़ेंगे, जब तक सार्वभौम कानून की तरफ नहीं बढ़ेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं नहीं रुकेंगी।

आर्येंद्र उपाध्याय : राज्य घोर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहे हैं, पर केंद्रीय वित्तमंत्री कहती हैं कि हम पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेंगे। यह विरोधाभासी नहीं है?
’विरोधाभासी नहीं है। आप यह समझें कि उन्होंने क्या कहा। उन्होंने एक लक्ष्य दिया। 2014 में हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 1.8 खरब डॉलर था, जो अब तीन खरब डॉलर का होने जा रहा है। अब पांच खरब तक पहुंचने की बात कर रहे हैं। इसके लिए हम निवेश लाने की बात कर रहे हैं। इसमें बैंक बहुत वित्त पोषण में सक्षम नहीं होते। बॉण्ड मददगार होते हैं। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था इसी के जरिए मजबूत हुई है। हमारे यहां पचास-साठ सालों में किसी ने बॉण्ड का बाजार विकसित करने के बारे में नहीं सोचा। यह पहला बजट है, जिसमें इसे विकसित करने की बात हुई है। अगर यह बॉण्ड बाजार विकसित होगा, तो हम विभिन्न क्षेत्रों में भारी खर्च करने में सक्षम हो पाएंगे। इसी से हम पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था तक पहुंच पाएंगे। हम राज्यों को भी प्रेरित कर रहे हैं कि वे लोगों को मुफ्त की योजनाएं न दें, उन्हें काम में लगाएं।

मनोज मिश्र : झारखंड अलग राज्य बना, तो कहा जा रहा था कि दुनिया का सबसे अधिक संसाधन वहां है, वह सबसे अमीर राज्य बनेगा। मगर ऐसा दिख नहीं रहा, ऐसा क्यों?
’इसमें एक कारण तो यह कि जबसे वह राज्य बना है, वहां कोई भी स्थिर सरकार नहीं बनी। गठबंधन सरकारें ही ज्यादा बनीं। इसलिए विकास को लेकर जो सोच होनी चाहिए थी, वह विकसित नहीं हो पाई। उदाहरण के लिए बताऊं, तो रेल की जो कमाई है, उसका चालीस फीसद अकेले झारखंड से आता है, मगर उसका कोई भी मुख्यालय झारखंड में नहीं है। इसी तरह कोल इंडिया का मुख्यालय कोलकाता में है, जबकि देश की सबसे अधिक कोयला खदानें वहां हैं। उद्योगपतियों की बड़ी कमाई झारखंड से होती है, पर उनके मुख्यालय वहां नहीं हैं। झारखंड की कमाई दूसरे राज्यों में जा रही है। इसी तरह झारखंड का बहुत सारा पानी दूसरे राज्यों को चला जाता है। इसकी वजह से हमारे उद्योगों और खेती-किसानी के लिए पानी नहीं मिल पाता। इसके ऊपर राज्य सरकार को जो ध्यान देना चाहिए था, वह नहीं दिया जा सका, जिसकी वजह से वहां पर्याप्त विकास नहीं हो पाया।

मुकेश भारद्वाज : सड़कों का विकास अच्छी बात है, पर उसके लिए जो कर लगाए जाते हैं, उससे कमजोर तबका भी प्रभावित होता है। कार वालों पर तो टोल लगाते हैं, पर बस वालों पर भी वह लागू होता है तो बस का किराया बढ़ जाता है। यह कहां तक ठीक है?
’गडकरी जी कह चुके हैं कि उन्होंने बसों पर टोल खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। केवल यात्री बसें नहीं, बच्चों को लाने-ले जाने वाली बसों को भी उसके दायरे से अलग रखा जाएगा।

दीपक रस्तोगी : एक दौर में राष्ट्रीयकरण की नीति लागू की गई थी। अब निजीकरण की तरफ आगे बढ़ा जा रहा है। इस तरह राज्य का कल्याणकारी पक्ष कैसे मजबूत होगा?
’कांग्रेस ने जो कुछ किया, वह नारे से ज्यादा कुछ नहीं किया। 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। उस वक्त संसद में श्रीमती गांधी ने जो भाषण दिया था, उसे पढ़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा था कि देश के अलग-अलग हिस्सों में क्रेडिट डिपॉजिट रेशियो में बहुत अंतर है। यह तीस से पैंतीस फीसद है। इस तरह अलग-अलग क्षेत्रों में धन का बंटवारा करने में मुश्किल होती है। अब इतने सालों बाद पता कर लीजिए, क्रेडिट डिपॉजिट रेशियो वही तीस से पैंतीस फीसद है। तो, जो मुख्य कारण दिया था उन्होंने वह तो विफल हो गया। 2007 तक सभी बैंकों ने मिल कर करीब तेरह लाख करोड़ कर्ज दिया था। 2014 आते-आते यह कर्ज बढ़ कर बावन लाख करोड़ हो गया। इसके कारण आज यह स्थिति हो गई है कि बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्तियां बढ़ती गर्इं। मगर हम उन नीतियों को ढो रहे हैं। इसी तरह तमाम क्षेत्रों में हो रहा है। अगर बीएसएनएल और एमटीएनएल तथा एअर इंडिया वगैरह का विनिवेश उसी वक्त हो गया होता, तो इनकी दशा ऐसी न रहती। सरकार का काम बेहतर माहौल बनाना है। सरकार यह भी नहीं कह रही है कि पूर्णत: विनिवेश करेंगे। वह इक्यावन फीसद तक करना चाहती है, ताकि उस पर सरकार का नियंत्रण रहे। हम बेच नहीं रहे, बचा रहे हैं।

मृणाल वल्लरी : प्रचंड बहुमत वाले नेता मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत से लेकर सोनभद्र तक के मामलों में जनता से दूर क्यों दिखते हैं?
’एकाध घटनाओं से आप मूल्यांकन नहीं कर सकतीं। मुजफ्फरपुर की घटना से निंदनीय कोई घटना नहीं हो सकती। पर वैधानिकता की जो समस्या है, वह बहुत बाधा पैदा करती है। प्रधानमंत्री ने 2014 के अपने भाषण में ही कहा था कि जहां-जहां अच्छे अस्पताल नहीं हैं, वहां एक-एक एम्स दे दें। जहां तक सोनभद्र की घटना का प्रश्न है, कोई भी सभ्य समाज ऐसी घटना को उचित नहीं कह सकता। जमीन का विवाद देश में इतनी जगह है कि सरकार सबको संभाल नहीं सकती। मगर फिर भी वहां की सरकार ने उस मामले में कड़े कदम उठाए हैं। मैं फिर कहूंगा कि जब तक समाज जागरुक नहीं होगा, सतर्क नहीं होगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर काबू पाना चुनौती बनी रहेगी।