शहर के ठीक बाहर, हाई-वे से लगी पहाड़ी है वह। पहाड़ी काटी जा रही है आजकल। मिट्टी, गिट्टी, पत्थर ढोने वाले दसों ट्रक पहाड़ की तलहटी के पास दिखते हैं। कई क्रशर मशीनें दिन-रात पत्थर तोड़ती रहती हैं। पहाड़ी से तोड़ी चट्टानों को गिट्टियों में तब्दील करती रहती हैं। पर हम अभी यहां पहाड़ी के इस हिस्से की बात नहीं कर रहे हैं। यह तो आजकल हर पहाड़ के साथ हो रहा है। सही कहते हैं आप। हमें भ्रम और विश्वास दोनों है कि पहाड़ कभी खत्म नहीं होने वाले। अरे, हम इसे यहां वहां से थोड़ा-बहुत काट-छांट ही तो रहे हैं। सो, यहां हम वह बात नहीं कर रहे। यहां बात पहाड़ी पर एकदम ऊपर खड़ी एक बड़ी चट्टान की हो रही है।
एक विशालकाय चट्टान है, पहाड़ी की चोटी के ठीक नीचे। विराट। दूर से ही दिखती है। पहचान है वह इस पहाड़ी की। इस शहर की भी। शिला वाली पहाड़ी कहलाती है यह। पहाड़ पर हनुमानजी का मंदिर है। इन हनुमानजी को भी शिला वाले हनुमान कहते हैं। आज इसी चट्टान की बात चल रही है।
चट्टान पहाड़ी पर अटकी-सी है। छज्जा-सा निकला है चट्टान का। पहाड़ी पर यों ही घूमने आ गए लोग। हनुमानजी के दर्शन को आते-जाते भक्तगण कभी-कभी इसकी छांव तले सुस्ताने बैठ लेते हैं। फिर शहर के प्रेमी जोड़ों के लिए तो यह एक महत्त्वपूर्ण मिलन स्थल भी है। शाम को एक-दो जोड़े यहां दिख ही जाते हैं। धूप पड़ती है तो दमक-सी उठती है यह चट्टान।
धूप में दमकती शिला बड़ी भव्य और शानदार दिखती है। मानो कोई बादशाह चमकीला अंगरखा पहने हुए पहाड़ के सिंहासन पर ठाठ से बिराजा हुआ हो और चारों तरफ फैली अपनी सल्तनत को बड़ी शान से देख रहा हो। दूर तक बिखरे शहर को ऐसे गर्व से देखती प्रतीत होती है मानो मालिकाना हक हो उसका इस इलाके पर। वैसे सदियों से वह यहीं है और एक तरह का पुश्तैनी हक-सा बनता तो है उसका। शिला ने सदियों से धीरे-धीरे आबाद होते इस शहर को देखा है।
पर यही चट्टान आजकल डरी-डरी-सी है। घबराई-सी। क्रोधित-सी। चिंतित। भ्रमित। शिला के व्यक्तित्व की वह जानी-पहचानी अकड़ आजकल कहीं दिखती नहीं। पिछले कुछ वर्षों में शहर किसी मायावी राक्षस जैसा बढ़ता गया है। बढ़ते-बढ़ते पहाड़ी की तलहटी तक पहुंच गया है। अब तो पूरे पहाड़ पर ही कब्जे की फिराक में प्रतीत होता है शहर। चट्टान को मैं वर्षों से देख रहा हूं। शाम को अक्सर ही पहाड़ी पर घूमने निकलता रहा हूं मैं। चट्टान के चेहरे से इतना परिचित हो चुका हूं कि उसके चेहरे के हर भाव को पढ़ लेता हूं। दोस्ती जैसी तो नहीं है, पर उससे पहचान-सी बना ली है मैंने।
मैं पा रहा हूं कि चट्टान आजकल अपने अस्तित्व के प्रश्नों से जूझती प्रतीत होती है। पता नहीं कि अपने किसी शिला को फिलॉसफिकल होते कभी देखा है या नहीं। मैं देख रहा हूं। चट्टान चिंतन में डूबी रहती है आजकल। चट्टान के माथे पर बल पड़े दीखते हैं। चट्टान की निगाहों में नमी-सी दिखती है। यहां-वहां पानी ठहरा है। उदास-सी चट्टान मानो हरदम नीचे की दिशा में ही दिखती रहती है, जहां क्रशर मशीनें उसके परिवार की छोटी-बड़ी चट्टानों का कत्लेआम कर रही हैं। नीचे दंगे जैसा माहौल है। वही शोरगुल, वही आपाधापी और वही तोड़फोड़। नीचे पहाड़ी को काटे जा रहे हैं वे लोग। छोटी-बड़ी चट्टानें, उन्मादी-से क्रशरों की चपेट में, आकर चूर-चूर हो रही हैं। शिला इस कत्लेआम को चुपचाप निहारते रहने को अभिशप्त है। वह मानो पहाड़ी की चोटी पर जान बचा कर भाग आई है और यहां से छिप कर दंगे में सबको मरता देख रही है। कैसा बेरहम हो गया है इन्सान कि छोटे-छोटे बच्चों जैसी चट्टानों को भी यों ही काटे जा रहा है!
कर्फ्यू के बीच घर के अंदर बंद आदमी जिस तरह बाहर से आती हर आवाज पर चौंक-चौंक जाता है। वही यहां भी हो रहा है। ट्रकों की आवाजें, क्रशर का शोर, विस्फोटों के धमाके। चट्टान सकते में है। भयभीत भी। चौंक-चौंक जाती है। वे वहां नीचे विस्फोट करके पत्थर उड़ाते हैं, यह यहां कांप-कांप जाती है।
निराश-सी दिखती है शिला आजकल। परेशान भी। सोच में डूबी हुई भी। मानो, पहाड़ पर न होकर किसी रिफ्यूजी कैंप में पड़ी हो।… मानो भरोसा ही न रहा हो अपनी मजबूती पर। क्रशरों को देख-देख कर जीवन की नश्वरता पर भी विचार करती हो तो आश्चर्य नहीं! कहां तो उसे लगता था कि वह हमेशा ही रहने वाली है, पर अब? मानो बुढ़ापा सामने देख आदमी आसन्न मृत्यु की सोचने लगे, आध्यात्मिकता की ओर झुकने लगे! चट्टान मंदिर की ओर झुकने लगी है आजकल। उसके एक हिस्से का रंग पीला भी पड़ गया है इन दिनों। मानो पीतांबर डाल कर संन्यास की तैयारी कर रही है शिला।
पर ऐसा भी नहीं है कि चट्टान जीवन से पूरी निराश हो चुकी हो। अब भी, जब कोई प्रेमी जोड़ा चट्टान की ओट में बैठ कर प्यार से इक-दूजे को निहारते हैं, तब कभी चट्टान को देखो। कितनी आत्मीयता से निहारती रहती है वह भी उनको। माना कि चट्टान चट्टान ही है। कठोर। खुरदुरी। भावहीन-सी। एक हद तक निर्मम-सी। पर प्रेम के स्वप्निल और लगभग मायावी से पलों में डूबे प्रेमियों का लगभग ईश्वर-सा निर्दोष, कोमल और सर्वश्रेष्ठ मानवीय चेहरा देखती है, तो शिला मानो नीचे घट रहा सब भूल जाती है। प्रेम भरे रसीले बोल जब आसपास फूटते, बहते हैं तो प्रेम के सोतों से बहते अमृत जब अमृत जल में वह भीग-भीग न जाती है। प्रेमियों के सान्निध्य में वह शिला कहीं से तो कोमल हो जाती होगी? यह जो चट्टान की दरारों के बीच कुछ कोमल पौधे उग आए हैं, बेसबब तो नहीं!… पर चट्टान का कोमल होना भी ठीक नहीं। एक दिन टूट कर नीचे भी धसक सकती है, तब? हो सकता है कि आदमी की हरकतों से नाराज होकर यह नीचे लुढ़के और नीचे चल रही हर चीज को तहस-नहस कर डाले, तब? अखबार वाले लिखते भी रहते हैं कि विस्फोट कर-कर के, चट्टानें काट-काट के हमने पहाड़ की संरचना को अस्थिर कर दिया है।…
तो कभी यह चट्टान नीचे टपक ही गई तो?
तब जो नुकसान होगा वह तो अलग, पर चट्टान के न रहने पर पहाड़ी की पहचान ही गुम हो जाएगी।… इन दिनों, इसी तरह इस चट्टान को देख कर तरह-तरह के फिलॉसफिकल चिंतन में डूबता-उतरता रहता हूं। बूढ़ा हो चला हूं शायद। तभी।… पर डरता भी हूं कि जैसा मैं सोचता रहता हूं, कहीं शिला ठीक वैसा ही तो नहीं सोच रही! (ज्ञान चतुर्वेदी)