तरुण विजय

इस बार कैलास मानसरोवर हम नाथू-ला से गए। वहां अम्मा, बाबूजी की याद आई। और याद आई रज्जू भैया और यतिजी की। बारह साल पहले जब मैं मानसरोवर के तट पर था तो वहीं चौदह जुलाई को स्वामी चिदानंद मुनिजी के सेटेलाइट फोन से पता चला कि रज्जू भैया नहीं रहे। पुणे में उनका शरीर शांत हो गया। वहीं रज्जू भैया को सबने श्रद्धांजलि दी। उस दल में हमारे साथ आचार्य किशोर व्यासजी भी थे। मानसरोवर के तट पर ही हमने भगवा ध्वज का आरोहण किया, संघ की प्रार्थना की और बुझे मन से मैं अगले दिन यात्रा बीच में कम कर, वापस लौटा।

रज्जू भैया शिवभक्त थे। मेरी पहली कैलास यात्रा को लिखने का उन्होंने ही बार-बार आग्रह किया था। उसको पुस्तकाकार छपवाने में मदद की और बीस वर्ष पूर्व जब संसद में अटलजी और डॉ कर्ण सिंह ने उसका लोकार्पण किया तो वे स्वयं समारोह की अध्यक्षता के लिए आए। साथ में आडवाणीजी थे और समारोह का संचालन किया था आचार्य विष्णुकांत शास्त्री ने। तब डॉ कर्ण सिंह ने शिव और उनके शिवत्व पर अद्भुत व्याख्यान दिया था। एक शिव का दर्शन करने हम कैलास जाते हैं, दूसरे शिव जो हमारे भीतर बसे हैं- उनको देखते नहीं। जहां कल्याण है, किसी की भलाई है, शिव हर उस जगह है। किसी के लिए भी कुछ अच्छा करना, शिव हो जाना है।

शिव होने का यह भाव रज्जू भैया और यति- दोनों में समाया था। यति तो अभी बयालीस के ही हुए होंगे। और इतनी बड़ी विरासत! कश्मीर से उनके दादा बैरिस्टर नरेंद्रप्रीत सिंह हजारों एकड़ जमीन (शायद बत्तीस हजार एकड़ जमीन के वे स्वामी थे) छोड़ कर कानपुर आए थे। दीनदयालजी के नाम पर जब विद्यालय बनाने की बात आई तो बूजी (दादी) ने घर के जेवर देकर विद्यालय बनवाया- किसी से सहायता नहीं ली। अटलजी उनके विद्यालय में पढ़े। पर यति तो मानो शिव की तरह ही थे- औघड़ और अलमस्त। किसी के पद या पैसे से बड़े होने की उन्होंने परवाह नहीं की। ठोकर पर है दुनिया सारी के भाव से काम किया और झेला भी बहुत। दिल्ली आते हुए एक युवक टैक्सी चालक से बतियाने लगे तो उसकी करुण कथा से द्रवित होकर पांच लाख रुपए की टैक्सी खरीदवा दी।

दर्जनों के शादी-ब्याह में चुपचाप मदद की। झुग्गी-झोपड़ी में मरणासन्न और प्राय: परित्यक्त बच्चों को लेकर अपने व्यवसाय की आय से वात्सल्य मंदिर बनवा दिया। ऐसा वात्सल्य मंदिर, मानो वे तमाम अट्ठाईस-तीस बच्चे उनके अपने हों। उनके साथ ही तीज-त्योहार मनाना। उन्हें माता-पिता का वात्सल्य दिया, सुरेशजी को सपरिवार लाए और घर के माहौल में उन बच्चों का लालन-पालन किया। कल ही खबर मिली कि जिस बच्चे को वे लाए थे- तीन-चार साल की उम्र में, उसने आइआइटी की प्रवेश परीक्षा में तीन सौ बत्तीसवां स्थान पाया है। भारत-नेपाल सीमा के गांव परसाई से थारू जनजाति का विजेश कैसे यतिजी के संपर्क में आया और कैसे उसके मजदूर पिता ने अपना बेटा सौंपा यह अलग कथा है। कई मेडिकल में दाखिला ले चुके हैं। कई अन्य बड़े पदों की स्पर्द्धाओं की तैयारी में जुटे हैं।

कितनी जिंदगियां सड़क किनारे, फुटपाथ पर रौंदे जाने से बचीं- कितने भारतीय नई आशा के साथ बेहतर जिंदगी जीने के लिए तैयार हो गए। और यह सब चुपचाप, बिना किसी से एक पैसा मदद लिए, बिना इसका प्रचार किए या मीडिया को बुला कर इंटरव्यू वगैरह दिए किया। मन में बसे थे शिव, तो जीवन जीने की उमंग को यह रास्ता मिला। जिंदगियां गढ़ने, परिष्कृत करने, उनको आगे बढ़ाने की ललक। शिव हो गए यति।

राजनीति के शिखर पर बैठे हर किसी से उनका मिलना-जुलना होता। उनकी अथाह, अकूत संपदा और उस संपदा को और ज्यादा विस्तारित करने की उनकी अदम्य आकांक्षाएं भी वे पहचानते और हंसते। कहते, एक व्यक्ति को बहुत वैभवशाली, शानदार जीवन जीने, बच्चों को सबसे अच्छे स्कूलों-कॉलेजों में यहां और विदेश में पढ़वाने, छुट््िटयां किसी महंगे द्वीप में बिताने जैसा मामला जमाने के लिए कितना पैसा चाहिए? उतना कमा कर बाकी की अभीप्साएं तो छोड़ दो भाई! शरीर से कितना विलास करोगे? कितना कमाओगे कि संभाला भी न जा सके! काहे?

पैंतीस-छत्तीस साल के बाद ही यति का मन कुछ नया, कुछ लोक से हट कर करने का हो गया। कमा लिया, खूब कमा लिया- अब जरूरत ही नहीं तो मैं और क्यों कमाऊं? यह सुन कर हम अचंभित होते। गायों का अर्थशास्त्र समझा तो ऐसी गोशाला बनवाई, जो बाकी के लिए उदाहरण बनी। पाखंड और दोहरेपन पर ऐसी चोटें कीं जिनके कारण कई बड़े-बड़े नाराज हो गए। पर वे तो औघड़ थे- शिव होने का अर्थ समझते थे। परवाह किसी की भी क्यों करते! अचानक कैंसर हुआ। और यों चले गए मानो आहट तक न होने दी।

रज्जू भैया का शिव होना भी ऐसा ही था। प्रयाग विश्वविद्यालय में भौतिकशास्त्र विभाग में अध्यक्ष रहे। उसकी पेंशन, प्रोविडेंट फंड, ग्रेच्युटी सब छात्रों की शिक्षा के लिए देते गए। घर- प्रयाग के सिविललाइन्स की अनंदा कोठी- सामाजिक कार्य, विद्यालय के लिए दे दिया। किसी का बोझा लिया नहीं। युवा सहायक- श्रीश देवपुजारी मिले- तो अधिक वय के साथ अधिक कष्ट होने पर श्रीश को वापस भेज दिया- तुम इतने योग्य और युवा हो- ज्यादा बड़े काम के लिए अपनी शक्ति और समय दो। मेरे लिए इस सबका इतना उपयोग नहीं। अब वक्त काट ही लूंगा!

हम बाजार जा रहे हैं, रास्ते में देखा एक व्यक्ति किसी प्रज्ञाचक्षु को हाथ पकड़ कर रास्ता पार करवा रहा है। वह शिव है। आॅटोरिक्शा में किसी का पर्स छूट गया। वह कोशिश करके, पता ढूंढ़ कर पर्स सही मालिक को लौटा देता है। वह शिव है। पड़ोस में छात्र पढ़ाई में कमजोर है, अपना एक घंटा रोज उसे पढ़ा कर परीक्षा में पास करवा देना- शिव होना है। ट्विटर पर पढ़ा- किसी को स्थानीय अस्पताल में ओ प्लस रक्त चाहिए। चुपचाप जाकर अनजान मरीज को रक्त दे आना- शिव होना है। किसी की गलती पर इतना गुस्सा आए कि चेहरा दमक उठे, मुंह से कठोर शब्द निकलने को हों, हाथ उठने को हों, पर हठात गुस्सा पीकर, हंस कर निकल जाना शिव होना है। पर हम अपने भीतर के कैलास को पहचानते नहीं, और शिव को बाहर ढूंढ़ते हैं। अपने भीतर की लंका छिपाते हैं, बाहर जाकर रावण दहन का पाखंड करते हैं।

हम बात करेंगे चार्वाक की, लेकिन हर गैलीलियो को सजा देने के लिए तैयार रहते हैं। हमारा वसुधैव कुटुम्बकम अच्छा है, पर पड़ोसी इतने साल से ईद क्यों मनाते हैं- इसका इतिहास-विश्वास क्या है, कभी जानने की इच्छा नहीं रखते। हिंदी का झंडा उठाएंगे, क्योंकि वोट के लिए तो बोलना ही है, पर हिंदी सबसे ज्यादा हिंदी प्रदेशों में ही समाप्त करते हैं। न बौैद्धिक संवाद की भाषा, न बच्चों की पढ़ाई का माध्यम। फिर भी चाहेंगे सारा दक्षिण हिंदी पढ़े। गंगा को मां कहेंगे, पर गंदगी गंगा में ही प्रवाहित करेंगे और प्रकृति पूजा हजारों वर्ष पुरानी परंपराओं, शास्त्रोक्त कथनों का उद्धरण देंगे, पर गोमुख से गंगासागर तक प्लास्टिक और पूजा का प्रदूषित सामान बिखरा कर आएंगे।

देवपूजन के लिए कष्ट अपार सहेंगे, लेकिन मंदिर क्षेत्र में बिकने वाले सिंदूर, कुमकुम, चंदन में केमिकल मिश्रित करेंगे। शुद्ध सिंदूर के लिए जाने कहां-कहां भटकना पड़ता है। मिलता ही नहीं। सब कुछ प्रदूषित रासायनिक सस्ता और चलताऊ। भगवान से अपनी तरक्की और बच्चों की खुशहाली मांगेंगे, पर उसी देवता के मंदिर को गंदा रखेंगे। संस्कृत की महानता का बखान करेंगे, पर संस्कृत पढ़ने, सीखने वालों को कहीं अच्छी नौकरी भी मिले, यह सुनिश्चित करना भूल जाएंगे और संस्कृत के विकल्प में चीनी, जर्मन, फ्रांसीसी भाषा उपलब्ध करा देंगे। जाति के खिलाफ बहुत प्रभावी, ओजपूर्ण भाषण देंगे, पर चुनावी दौर से लेकर हर निर्णायक मोड़ पर फैसले सिर्फ जाति के आधार पर करेंगे।
इस पाखंड से लड़ना ही शिव होना है।

बहुत पहले आंध्र के एक जनजातीय बालक तिण्ण की कथा कल्याण में पढ़ी थी। शायद पर्वत का नाम मल्लिकार्जुन ही था, जहां बने शिवमंदिर में प्रात: सूर्योदय से पूर्व तिण्ण शिवलिंग पर सुअर का मांस चढ़ा कर प्रार्थना कर आता। पुजारी परेशान। एक दिन वह रात भर मंदिर में ही रुका। तिण्ण को पुन: सुअर का मांस चढ़ाते देख पकड़ लिया- बहुत पीटा- मार ही डालता कि शिव प्रकट हुए। बोले उसकी श्रद्धा और लगन तुमसे ज्यादा है। वह तो निर्दोष भाव से भक्ति कर रहा है। तुम तो कुछ मांगने के लिए अर्चना करते हो। पुजारी को क्षमा मांगनी पड़ी।

भक्ति सौदा नहीं हो सकती। वह लेनदेन नहीं है। देश और समाज की सेवा राजनीति में पूंजी निवेश से नहीं हो सकती कि इतना लगाया और उसका हजार गुना पाया। भक्ति रिटर्न गिफ्ट नहीं मांगती। वह सिर्फ देती है। विश्व के सभी बड़े आंदोलन- जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी है- इसी भक्तिभाव के कारण बढ़े। जो घटे, उनका कारण इसी भाव में कमी आना रहा।

शिव इस निर्मल हृदय भक्ति की पराकाष्ठा हैं। परदुखकातर होना ही शिव होना है। ये जो लाखों गरीब बच्चे, प्लेटफार्मों पर, कूड़े के ढेर पर सोते मिलते हैं, कबाड़ से जूठे फेंके गए अन्न के टुकड़े बटोर कर खाते दिखते हैं, चौराहों पर साहबों की गाड़ियों के शीशे खटखटा कर भीख मांगते होते हैं, वे सब भारतीय नागरिक ही होते हैं, पर कितनों के दिलों में दुख और करुणा का आर्द्र भाव पैदा करते हैं! कितने उन्हें अपने घर लाकर खाना खिलाने का मन रखते हैं! जिसका यह मन हुआ, वह शिव हुआ।

शिव के स्मरण से रज्जू भैया याद हो आए। यति को इतनी कम उम्र में जाना न था। पर इतना अकेला कर चले गए कि सन्नाटा काटने को दौड़ता है। शिव होने को उन्होंने अच्छे से पहचाना था। बड़ा कठिन काम है यह!

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