अशोक वाजपेयी

यों तो साहित्य के क्षेत्र में स्मृति एक केंद्रीय तत्त्व है: भाषा स्वयं स्मृति का एक संग्रहालय होती है। साहित्य भाषा में लिखे जाने के कारण स्मृति के इस सहज-सुलभ स्मृति-संग्रह का भरपूर उपयोग करता है। परंपरा और शास्त्र की स्मृति, चिंतन और विचार की स्मृति, पूर्वजों की स्मृति, पूर्ववर्ती साहित्य की स्मृति, जातीय स्मृति आदि स्मृति के अनेक रूप हैं, जो साहित्य में सक्रिय होते हैं। हम शायद लिखते ही इसलिए हैं कि हम याद करना चाहते हैं, कुछ या किसी को याद में बचाना चाहते हैं।

सार्वजनिक स्मृति की जीवन ही नहीं साहित्य में, फिर भी, कुछ क्रूरताएं भी होती हैं। कई बार हम अपने पूर्वग्रहों के कारण, अपनी वैचारिक निष्ठा और आस्था की वजह से, अपने अंत:करण की संकीर्णता के प्रभाव में कई लेखकों और कृतियों को बिल्कुल भुला देते हैं। हम उन्हें इतिहास का हिस्सा मान कर भुला देते हैं और उनकी कोई जीवंत उपस्थिति हमें साहित्य के अपने परिसर में न दिखाई देती है, न हमें वह जरूरी लगती है। कई बार हम भूल जाते हैं, क्योंकि भूलना ज्यादा आसान है, याद करने की झंझट से! ऐसा भूलना अपने उद्गम में क्रूर भी है: वह भूले हुए को नष्ट भी करता है।

यह सब मुझे सूझा जब हाल ही में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, विजयदेव नारायण साही और विपिन कुमार अग्रवाल की याद आई। तीनों ही इलाहाबाद से उभरे कवि थे और तीनेक दशक पहले कविता-चर्चा उनके उल्लेख के बिना पूरी नहीं होती थी। तीनों की दृष्टियां, शिल्प, विकास आदि एक-दूसरे से काफी अलग और भिन्न थे। पर तीनों ही महत्त्वपूर्ण कवि थे और मेरी नजर में अब भी हैं।

सर्वेश्वर में संवेदना और विचार की बहुत मर्मस्पर्शी घुलमिलाहट होती थी और उनके यहां समकालीन जीवन की छवियां लगातार आवाजाही करती रहती थीं। साही बहुत अच्छे अर्थों में बौद्धिक कवि थे: उनकी कविता हमेशा बहस के शिल्प से निकलती थी- उनकी कविता पढ़ना बहस करने जैसा होता था। विपिन पेशे से वैज्ञानिक होने के नाते विचार और संवेदना दोनों की प्रामाणिकता से बिंधे कवि थे। हिंदी में जिन थोड़े से कवि गद्य को कविता बनाने में सफल हुए उनमें विपिन उल्लेखनीय हैं, रघुवीर सहाय के अलावा।

हिंदी की अधिकांश आलोचना नितांत समसामयिकता से ग्रस्त आलोचना है, कम से कम इन दिनों अधिकतर। उसमें इन कवियों की कोई स्मृति शेष नहीं है। ये तीनों ही स्वतंत्रता के बाद स्थापित लोकतंत्र के कवि हैं- वे अपने लिए कोई रू-रियायत विचारधारा आदि के कारण नहीं मांगते। अकादेमिक जगत में उनकी कोई गति नहीं रही, भले पेशे से साही और विपिन अध्यापक ही थे। सर्वेश्वर और विपिन की रचनावलियां भी प्रकाशित हुर्इं। कई बरस बीत गए हैं। पर उनकी कोई समीक्षा या चर्चा देखने में नहीं आई है। क्या यह विस्मृति हमारी कुख्यात कृतघ्नता का ही एक और उदाहरण या संस्करण है? या ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’ की लाचारी भर। या कि साहित्य में फैलता-पसरता बौद्धिक-नैतिक आलस्य?

‘कविता एशिया’
पच्चीस बरस हो गए, जब हमने भारत भवन में एशिया कविता केंद्र स्थापित किया था, जो 1991 में यानी एक बरस से कुछ अधिक समय बाद और हम लोगों के भारत भवन से हटाने के बाद उसके नए रंगकर्मी-प्रशासक ने बंद कर दिया। यह अपने ढंग का पहला और इतना अल्पजीवी प्रयत्न था भारत और उसकी कविता को एशियाई संदर्भ से फिर जोड़ने और उसे एशियाई परिदृश्य में अवस्थित करने का। उसकी स्थापना के पीछे अज्ञेय की प्रेरणा थी, जिन्होंने बांग्लादेश से लौटने के बाद ‘कविभारती’ में वक्तव्य देते हुए भारत भवन में ऐसे केंद्र की स्थापना का सुझाव दिया था। उससे पहले हम एक एशियाई कविता समारोह कर चुके थे और 1989 के विश्व कविता समारोह के बाद हमें इस सुझाव पर अमल करने का खयाल आया था।

इस केंद्र से हमने अंगरेजी में एक पत्रिका ‘कविता एशिया’ के नाम से प्रकाशित की थी, जिसका पहला अंक ही उसका अंतिम अंक सिद्ध हुआ। उसके संपादकीय में यह बात रेखांकित की गई थी कि हाल के दशकों में एशिया की वैचारिक और सर्जनात्मक संस्कृतियों में यह अहसास बढ़ता रहा है कि एशिया-केंद्रित आधुनिकता उभरी है, जो आत्मविश्वस्त ढंग से परिदृश्य पर सक्रिय और प्रभावशील है। उस पर इसरार की अपनी बेचैनियां भी हैं और हमारी कोशिश इस नई पत्रिका (जिसका उपशीर्ष था ‘एशियाई कविता, काव्यचिंतन और अन्य विचार’ का एक अनियतकालीन) में उनका एहतराम होगा: कठिनाइयां, उम्मीदें और नाउम्मीदी, उलझनें और स्पष्टताएं आदि सभी व्यक्त हो पाएंगी। यह आशा भी व्यक्त की थी कि इस नए केंद्र के माध्यम से हम एशियाई कविता त्रैवार्षिकी भी शुरू कर पाएंगे।

इस अंक में चीन, जापान, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, तुर्की और भारत से कविताएं, निबंध, टिप्पणियां, समीक्षाएं और विचार प्रस्तुत किए गए थे। शुंतारो तानीकावा, सपार्दी जोको दामोनो, शू तिंग, विनोद कुमार शुक्ल आदि की कविताएं थीं। निर्मल वर्मा, मेलिह कावदेत आंदे, नवनीता देवसेन, विपिन कुमार अग्रवाल के निबंध, काजुको शिरैषी, सीताकांत महापात्र आदि के विचार। हमारे एशियाई कविता समारोह में चीन से एक कवयित्री यांग लुइहांग आई थीं। इस अंक में प्रकाशित उनकी एक कविता का समापन यों होता है:

दीये की रोशनी में सारी दीवारें आइना हैं,
उनमें से हरेक में मेरा बिंब।
मैं एक कदम पीछे हटती हूं।
लेकिन जैसे मैं चारों तरफ देखती हूं
मैं एक दरवाजा हो जाती हूं।
‘सांस और सपने’ शीर्षक निबंध में चांग ह्यान-जांग कहते हैं: ‘जैसे प्रकृति और संसार उनके हैं, जो उसके रहस्य पढ़ते हैं वैसे ही कविता उनकी होती है, जो उसे पढ़ते हैं।… हम जानते हैं कि आक्सीजन पेड़ों से आती है। कविता की सांस कहां से आती है? सपनों से।’
बेचैन वर्तमान

ऐसे लाखों युवजन हैं, जिन्हें वर्तमान तरह-तरह की संभावनाओं से भरा लग रहा है: उन्हें लगता है कि जो नई आर्थिकी बहुत आक्रामकता के साथ विकसित हो रही है उसमें उन्हें अपनी प्रतिभा और कौशल के मान से अवसर और साधन मिलेंगे। उनमें अधीरता इस बात को लेकर कुछ न कुछ जरूर हो रही है कि देर लग रही है। सत्तारूढ़ राजनीति बहुत तेज विकास का वादा करने के बाद अब बहाना बना रही है कि और समय चाहिए, क्योंकि व्यवस्था बदलने के लिए इतनी थोड़ी अवधि पर्याप्त नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि सत्ता बदली है, व्यवस्था नहीं।

व्यवस्था में सत्ता गिनगिन कर ऐसे अज्ञातकुलशीलों और बौनों को ला रही है, जिनसे उनकी प्रतिभाहीनता दृष्टिसंकीर्णता और अनुभवहीनता को ध्यान में रखें तो, किसी परिवर्तन की आशा की ही नहीं जा सकती। बौने व्यवस्था बदल सकते हैं यह सोचना भी मूर्खता है। कुशाग्रता, पहल, मौलिक विचार, स्वतंत्र अभिव्यक्ति, संस्थागत स्वायत्तता आदि सभी तेजी से सिकुड़ रहे हैं। ऐसे बहुत सारे युवजन हैं, जिन्हें यह न तो दिखाई देता है, न यह उन्हें विशेष उद्विग्न करता है।

लोकतंत्र में राजनीति स्थिरता और परिवर्तन दोनों का, प्रश्नवाचकता-जवाबदेही और विकल्प आदि का जरूरी माध्यम है। उसका बढ़ता हत्यारापन, उसकी घटती मानवीय संवेदना और जिम्मेदारी के भाव, उसमें बद्धमूल हो गई हिंसा और क्रूरता, आचरण की बढ़ती अशुद्धता, उसमें संजीवनी की तरह घर कर गया भ्रष्टाचार आदि उसे लगभग अपराधी करार देने के लिए काफी हैं। फिर भी, हम लोकतंत्र में राजनीति को उसके हाल पर छोड़ कर छुट्टी नहीं पा सकते: लोकतंत्र सारी नागरिकता को अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में राजनीतिक बनाता है।

राजनीति में जो विकल्प उभरते हैं उनका हश्र हम देख रहे हैं कि कैसे वे बहुत जल्दी सत्ता के नशे में अपनी बुनियादी कल्पना और स्वप्नशीलता को तज कर जनता के सेवक नहीं, सत्ता के दास बन जाते हैं। राजनीति से अलग सृजन-विचार-परिवर्तन आदि के जो अन्य क्षेत्र हैं वे सक्रिय रहते हैं, पर उनका भारतीय समाज पर निर्णायक प्रभाव पड़ना बहुत कम, शिथिल हो गया है।

राजनीति की सत्ताकामिता और नौकरशाही की जटिल व्यवस्था सिर्फ राजनीति और सत्ता का मामला नहीं रह गई है। उनका शिकंजा शिक्षा, संस्कृति, पर्यावरण आदि के क्षेत्रों में भी गहरा और टिकाऊ हो गया है। मुक्तिबोध के शब्द याद करें तो कह सकते हैं कि ‘दिल्ली भागूं कि उज्जैन’ जैसा विकल्प अब रहा ही नहीं! हर शहर दिल्ली या उसका उपनगर बनने को व्याकुल और अभिशप्त जैसा है।

यह सोच कर दहशत होती है कि इतना सारा समय, प्रतिभा, अवसर और शक्ति ऐसे मसलों को सुलझाने में खर्च होती रहती है, जिन्हें एक परिपक्व लोकतंत्र में उठना ही नहीं चाहिए। हमारा जीवन भयावह अपव्यय से ग्रस्त और उसमें लिप्त जीवन हो गया है: इतना कचरा भर गया है और हमें वह प्यारा लगने लगा है कि किसी तरह की स्वच्छता की मानो दरकार ही नहीं रह गई है। हम सब जिम्मेदार हैं और हम सब चालाकी या चुप्पी से उस जिम्मेदारी से दूर भाग रहे हैं और उसको स्वीकार तक नहीं करते। यह देश दूसरे सुधारेंगे, हम नहीं?

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