नीलम कुमारी
अमरनाथ ने ‘दलित विमर्श की सीमाएं’ (12 जुलाई) में लिखा है कि ‘दलित साहित्य भटकाव का शिकार तो है ही, वह अमीरी-गरीबी की खाई को और बढ़ाने में अनजाने ही मदद पहुंचा रहा है। समाज के चिंतकों का ध्यान वर्ग-संघर्ष की हकीकत से हट कर दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श की भूलभुलैया में भटक गया है, जबकि जाति-पांति और छुआछूत एक मरणासन्न सामंती मूल्य है और वर्ग-संघर्ष एक जिंदा हकीकत।’
यह सच में भटकाव है या भूलभुलैया, जिससे निकल पाना सहज नहीं! इस सहजता का प्रेरणास्रोत जिस बंगाल भूमि को बताया गया है वह भी समीचीन नहीं लगता। यह सही है कि सबसे पहले जाति-व्यवस्था का बहिष्कार यहीं हुआ। नवजागरण के सभी महापुरुष, जो सवर्ण कुल के थे, इसके पुरोधा बने। जाति-पांति, छुआछूत को जड़ से उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाई। सामाजिक स्तर पर उसका प्रभाव अंतरजातीय वैवाहिक संबंध के रूप में उपजा, जो अन्य राज्यों में इस तरह संभव नहीं है। हरियाणा की खाप पंचायतों का चलना इसका प्रमाण है। स्त्री शिक्षा के लिए भी जितने कार्य नवजागरण काल में हुए उसके चलते सचमुच बंगाल उदाहरण बनने के लायक है। महिला सशक्तीकरण का सुवास बंगाल भूमि से ही सर्वत्र फैला।
पर सिक्के का दूसरा पहलू भी है, जहां जाति-व्यवस्था की जड़ें एक महीन आवरण में सांस लेती आई हैं और शायद भविष्य में भी कमोबेश यही स्थिति रहने वाली है। आपको अचरज होगा कि आजादी के अड़सठ वर्षों बाद भी कोई दलित बंगाल का मुख्यमंत्री नहीं बना। पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति भी सत्ता में अपना दबदबा नहीं बना पाया। बंगाल में शुरू से लेकर आज तक ब्राह्मण और क्षत्रिय ही सत्ता पर काबिज रहे। पार्टी बदली, लोग बदले, पर दबदबा सिर्फ दो जातियों का रहा। इसका क्या अर्थ समझा जाए?
सत्तर के दशक में मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र सेन ने एक सभा में कहा भी था कि मैं स्वयं क्षत्रिय हूं फिर भी यह कहने के लिए बाध्य हूं कि जाति-व्यवस्था के दंश से मुक्ति दिलाने में अग्रणी इस बंगाल भूमि पर राजनीतिक क्षेत्र में ऊंची जाति का ही दबदबा दिखता है, जो कि नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, भारत के अन्य राज्यों में उदाहरण के तौर पर देखें तो बिहार में कई जातियां सत्ता में आई हैं। ब्राह्मण, क्षत्रियों से कहीं ज्यादा वैश्यों और शूद्रों का शासन चला है।
अमरनाथजी की बात सही है कि आज बंगाल की दशा यह है कि यहां जाति के आधार पर टिकट लेने और वोट मांगने वालों की जमानत जब्त हो जाएगी। पर परोक्ष रूप में जो हकीकत है उस पर क्या टिप्पणी की जाए! जाति के प्रति तो कोई आवाज सुनाई नहीं देती, क्योंकि बड़ी चालाकी से जनता को दूसरे मुद्दों में उलझा दिया जाता है।
वर्ग-संघर्ष के तौर पर अमीर-गरीब का संघर्ष तो है ही। बंगाल के गांवों में जमींदारों के सताए हुए लोग मजदूर बन गए। जाति का कोहराम इस मजदूरी का सोमरस बना, जिसे वे आज तक पीते आ रहे हैं। कोलकाता को ही देखें तो कई राज परिवार आज भी उसी ठाठ से जी रहे हैं। राजबाड़ी का रुतबा कायम है, पर मजदूर बना कर रखने की परिपाटी में थोड़ी कमी जरूर आई है।
वर्ग-संघर्ष के कई और रूप हैं। वृद्ध और युवा वर्ग का संघर्ष कम से कम राजनीति में सबसे ज्यादा दिखाई पड़ता है। सारे मुख्यमंत्री पचास वर्ष से ज्यादा उम्र के रहे हैं। नई पीढ़ी को यह कह कर मौका नहीं दिया जाता कि शासन अनुभवी व्यक्ति ही चला सकता है। वहां एक अन्य किस्म का वर्ग-संघर्ष है, जो आखिरकार 2011 में पहली महिला मुख्यमंत्री बनने पर खत्म हुआ। इस पर यह प्रश्न स्वाभाविक है कि अगर बंगाल में स्त्री शक्ति को अरसे से सम्मान मिलता रहा है, तो उसे मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने में इतनी देरी क्यों हुई। गौरतलब है कि 2011 में पहली महिला मुख्यमंत्री भी महिला सशक्तीकरण के बजाय वाम सरकार के कुशासन के विरोध में बनी!
शिक्षा के क्षेत्र में, खासकर डॉक्टरी या इंजीनियरिंग जैसे पेशों में ब्राह्मण, क्षत्रियों की लंबी कतार नजर आएगी। किसी भी शहर या इलाके के डॉक्टरों की सूची तैयार करके देख लें हकीकत से दो-चार हो जाएंगे। हां, अब स्थिति बदल रही है। हर कुल का बच्चा इन पेशों को अपनाने की कोशिश कर रहा है और सफल भी हो रहा है। पर इससे भविष्य कितना बदलेगा यह तो समय बताएगा।
थोड़ी और गहराई में जाएं तो बंगाल में जाति-संघर्ष और वर्ग-संघर्ष के अलावा भाषाई संघर्ष विकराल रहा है। पड़ोसी राज्यों से लोगों ने रोजगार की तलाश में बंगाल में कदम रखा। आबो-हवा पसंद आ गई, सुख-सुविधा रास आ गई तो धीरे-धीरे वहीं बसने लगे। परिणाम भाषाई संघर्ष के रूप में सामने आया। धड़ल्ले से उपनाम दिए जाने लगे। बिहार से आने वालों को मेड़ों, ओड़िशा वालों को उड़ों, मुसलमानों को नेड़ों, दक्षिण भारतीयों को तेतूल, पंजाबियों को पइयां जैसे हिकारत भरे उपनाम से संबोधित कर अपना रोष निकाला गया। आज भी वह हिकारत खत्म नहीं हुई है।
बंगाल के बाहर भी भाषाई संघर्ष है, पर इसकी शुरुआत का श्रेय बंगाल को अधिक है। आखिरकार पहले-पहल अंगरेजी सत्ता के चलते बंगाल में अन्य राज्यों के लोग आए और उसे संवारने में अपनी भूमिका निभा गए। औद्योगिक क्षेत्र में बंगाल की ऊंची जातियों ने अपना दबदबा कायम रखा। इसके चलते कोई दलित उस तरह अपनी पैठ नहीं बना पाया। तमाम उद्योग-धंधों के मालिक ऊंची जाति के हैं, क्योंकि सुविधाओं के स्रोतों पर उनका ही कब्जा रहा है। समय गुजरता गया और छोटी जातियों को पैर रखने की जगह नहीं दी गई और न संघर्ष करके वे रख पाए।
अब जरा साहित्य जगत में इस संघर्ष की पड़ताल। तमाम बड़े साहित्यकारों में वंद्योपाध्याय, चट्टोपाध्याय, उपाध्याय, बनर्जी, मुखर्जी, सेनगुप्ता, राय की लंबी कतार है। इसमें दलित साहित्यकारों को खोजना कठिन है। इस क्रम में दूसरी भाषाओं के साहित्य से दुराव का संघर्ष भी कायम है। बांग्ला साहित्य का हिंदी में भरपूर अनुवाद होता है, लेकिन प्रेमचंद के अलावा बहुत कम साहित्यकारों की रचनाओं का अनुवाद बांग्ला में हुआ है। अनुवाद क्रम में बंगाल भूमि से संबंध जोड़ कर देखना भी एक कसौटी रहा है। निराला के साहित्य का अनुवाद इसका प्रमाण है। ऐसे में बांग्ला साहित्य की परिधि संकीर्ण हो गई है, जिसमें विस्तार के लिए संघर्ष होना तय है।
संक्षेप में, संघर्ष का पैमाना बड़ा है और बढ़ा भी है। दलित साहित्य लेखन के बजाय समाज की ज्वलंत समस्याओं के लिए संघर्ष होना आवश्यक है।
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