कुलदीप मिश्रा

जब चैतन्या तम्हाणे निर्देशित मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ (2015) को राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया, तो फिल्म समीक्षक हैरान नहीं हुए, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से राष्ट्रीय पुरस्कार में प्रादेशिक सिनेमा का दबदबा लगातार बन रहा है। मगर ‘कोर्ट’ की सफलता ने हिंदी बनाम क्षेत्रीय सिनेमा की दो दशक पुरानी बहस को फिर से जीवित कर दिया। जहां क्षेत्रीय सिनेमा के समर्थक इस फिल्म की कामयाबी को क्षेत्रीय सिनेमा की लोकप्रियता के प्रमाण के तौर पर पेश कर रहे हैं, वहीं कुछ समीक्षक इसके माध्यम से क्षेत्रीय सिनेमा के बाजारू हिंदी सिनेमा की तुलना में ज्यादा सर्जनात्मक, बौद्धिक और प्रगतिशील होने का तर्क दे रहे हैं। राजनीति-प्रेरित, सामाजिक सरोकार और जन-चेतना वाली फिल्मों का हवाला देते हुए ये लोग क्षेत्रीय सिनेमा के राजनीतिक होने का दावा भी करते हैं।

‘कोर्ट’ के माध्यम से चैतन्या तम्हाणे आधुनिक समाज में संवैधानिक नागरिक आचरण और स्वतंत्रता के अंतर्विरोध को उघाड़ते हैं। सिनेमा द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का राजनीतिक विमर्श ही इस फिल्म की लोकप्रियता का कारण है। उससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि भारतीय लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करने का साहस एक प्रादेशिक (मराठी) फिल्म ने दिखाया, न कि हिंदी सिनेमा ने।

हालांकि ‘कोर्ट’ की लोकप्रियता का दूसरा पहलू यह भी रहा कि प्रादेशिक सिनेमा की सभी ‘रचनात्मक’ कृतियों की तरह यह कुछ गिने-चुने महानगरों, इक्का-दुक्का सिनेमाघरों और कुछ दर्शकों तक सीमित रही। यहां तक कि मराठी फिल्म होने के बावजूद यह महाराष्ट्र में कुछ ज्यादा नहीं चली। हालांकि व्यापारिक रूप से सफल होना या मनोरंजक होना ही किसी फिल्म की कामयाबी का पैमाना नहीं हो सकता। पर ‘कोर्ट’ जैसी रचनात्मक फिल्म के दर्शकों को आकर्षित न कर पाने का क्या कारण हो सकता है?

दरअसल, ‘कोर्ट’ की सफलता और अलोकप्रियता दो वास्तविकताओं, दो निष्कर्षों का मिश्रण है। पहला यह कि यह एक तर्कशील, प्रगतिवादी और बौद्धिक कृति है। इसका सरोकार भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक-सामाजिक दिनचर्या से है। दूसरा यह कि जिस क्षेत्रीय सिनेमा का अर्जुन बन कर ‘कोर्ट’ खड़ी हुई है, उसकी पहुंच राजनीति के माध्यम के रूप में सीमित है। दरअसल, जनमाध्यम के रूप में आज क्षेत्रीय सिनेमा राजनीति और जन दोनों से दूर है।

गौरतलब है कि अगर कहीं क्षेत्रीय सिनेमा जिंदा है, फल-फूल रहा है वह हिंदी सिनेमा की नकल के दम पर ही। असल में राजनीतिक-सामाजिक उद्देश्य का सिनेमा, जन और जन-संघर्ष का सिनेमा, तर्क और बौद्धिक उपयोगिता का सिनेमा अतीत की बात हो गई है, जिसका क्षेत्रीय सिनेमा के समर्थक राग अलापते नहीं थकते हैं। भोजपुरी सिनेमा का विकास और इसकी लोकप्रियता इसका अच्छा उदाहरण है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार का भोजपुरी क्षेत्र उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से ही ऐतिहासिक किसान और राष्ट्रीय आंदोलन का केंद्र रहा। आजादी के बाद भी इस क्षेत्र में निरंतर पिछड़ी-दलित जातियों के शोषण के खिलाफ, भूमिहीन किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए विभिन्न प्रकार के राजनीतिक-सामाजिक जन आंदोलन चलते रहे। मगर भोजपुरी सिनेमा को देख कर लगता है कि ये सब चिंताएं और मुद्दे उसके दायरे से बाहर हैं।

सैद्धांतिक रूप से एक अच्छी भोजपुरी फिल्म वह है, जिसमें अभिनेता प्रचुर बल प्रयोग करे, खुद रंगदारी करे या रंगदारों से लड़े और उसमें कम से कम तीन आइटम सांग हों। संघर्ष, जो यहां की दिनचर्या है, उसकी एक झलक भी भोजपुरी सिनेमा के रुपहले परदे पर नहीं मिलती। यहां अलग भाषा और संस्कृति के तर्क को सही मान कर क्षेत्रीयता के दावे को सही करार दे दिया गया है। यहां के सिनेमा में राजनीतिक-सामाजिक विमर्श गायब है।

बीते कुछ वर्षों में दक्षिण भारतीय सिनेमा, खासकर तमिल सिनेमा, में भी यही प्रवृत्ति जड़ें जमाती दिख रही है। तमिल सिनेमा अपने शुरुआती दौर से ही क्षेत्रीय राजनीति और जन-आंदोलनों से सीधे जुड़ा रहा है। 1930-1950 के दशकों के कई तमिल फिल्म निर्माता, निर्देशक और कलाकार, पेरियार और द्रविड़ राजनीति से काफी प्रभावित थे। परिणामस्वरूप इस दौर की कई तमिल फिल्मों ने पेरियार की तरह ही राष्ट्रवाद, हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद को चुनौती दी, उसकी आलोचना की। 1950-1970 के दशकों में एक बार फिर जब राष्ट्रीय भाषा का विवाद उठा, तब सिनेमा ही तमिल राष्ट्रवादी चेतना के जन प्रचार-प्रसार का प्रमुख माध्यम बना।

पर अब तमिल सिनेमा में भी राजनीति का पलड़ा हल्का हुआ है। बहुत हद तक यहां भी बॉलीवुड ‘मॉडल’ की कहानियों और किरदारों को स्वीकृति मिल गई है। आजकल की ज्यादातर फिल्में शहरी, मध्यवर्ग की जरूरत और उपभोक्तावादी दृष्टिकोण के हिसाब से बनती हैं। जातीय संघर्ष, ब्राह्मणवाद, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद आदि विमर्श की जगह तमिल सिनेमा में मनोरंजन मंडी ने ले लिया है।

हालांकि सिनेमा को मनोरंजन से अलग करके और केवल राजनीति से जोड़ कर देखना अप्रासंगिक होगा। पर पुरस्कारों को ही कामयाबी का पैमाना बना लेना भी समझदारी नहीं है। बहरहाल, जो समीक्षक इस मापदंड को स्वीकृति देते हैं, वे शायद इस बात से अनजान हैं कि प्रादेशिक सिनेमा का अराजनीतिक होना न केवल उन जन-संघर्षों और सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करेगा, जिनकी अगुआई करने का जिम्मा उस पर है। बल्कि खुद इस सिनेमा के अस्तित्व के लिए खतरा हो सकता है। राजस्थानी सिनेमा का लुप्त हो जाना इस दास्तान को बयान करता है।

सत्तर के दशक में राजस्थानी सिनेमा बहुत बड़ा तो नहीं, पर अच्छा-खासा उपक्रम था। यहां कई लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण हुआ, जो व्यावसायिक रूप से भी सफल रहीं। पर सभी फिल्में मोटे तौर पर किसी न किसी रूप में हिंदी सिनेमा की नकल थीं। न तो यहां क्षेत्रीय संगीत, लोककलाओं, जीवन-व्यवहार और नाट्य-पद्धति की लोक-शैली के तत्त्वों को सिनेमा में सम्मिलित करके देशीय सिनेमा शैली विकसित करने का प्रयोग किया गया, न ही एक सामंतवादी, पितृसत्तात्मक और जातीय हिंसा से ग्रस्त राजस्थानी समाज की समस्याओं को सिनेमा द्वारा अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया। यह पूरी तरह से गैर-राजनीतिक और मनोरंजन-केंद्रित सिनेमा था। यहां क्षेत्रीय संस्कृति के नाम पर सिनेमा ने जातीय-संघर्ष की जगह राजपूत-वीरता, मीरां की पितृसत्तात्मक समाज की चुनौती की जगह उसके भक्ति-आचरण और नारी अस्मिता की जगह पुरुष के सामने उसकी अधीनता को तवज्जो दी। इसके चलते राजस्थानी सिनेमा एक मुक्त राजनीतिक विमर्श के लिए वैकल्पिक जगह बना पाने में विफल रहा, जैसा कि तमिल सिनेमा में दिखता है।

इस तरह मनोरंजन की गलाकाट प्रतियोगिता में उसकी उपयोगिता कमतर मनोरंजन पेश करने के साथ घटती गई। आखिरकार नब्बे के दशक में राजस्थानी सिनेमा ने हिंदी सिनेमा के सामने घुटने टेक दिए, क्योंकि उसके पास ऐसा कोई दर्शक वर्ग नहीं था, जो उसकी उपयोगिता को सिनेमा के परे भी देखता हो।

अगर इस नजरिए से देखें तो स्पष्ट है कि क्षेत्रीय सिनेमा का ह्रास, घटता प्रभाव सीधे-सीधे उसके गैर-राजनीतिक, केवल मनोरंजन केंद्रित होने से जुड़ा है। अगर यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं, जब भोजपुरी, बांग्ला और तमिल सिनेमा भी राजस्थानी सिनेमा की तरह हिंदी सिनेमा के साम्राज्यवाद का शिकार बन जाए। लेकिन यहां यह भी समझना जरूरी है कि क्षेत्रीय सिनेमा के अस्तित्व की लड़ाई आमजन की सहभागिता के बिना निरर्थक है। यह तभी संभव है, जब क्षेत्रीय सिनेमा जन-समाज की राजनीतिक-सामाजिक चेतना का एक सशक्त हथियार बने। समय की जरूरत है कि ‘कोर्ट’ जैसी फिल्म अपवाद न हो, बल्कि नियम बने।

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