कुमार प्रशांत
धर्मवीर भारती के एक निबंध संग्रह का नाम है ‘ठेले पर हिमालय’। राजेंद्र रवि ने रिक्शे पर लाद कर जब सात किताबें- साइकिल गाथा, साइकिल रिक्शे का साम्राज्य, जिंदगी का पहिया, शहरी जन परिवहन, आदर्शवाद के आयाम, शहर सड़कें और समाज, बालिका शिक्षा, परिवहन और ज्ञान- समाज के सामने रख दीं तो मुझे अनायास भारतीजी के उस संकलन का खयाल हो आया। भारतीजी ने हिमालय को ठेले पर लाद दिया था, राजेंद्र रवि ने रिक्शे पर हमारा पूरा समाज लाद दिया है! उनकी इस कोशिश में मुझे एक गहरी न्याय-भावना दिखाई दी कि जो रिक्शा जमाने से समाज को ढोता आया है, कभी उसे समाज भी तो ढोए!
सब कहते हैं कि समय और समाज बदल रहा है। ये किताबें कहती हैं कि बदल कुछ नहीं रहा है, बदलाव अपना बदला ले रहा है। कहते हैं न कि उफनती नदी में गिर पड़ो कभी, तो दाएं-बाएं हाथ-पैर मारना नहीं, बल्कि खुद को शांत बहता छोड़ देना भी कई बार काम आ जाता है! इन किताबों का सुर यही है कि हम सुविधा आदि की दौड़ में जितने हाथ-पांव मार रहे हैं, उतने ही गहरे डूबते जा रहे हैं।
ये किताबें आधुनिक दौर में यातायात और परिवहन की समस्याओं को टटोलती हैं और ऐसे कितने ही नतीजे हमारे सामने लाती हैं, जिन्हें हम देखते तो रोज हैं, लेकिन पहचानते किसी रोज नहीं। कभी-कभार पहचानते भी हैं तो कुछ उसी तरह, जिस तरह दूर के किसी मुसीबतजदा रिश्तेदार को पहचानते हैं। इन किताबों में एक है- ‘शहर, सड़क और समाज’। यह किताब हमें मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी का दर्जा रखने वाले इंदौर की सड़कों पर ले जाती है। वहां कारों का ऐसा रेला है कि कार वाले भी बे-कार होना चाहने लगे हैं। आखिर कारें फौजी टैंक तो नहीं हैं कि जिन्हें खाई-पहाड़-नदी-तलैया जहां चाहें उतार दें।
कार का सफर भी तभी आरामदेह और समय की बचत करने वाला होता है, जब सड़कें दुरुस्त हों, चौड़ी और खाली हों और उस पर तेज रफ्तार वाहनों को ही दौड़ने की इजाजत हो। जब सड़कें ऐसी हों कि कार वाले रिक्शे वालों को और रिक्शे वाले पैदल वालों को सड़क-बाहर करने में लगे हों तब इंदौर जैसा शहर अपनी किस्मत पर रोता-पछताता मिलता है।
इंदौर में रहने वाले हिंदी कवि कृष्णकांत निलोसे की यह बात सुनिए: ‘‘आज से आधी सदी पहले जब नागपुर से आकर मैंने इंदौर में अपना घर बनाया तो लगा कि सचमुच मैं ऐसे शहर में आ बसा हूं, जिसकी फिजा में आत्मा को आनंद से सराबोर करने की अद्भुत शक्ति सतत प्रवाहित हो रही है। उन दिनों इंदौर एक खूबसूरत शहर था। इसकी सड़कें थीं आदमियों के लिए, उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए, वही इंदौर अब सड़क-जाम, वायु-जल प्रदूषण, सड़क-दुर्घटना से अंटा पड़ा है। इसका मुख्य कारण है शहर में मोटरवाहनों की संख्या का बेलगाम बढ़ना और फिर इससे पैदा होने वाली चालकों की अनुशासनहीनता, अराजकता, दादागिरी!’’
और फिर किताब एक ऐसा सवाल उठा देती है, जो हमसे कभी किसी ने पूछा ही नहीं था: ‘‘क्या इन सड़कों पर गैर-मोटरवाहनों का कोई अधिकार नहीं है?’’ गैर-मोटरवाहन यानी रिक्शा, ठेला, साइकिल, साइकिल रिक्शा, ट्रॉली और अंतत: पैदल आदमी!
आज चलन यह है कि सड़कें उनके लिए ही बनती हैं, जो मोटर वाले वाहनों से चलते हैं। इसलिए वे कितनी चौड़ी, कितनी ऊंची, बिना ठहराव के कितनी लंबी, कितनी चढ़ाई वाली या कैसी सीधी उतार वाली होंगी, इसका फैसला मोटर वाले वाहनों की क्षमता, गति और शक्ति के आधार पर किया जाता है। इसलिए हम पाते हैं कि तेज रफ्तार बहुलेनीय सड़कों पर से आदमी और आदमी की शक्ति से चलने वाले वाहन बाहर कर दिए गए हैं। आधुनिकता की एक पहचान यह बना दी गई है कि उसका आदमी से कोई रिश्ता नहीं होगा।
एक कंपनी अपने उत्पाद के विज्ञापन में कहती है: इसे बनाने में मनुष्य का हाथ लगा ही नहीं है! मतलब क्या? कि मनुष्य का हाथ बहुत गंदी चीज है और हम इतने सयाने हैं कि हमने उस गंदे हाथ को अपने इस उत्पाद से दूर ही रखा है। ऐसे में कोई कैसे कहे कि मनुष्य के हाथ से ज्यादा साफ दूसरा कोई साधन नहीं होता है, बशर्ते आप उसे साफ रखते हों? ठीक ऐसा ही सड़कों के साथ किया जा रहा है। सबसे अच्छी सड़क वह है, जिस पर आदमी नाम का प्राणी चल ही नहीं सकता; चल सकते हैं उसके बनाए और चलाए वे वाहन, जो चलते हैं तो गति में भी आदमी के लिए खतरा होते हैं और प्रकृति में भी। सड़क हादसों की बढ़ती खबरें इतना तो कह ही रही हैं कि गति के पागलपन का कोई इलाज हमें खोजना ही होगा।
‘जिंदगी का पहिया’ नाम की किताब हमें एक ऐसे वाहन की तरफ ले चलती है, जिसकी बात अब तक मैंने कहीं पढ़ी नहीं थी- साइकिल रिक्शा ट्रॉली! किताब के मुताबिक: महानगरों में स्थानीय माल-परिवहन के संदर्भ में साइकिल रिक्शा ट्रॉली का योगदान बड़े महत्त्व का है। यह पढ़ कर मुझे याद आया कि किराए का घर बदलते वक्त, पुराना कूलर या सोफा या बिजली का पैडस्टल या टेबल फैन या ऐसे ही समान लाने हों कि हटाने हों, हमें ऐसे रिक्शों की जरूरत होती है।
ऐसे तमाम चालकों से बात कर किताब जो तस्वीर खींचती है, वह जितनी जानदार है उतनी ही आशावान भी! बहुलेनीय सड़कों, फ्लाइओवरों और इन सबकी पहरेदारी करता पुलिस का सिपाही- सभी इस साइकिल रिक्शा ट्रॉली के खिलाफ हैं। ऐसी पैकर्स कंपनियां उभर आई हैं, जो मशीनी वाहनों से आपका किराए का नया घर बसाने का दावा करती हैं। फिर भी गलियों-भीड़ भरे कूचों में ट्रॉली रिक्शों के चालक अपनी जगह बनाए हुए हैं। मशीनी वाहन जहां आपका सामान छोड़ कर चलते बनते हैं वहां से आपका सामान आपके घर तक पहुंचाने का काम ट्रॉली रिक्शा ही करते हैं। लेकिन किताब यह भी कहती है कि संकरी गलियों में भी अब उनकी जगह कम होती जा रही है, उनके लिए अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं।
देश की राजधानी है दिल्ली- पुरानी और नई, ऐसी दो दिल्लियां हमने बना ली हैं! लेकिन ‘साइकिल रिक्शे का साम्राज्य’ पढ़ कर आपको पता चलता है कि यहां एक तीसरी दिल्ली भी है, जो दोनों दिल्लियों से डरती हुई जीती है। कितनी अजीब-सी बात है कि तीसरी दिल्ली प्रदूषण नहीं फैलाती है, सड़कों पर कुहराम भी नहीं मचाती, दुर्घटनाएं भी नहीं करती है, फिर भी शासन-प्रशासन के पास इस दिल्ली के लिए दो मीठे बोल नहीं हैं। अपने तीन पहियों पर चलता ट्रॉली रिक्शा बिना किसी बड़े निवेश के कितनों को रोजगार देता हुआ, कितनी बड़ी सामाजिक भूमिका निभाता है, इसका हिसाब दोनों में से किसी भी दिल्ली के पास नहीं है। ये किताबें दिल्ली और उससे जुड़ कर जीते चौबीस शहरों के रिक्शाचालकों से बातें कर तैयार की गई हैं।
इन सारी किताबों को तैयार करने के पीछे एक गहरा सोच है। राजेंद्र रवि देश के शायद अकेले व्यक्ति हैं, जो मनुष्यचालित परिवहन के साधनों को एक तार्किक भूमिका देते और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करते हैं। राजेंद्र रवि को सिर्फ रिक्शा नहीं, रिक्शावाला भी दिखाई देता है जो इस स्वतंत्र, लोकतांत्रिक देश का आधिकारिक नागरिक है। हमारा संविधान अपने हर नागरिक को जितने अधिकार देता है, उतने अधिकार इस रिक्शेवाले को भी देता है। संविधान जो देता है, उसका नागरिक वह सब ले नहीं पाता, क्योंकि देने और लेने वाले के बीच हम कोई पुल नहीं बना सके हैं। राजेंद्र रवि ने वह पुल तैयार करने की कोशिश की है, जिसके खंभों की तरह हैं ये किताबें।
इन किताबों के साथ-साथ दस पुस्तिकाओं का एक छोटा सेट भी प्रकाशित हुआ है, जो सरल भाषा में परिवहन के ऐसे ही साधनों के कुछ दूसरे पहलुओं की बात करता है- बैलगाड़ी, हाथ ठेला, पैदल यात्री, सामाजिक संगठन, साइकिल से काम पर जाने वाले लोग, इंदौरी तांगा, किराए की साइकिल और मीडिया में शहरी परिवहन की छवियां। इन्हें पढ़ते-समझते कई भूली बातें याद आती हैं और यह अहसास भी गहरा होता है कि विकास और सुविधा के नाम पर हमने जीवन की गुणात्मकता से कितना किनारा कर लिया है।
विकास का हमारा मॉडल, सुविधाओं की बढ़ती भूख, उपलब्ध साधनों की मर्यादा, र्इंधन का लगातार महंगा होता और छीजता भंडार, तेजी से होता शहरीकरण आदि ने मिल कर एक बेहद जटिल संसार में हमें पहुंचा दिया है। राजेंद्र रवि का यह सारा प्रयास देख-समझ कर लगता है कि शायद किसी दिन हमारा समाज ट्रॉली रिक्शे पर अपना सामान लाद कर, पैदल चलता हुआ ही इस जटिल तंत्र से बाहर आ पाएगा।
साइकिल गाथा, साइकिल रिक्शे का साम्राज्य, जिंदगी का पहिया, शहरी जन परिवहन, आदर्शवाद के आयाम, शहर सड़कें और समाज, बालिका शिक्षा, परिवहन और ज्ञान: राजेंद्र रवि; इंस्टीट्यूट फॉर डेमोके्रसी एंड सस्टेनबिलिटी (आइआइडीएस), मकान नं. 7, गली नं. 1, ब्लॉक-ए, हिमगिरि एनक्लेव, पेप्सी रोड, मेन बुराड़ी रोड, नई दिल्ली; क्रमश: 360, 580, 380, 450, 410, 320 और 90 रुपए।
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