निवेदिता
एम हनीफ मदार का संग्रह बंद कमरे की रोशनी पढ़ते हुए मुझे अफ्रीकी साहित्य के विद्वान जिरामूल्ड की बात याद आई। वे कहते हैं- एक स्वप्नदर्शी लेखक अतीत में यात्रा नहीं करता। वह अपने अंदर घूमता है, जहां उसकी टकराहट कई अतीतों और भविष्यों के साथ होती है और वर्तमान एक औजार की तरह उसके हाथों में खेलता है।
हनीफ मदार उन लेखकों में हैं, जो अपने भीतर यात्रा करते हैं। अपनी दुनिया के सुख-दुख और अंतर्विरोधों के साथ वे जब कहानी कहते हैं, तब सूत्र आपस में जुड़ते चले जाते हैं। उनकी कहानियां किसी कालखंड का ऐतिहासिक दस्तावेज न होकर मानवीय संबंधों, संवेदनाओं, करवट लेते परिवेश और मानव नियति के बदलते रंगों की कहानी है। वह चाहे ‘पदचाप’ हो, ‘चरित्रहीन’ या फिर ‘चिंदी-चिंदी ख्वाब’, हम कह सकते हैं कि कहानी नए रंग, नए स्वाद के साथ आई है।
इस संकलन में कुल ग्यारह कहानियां हैं, जिनके जरिए मदार ने सुख-दुख, जय-पराजय की तस्वीर खींची है। उनकी कहानियों में सहज प्रवाह मिलता है, पर उसकी बुनावट में कम गहराई है। इसलिए कहीं-कहीं वे बोझिल भी होती हैं। कहानी की खासियत है उसका सहज होना। वे अपने इर्द-गिर्द की घटनाओं के दर्शक नहीं हैं, उसके सहयात्री हैं। अपने इसी अनुभव को उन्होंने कहानियों में आकार दिया है। चाहे वह ‘दूसरा पड़ाव’ हो या ‘रोजा’, ‘अब खतरे से बाहर है’, ‘एक और रिहाना’ या ‘तुम चुनाव लड़ोगे’।
हनीफ मदार की कहानी की यात्रा किसी पहाड़ी नदी की तरह है, जिसे खुद पता नहीं है कि उसे किन-किन नदियों से गुजरना है। वह अपनी धुन में आगे बढ़ती जाती है, बिना इसकी परवाह किए कि इसमें खतरे हैं। उनकी कहानियों की हर परत में एक कोमल उदासी वाबस्ता है। ‘दूसरा पड़ाव’ कहानी मूल रूप से एक स्त्री के जीवन-संघर्ष की कहानी है। ‘बंद कमरे की रोशनी’ में धर्म जैसे मसले को बहुत बारीकी से उकेरा गया है। वे अपने अनुभव के सत्य को सीधे बिना किसी लाग-लपेट के व्यक्त करते हैं। इसलिए पाठकों तक उनकी पहुंच आसान होती है। इस कहानी के अंत में पता चलता है कि गांव के मंदिर का पुजारी मुसलमान है। जब लोगों को यह बात मालूम होती है तो वे गुस्से में मंदिर का किवाड़ खोलते हैं और देखते हैं- ‘कमरे में पुजारी नहीं, दो धर्मग्रंथ एक साथ रखे थे। दीये की मध्यम रोशनी में भी ग्रंथों के बादामी आवरण के बीच दबे पन्नों की सफेदी ऐसे चमक रही थी, जैसे वे इस भीड़ को देख कर हंस रहे हों।’
यह मानवीयता के विस्तार, मुश्किल समय में उम्मीद की कहानी है। यह हमें भरोसे की ओर ले जाती है। रोजमर्रा की जिंदगी से जूझती है। पाठक से सीधे बात करती है, तुरंत अपने घेरे में ले लेने वाली आत्मीयता के साथ। हमारा मौन मुखर हो जाता है। हम ऐसे पात्रों से जुड़ जाते हैं जैसे वे हमसे बातें करते हों। दरअसल, कहानियों के बहाने हम एक ऐसा संसार रचते हैं, जो हमारा है, जिसे हमने रचा-पोसा है। कहानी सिर्फ कहानी होती है। उजालों और अंधेरों के बीच। आत्मीय और गरमाहट के बीच। हनीफ मदार की कहानियां मानवीय संवेदनाओं का विस्तार करती हैं, जिनमें लेखक करुणा की एक नई दुनिया रचता है। जिसमें कहानी के पात्र बेरोजगारी, भूख, धार्मिक आडंबर और स्त्री की आजादी जैसे सवालों से जूझते हैं।
‘चरित्रहीन’ कहानी पढ़ते हुए शरतचंद्र का चरित्रहीन याद आता है। चरित्रहीन जैसे पात्र को शरतचंद्र जैसा संवेदनशील और यायावर लेखक ही गढ़ सकता है। उस हिसाब से यह कहानी थोड़ी कमजोर है। जिसमें बयानबाजी है। कहानी की बुनावट सपाट है। फिर भी एक स्त्री के संघर्ष को रेखांकित करने की कोशिश की गई है। ‘रामप्रकाश हड़बड़ाए से उठे जैसे होश में आ गए हों। वे होटल में नहीं, श्मशान की बेंच पर अकेले बैठे थे। सामने सरला मैडम की जलती चिता राख के ढेर में बदल चुकी थी। रामप्रकाश चाचा ने अपनी जेब से एक कागज का टुकड़ा निकाला उसे एक बार पढ़ा। ‘तू चरित्रहीन नहीं है’ और उसे मैडम की चिता में डाल दिया।
हम कह सकते हैं कि लेखक की यह ईमानदार कोशिश है। वे कहानियां बुनने की कला जानते हैं, पर बुनावट की लय पर उनकी पकड़ ढीली है। लेकिन यह क्या कम है कि कहानियां बन रही हैं। कई कहानियों में आसपास के जीवन के अनेक प्रसंग और पात्र उभरते हैं। जिसमें रिश्तों और घटनाओं का खूबसूरत ताना-बाना है। हर कहानी अलग-अलग रंग और स्वाद की है। प्रेम जैसे विषय को लेखक ने गहराई से छुआ है। प्रेम मनुष्य की मूल गंध है। भले इसे अभिव्यक्त करने का माध्यम अलग-अलग हो। हनीफ मदार ने कहानी की तह में जाकर उन मर्मस्थलों को कुरेदने की कोशिश की है। उनकी कहानी में प्रेम रचा-बसा है। वहां अतिशय भावुकता के लिए जगह नहीं है। कथा-दृष्टि सामाजिक यथार्थ की जड़ तक जाती है, इसलिए भावुकता के ऊपरी आवेग से लेखक ने खुद को बचाया है।
यह संग्रह हनीफ मदार की सृजनात्मकता की शुरुआत है, जिसमें उनके विचार, बयान, भाषा, सरोकार, संवेदना ने पाठकों में अपनी जगह बनानी शुरू की है। आज के दौर में लिखना एक बड़े खतरे को मोल लेना है। लेखक ने यह खतरा मोल लिया है। रिश्तों और समाज के पेचीदा रास्ते से गुजरते हुए कहानी कहती है, कहने दो मुझे… कहने दो। डूबने दो जिंदगी के सारे रंगों में।
बंद कमरे की रोशनी: एम हनीफ मदार; उद्भावना; एच-55, सेक्टर-23, राजनगर, गाजियाबाद; 125 रुपए।
फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta