सत्यपाल सहगल

पुरानी उक्ति है- ‘विफल लेखक आलोचक बन जाता है’। क्या यह पंक्ति किसी कुढ़े हुए कलमनवीस ने रची या फिर किसी हताश समालोचक की आत्मदया है? यह मामला थोड़ा संगीन और जटिल है। उच्च शिक्षण संस्थानों के साहित्य-शिक्षक को आलोचना संस्थान के एक अंग के रूप में ही माना जाता है। इधर उसे कुछ नए ढंग से परिभाषित करने की कोशिश की जा रही है। अब अध्यापक का अर्थ ‘प्रवक्ता और शोधकर्ता’ है। शोध यानी नए साहित्यिक तथ्यों की खोज। शोध दो तरह का है। एक, मूलभूत शोध, जो हमारे ज्ञान में कुछ ऐसा नया जोड़े कि सोचने के ढंग में ही बड़ा परिवर्तन आ जाए। दूसरा, प्रायोगिक शोध यानी किन्हीं पूर्व-ज्ञात मानदंडों के आधार पर किसी कृति, लेखक या युग आदि का विश्लेषण।

मूलभूत खोज तो अब दुर्लभ क्या, अलभ्य है। प्रायोगिक खोज, अगर उसमें कुछ स्तरीयता हो भी तो, शुद्ध आलोचना के ज्यादा काम की नहीं, क्योंकि एक तो यह प्राय: विगत हो चुके मानकों पर टिकी होती है; दूसरे, यह गहरी अंतर्दृष्टि के स्थान पर स्थूल तथ्यों को प्रधानता देता है। इससे तथ्यों के बीच की महत्त्वपूर्ण तरलता इसका हिस्सा नहीं बन पाती; दार्शनिकता, चिंतनपरकता यहां गायब रहते हैं और सहज ज्ञानजन्य मौलिक सूझ के लिए कोई जगह नहीं बचती। कुल मिला कर हम ऐसे अकादमिक शक्ति-केंद्र से रूबरू होते हैं, जो अपने लिए निर्दिष्ट, श्रेष्ठ आलोचना-क्षमता की कसौटी पर कमजोर पड़ जाता है। शोध की परजीविता, आलोचना की आत्मजीविता पर भारी पड़ जाती है। इससे क्या हम यह निष्कर्ष निकालें कि समकालीन साहित्य-शिक्षक और शोधकर्ता विफल कृतिकार ही नहीं, विफल आलोचक भी हैं!

इस प्रकार से जांचने पर साहित्य शैक्षणिक सत्ता, सृजनात्मक सत्ता के सामने हल्की नजर आती है, क्योंकि सच्ची सृजनात्मकता में मौलिक अवदान का थोड़ा-बहुत अंश अपने आप आ जाता है। फिर भी दुनियावी सफलता के नजरिए से शिक्षण-संस्थानों की सत्ता ज्यादा माकूल और वरणीय है। जहां अनेक बड़े लेखकों के पास ढंग से घर चलाने या अपना इलाज तक करवाने के लिए पर्याप्त साधन नहीं थे; वहीं उन पर व्याख्यान देने वाले प्रोफेसर वायुयानों से कम सफर नहीं करते हैं। भारतीय भाषाओं में लेखक की संपत्ति और ताकत उसकी ‘कालजयी प्रतिष्ठा’ है। यों कालजयिता भी क्या है? लेखक की मृत्यु के बाद वह उसके किस काम की? उसके जाने के बाद उसके नाम से किसी

विश्वविद्यालय में बना सृजनपीठ या अध्ययन केंद्र क्या आखिर में शैक्षणिक सत्ता का ही एक अच्छा-बुरा हिस्सा बन कर नहीं रह जाता? शायद इसी कारण आज का सर्जक ‘अनश्वरता या कालजयिता’ के प्रति पहले से कम रूमानी है।

अकादमिक के लिए कालजयिता एक ‘प्रवचन-विषय’ बना हुआ है; इसकी रूमानी कथा को गाढ़ा रंग देने में उसका वर्गहित छिपा है। इससे साहित्य-तंत्र में उसकी भूमिका का महत्त्व बढ़ता है। दिवंगत रचनाकारों की अमर गाथाएं, एक आतंक मिश्रित श्रद्धा भाव लिए, साहित्य के छात्रों और पाठकों की अनेक पीढ़ियों के कल्पनालोक पर रात-दिन छाए रहती हैं। ये चर्चाएं कृतिकारों के अवचेतन को भी प्रभावित करती हैं और वे इस ग्रंथि से पीड़ित रहते हैं कि काश कभी उनका भी ऐसा उल्लेख हो। इस कार्य में शैक्षणिक सत्ता की सक्रिय भूमिका के महत्त्व को वे बखूबी समझते हैं और कभी उसके सामने सिर नवा कर और कभी हेकड़ी दिखा कर, वे इस फेर में रहते हैं कि उनकी अमरता की नींव जीते-जी पड़ जाए।

उच्च-शिक्षक सोच सकता है कि लेखक को वही बड़ा बनाता है। पाठ्यक्रम निर्धारण और पुरस्कार की दुनिया के चौकीदार तो वही हैं। आचार्य के बिना साहित्यकार की क्या गत! दिल से कलमकार, आलोचक-शिक्षक-शोधकर्ता की जरा भी इज्जत न करे, पर वह जानता है कि उसका कहा उसकी पहचान बनाने या बिगाड़ने में काफी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। इसलिए, अपनी छपी-अनछपी रचनाएं उसके दरवाजे पर पटकता रहता है। हां, रचनाकार अगर नामी-गिरामी हो गया है, तो शक्ति-संतुलन में उसका पलड़ा भारी रहता है और शिक्षाशास्त्री किसी हद तक उसका नखरा उठाने के लिए भी तैयार रहता है। महान और कामयाब सृजनात्मकता ही उच्च साहित्य-शिक्षक की सत्ता के समकक्ष खड़ी हो पाती है।

लेखक की ताकत का आधार उसकी प्रतिभा-कीर्ति है, शिक्षक का बल उसके शैक्षणिक पद से आता है। पद और यश के इस मुकाबले में अंतिम जीत किसकी होती है; यह मौके-मौके की बात है।

यह विवादास्पद टिप्पणी की जा सकती है कि सर्जक और शिक्षक के एक-दूसरे पर चढ़त पाने के द्वंद्व के कारण हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में कवि या गद्यकार बहुत स्वागतयोग्य नहीं रहे हैं। विश्वविद्यालयों में कई साहित्य-विभाग ऐसे हो सकते हैं, जहां बरसों से कोई रचनाकर्मी न बुलाया गया हो। रचनात्मक चरित्र में अकादमिक दिलचस्पी भी कम है। क्या आप कोई ऐसी पाठ्यचर्या जानते हैं, जहां लेखकीय व्यक्तित्व पाठ्यक्रम का हिस्सा हो? यह जानना वाजिब है कि क्या साहित्य शिक्षण-केंद्रों में लेखक, खासकर जीवित लेखक के प्रति हिकारत का भाव रहता है?

कई बार शैक्षणिक और सृजनात्मक सत्ता किसी एक शख्स में समा जाती है। बहुतेरे नामी-गिरामी लेखक उच्च-शिक्षा अध्यापक भी हुए हैं। विचारणीय है कि सृजन और शिक्षण की इस संधि से उन्हें कितना लाभ और कितनी हानि हुई। ऐसा अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा कि शैक्षणिक सत्ता के बीच होने से उन्हें वे सब लाभ मिले, जो यह सत्ता किसी भी साहित्यकर्मी को दे सकती है। इसके उलट यह भी हो सकता है कि यह सुखद स्थिति उन्हें रचना के मूल प्रेरकों में एक, यानी आलोचनात्मक-शैक्षणिक सत्ता की स्वीकृति के उत्तेजक, सकारात्मक तनाव से जरा दूर कर दे।

सृजनात्मक और शैक्षणिक सत्ता की आपसी कशमकश लेखक के काम को एक खास प्रकार की तराश भी दे सकती है। पर आवश्यक नहीं कि रचनाकार शैक्षणिक सत्ता के लाभ उठाने के लिए शिक्षक बना हो। शिक्षण कार्य रोजगार का एक अच्छा जरिया है और लेखक के लिए उसे चुनना, जिंदगी की आर्थिक गाड़ी खींचने के लिए जरूरी हो सकता है। हम यह भी जानते हैं कि साहित्यिक दायरे में केवल ये दो सत्ता-केंद्र नहीं हैं। मीडिया और साहित्यिक मीडिया भी सत्ता केंद्रों के रूप में उभरे हैं। संपादक की तूती आलोचक से कम नहीं बोलती।

साहित्यिक उत्थान में प्रचार का अनन्य योगदान हो गया है। शैक्षणिक सत्ता से सृजनधर्मी का जो संबंध रहता है, उसका एक प्रतिरूप संपादक से उसके संबंध में देखा जा सकता है। प्रकाशक तो सत्ता का बड़ा केंद्र है ही। प्रकाशक का मामला और खास है। पीठ पीछे उसकी घनी आलोचना करने के बावजूद, लेखक कभी-कभार ही खुल कर उसके खिलाफ जाता है। वह अन्य सत्ता केंद्रों के खिलाफ मोर्चे खोल लेता है; इस मोर्चे पर अक्सर वह सीधी जंग में नहीं पाया जाता।

पर कहना होगा कि साहित्य मंडल का केंद्रीय द्वंद्व सृजनात्मक और अकादमिक-शैक्षणिक सत्ता या सृजनहार और आचार्य के बीच ही है। साहित्य-इतिहास भी यही बताता है। कालिदास के युग से सातवीं-आठवीं शती तक, इस संबंधी बहसें संस्कृत-साहित्य में उठती रही हैं। यह एक लगभग दार्शनिक जिज्ञासा है कि शिक्षक, विश्लेषक, शोधकर्ता, निर्णायक, व्याख्याता, प्रस्तोता, उपकर्ता, सैद्धांतिक बड़ा या सृजनकर्मी? रचना की मूल्यांकन कसौटियों और लेखक की पेशेवर सामाजिक हैसियत गढ़ने में प्राथमिक भूमिका निभाने वाला अकादमिक श्रेष्ठ या रचयिता? शायद इस सवाल के कठिन उत्तर से घबरा कर, आधुनिक युग में, छायावाद, नई कविता, नई कहानी और अकविता जैसे आंदोलनों के बहुत से रचनाकार खुद अपने कार्य के टिप्पणीकार-व्याख्याकार की मुद्रा में आ गए!

अगर प्रश्न को इस तरह पेश किया जाए कि पहले कौन- साहित्यकार या उसका परिचायक? जवाब यही देना पड़ेगा कि पहले सृजनधर्मी, अगर वह न होता तो फिर व्याख्याकार क्योंकर होता? शायद प्रतिपक्ष में कहा जाएगा कि रचनाकार के होने मात्र से ही क्या हो जाता, जब तक कोई यह न बताता कि वह ‘है’। क्या हम ऐसे साहित्य-समाज की कल्पना कर सकते हैं, जहां सिर्फ लेखक और पाठक हों, आलोचक-मूल्यांकनकर्ता नहीं? क्या इस जीव से कोई मुक्ति है? लेखकगण जानते हैं कि नहीं है। हमारे समय में, जब रचनाधर्मी अज्ञात पाठक से संबोधित है, एक मध्यस्थ, एक वकील, एक प्रचारक की आवश्यकता और बढ़ गई है। शैक्षणिक सत्ता में दिख जाने वाला अहंकार उसकी इसी अपरिहार्यता के कारण है।

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