तवलीन सिंह

जेहादी आतंकवाद पंजाब वापस लौट कर आया पिछले हफ्ते 20 साल की शांति के बाद। हम हैं कि उलझे रहे इस बहस में कि क्या याकूब मेमन को फांसी होनी चाहिए कि नहीं। इतनी चर्चा हुई इस फांसी को लेकर कि आखिरकार ऐसे लगने लगा कि याकूब मेमन को फांसी पर सिर्फ इसलिए लटकाया गया क्योंकि वह एक मुसलमान था हिंदुओं के देश में। सारी बहस में सबसे कम चर्चा हुई इस बात पर कि लंबे मुकदमे के बाद कई अदालतों के न्यायाधीशों ने तय किया कि याकूब शामिल था अपने भाई टाईगर मेमन के साथ उस साजिश को रचने में जिसकी वजह से 250 से ज्यादा लोग मुंबई की सड़कों पर बेमौत मारे गए मार्च, 1993 में। जख्मी होने वालों की तादाद 700 से ज्यादा थी और कइयों के जख्म ऐसे हैं कि उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई है।

इतनी बहस हुई याकूब मेमन की फांसी की कि बहुत कम ध्यान हमारे राजनेताओं और राजनीतिक पंडितों ने गुरदासपुर के दीनानगर पर दिया। कारण इसका यह भी है कि हमारे ज्यादातर राजनीतिज्ञ और राजनीतिक पंडित वामपंथी या मार्क्सवादी विचार से जुड़े हुए हैं और दुनिया भर में देखा यह गया है कि वामपंथियों और जेहादियों के बीच एक अजीब दोस्ती कायम हो गई है।

क्या याद है आपको, कब अपने इस भारत महान में आपने किसी राजनेता या राजनीतिक पंडित के मुंह से बोको हराम की आलोचना सुनी हो? यह वह संस्था है जो अफ्रीकी शहरों से स्कूल जानेवाली बच्चियों को अगवा करती है और उनकी जबर्दस्ती शादियां कराती है अपने मुजाहिदीनों के साथ। यह वह संस्था है जो कत्लेआम करती है बेगुनाहों का। बोको हराम तो दूर की बात, क्या आपने हमारे राजनीतिक पंडितों से इस्लामिक स्टेट (आइएस) की कभी आलोचना सुनी है? मैंने तो सिर्फ मामूली आवाजें तब सुनी है अपने पत्रकार बंधुओं से, जब इस संस्था के हत्यारे पत्रकारों और समाज सेवकों के गले काटते हैं और इन निर्मम हत्याओं के वीडियो फैलाते हैं दुनिया भर में इंटरनेट के जरिए।

और अगर मेरे जैसी कोई पत्रकार खुल कर इन हैवानों के खिलाफ आवाज उठाता है तो मेरे वामपंथी बंधु फौरन सक्रिय हो जाते हैं। इनकी गालियों को मैं तारीफ मानती हूं। पिछले हफ्ते एक ही व्यक्ति ने गुरदासपुर की तरफ ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की थी और वे थे पंजाब के ‘सुपरकॉप’ केपीएस गिल।

जब गृह मंत्री ने दीनानगर में हमला खत्म होने से पहले ही दोष देना शुरू कर दिया पाकिस्तान के आइएसआइ को तो गिल साहिब ने अपने एक लेख में कहा कि हमें आइएसआइ की चिंता कम और आइएस की ज्यादा होनी चाहिए, इसलिए कि तमाम जेहादी संस्थाएं अब इकट्ठा काम कर रही हैं आइएस की छत्रछाया के तहत। भारत उनके लिए खास निशाना रहा है क्योंकि हम ‘काफिर’ माने जाते हैं और जेहादी संस्थाएं हमें मुसलमान बनाना अपना फर्ज समझती हैं। हमें अगर काफिर ही रहना है तो जेहादियों के साथ लड़ने के लिए हमारी तैयारी कहीं ज्यादा अच्छी होनी चाहिए।

दीनानगर में तीन आतंकवादियों को मार गिराने में तकरीबन पूरा दिन लगा बावजूद इसके कि पंजाब पुलिस का समर्थन कर रहे थे सेना के जवान और एक कमांडो दस्ता। इतनी देर इसलिए लगी क्योंकि जेहादियों के पास थे आधुनिक हथियार, आधुनिक औजार और आधुनिक लिबास। हमारे सुरक्षाकर्मी मैदान में गए बिना बुलेटप्रूफ कपड़ों के और उनके हाथों में थी पुरानी किस्म की बंदूकें।

आखिर में अगर जीत उनकी हुई तो दाद देनी होगी उनकी दिलेरी की। दाद देनी होगी उस दूधवाले की जिसने रेल पटरियों पर बमों की खबर दी थी और उस बसवाले की जिसने 70 से ज्यादा मुसाफिरों की जानें बचार्इं अपनी बहादुरी से। जब जेहादियों ने उनकी बस में चढ़ने की कोशिश की, उन्होंने बस को दौड़ाया और आगे निकल गए बिना घबराए। इन दोनों व्यक्तियों ने बहादुरी और समझदारी से काम न किया होता तो बहुत लोग मरते।

प्रधानमंत्री को अब दिखाना होगा कि राष्ट्र सुरक्षा में वे कितना सुधार ला सकते हैं। याद रखना चाहिए उन्हें कि उनसे पहले जो भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री थे उन्होंने देश का सिर झुका दिया था जेहादियों के सामने जब 1999 के आखिरी दिनों में आइसी 814 को काठमांडू से अगवा कर दिया था जेहादियों ने। अमरजीत सिंह दुलत जो उस समय रॉ के मुखिया थे अब स्वीकार करते हैं अपनी नई किताब में कि सरकार ने गलतियां बहुत कीं। मानते हैं कि आइसी 814 को अमृतसर के हवाई अड्डे पर ही रोका जा सकता था जो नहीं हुआ।

भारत की जमीन पर ही अगर उसे रोक कर रखा होता तो मुमकिन है कि उन खूंखार जेहादियों को रिहा न करने पर मजबूर होती भारत सरकार जिन्होंने रिहा होने के बाद भारत की संसद पर जेहादी हमला किया और अमेरिकी पत्रकार, डेनियल पर्ल का गला काट कर हत्या की।

दुलत साहब अपनी किताब में यह नहीं बताते हैं कि मौलाना अजहर मसूद और उमर शेख को हमने पांच साल क्यों सड़ने दिया हमारी जेलों में। यह भी नहीं बताते हैं कि बाद में इन दोनों को हम क्यों नहीं पाकिस्तान में ढूंढ कर मार सके जैसे अमेरिका ने उसामा बिन लादेन को मारा था।

सो, प्रधानमंत्री जी, बहुत कुछ है करने को वरना जेहादी हमले भारत पर होते रहेंगे। खुफिया संस्थाओं का कहना है कि अभी से तैयारी हो रही है भारत की धरती पर एक बहुत बड़ा जेहादी हमला करने की। यानी जो दीनानगर में हमने देखा पिछले हफ्ते वह सिर्फ ट्रेलर था, पिक्चर अभी बाकी है। इस पिक्चर को अगर रिलीज होने से पहले ही रोकना है तो गृह मंत्रालय के तौर-तरीकों में बहुत सुधार लाने होंगे। गृह मंत्री अभी तक अटके हुए हैं आइएसआइ पर जब असली खतरा है आइएस से। इससे ही क्या मालूम नहीं होता है कि सुधारों का सिलसिला अभी शुरू ही नहीं हुआ है?

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