कुलदीप कुमार

जीवन विसंगतियों से भरा है। अगर ये विसंगतियां न हों, तो शायद जिंदगी इतनी दिलचस्प भी न रहे। बृहस्पतिवार को दो दिलचस्प विसंगतियां देखने को मिलीं। संसद भवन परिसर में सोनिया गांधी और शरद यादव के साथ-साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नारे लगाते नजर आए। नारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की जा रही थी कि वे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर अपना मौन तोड़ें। और यह मांग वही मनमोहन सिंह कर रहे थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए किसी भी मुद्दे पर न बोलने की नीति अपना रखी थी और यह मौन कुछ इस तरह देश भर में गूंजा कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में मुंह के बल गिरी।

दूसरी दिलचस्प विसंगति राज्यसभा में देखने को मिली, जहां सदन के नेता अरुण जेटली अपने उस बयान का औचित्य सिद्ध कर रहे थे, जिसमें उन्होंने व्यंग्यपूर्वक कहा था कि यह एक गंभीर सवाल है कि एक परोक्ष रूप से चुना हुआ सदन बार-बार सीधे जनता द्वारा चुने गए सदन की बुद्धिमत्ता और विवेक पर सवालिया निशान लगाए जा रहा है। यह टिप्पणी उन्हीं अरुण जेटली की है, जो वित्त मंत्रालय और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसे दो महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभालने वाले केंद्र सरकार के सबसे शक्तिशाली मंत्री सिर्फ इसीलिए हैं, क्योंकि वे इस परोक्ष रूप से चुने गए सदन के सदस्य हैं। वरना जनता ने तो लोकसभा चुनाव में उन्हें नकार दिया था। क्या ऐसे वक्त के लिए ही ‘जिस थाली में खाएं, उसी में छेद करें’ वाला मुहावरा बना था!

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस साल जनवरी में यह कहा था कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुना गया सदन ही सर्वोपरि है। यानी लोकसभा और राज्यसभा के दर्जे में अंतर करने और लोकसभा को राज्यसभा से अधिक महत्त्वपूर्ण बताने की कवायद इस वर्ष के शुरू से ही जारी है। कारण सिर्फ इतना है कि भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में तो बहुमत हासिल है, लेकिन राज्यसभा में नहीं।

इस समय हमारा लोकतंत्र बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है, क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने में किसी की रुचि नहीं हैं- न सत्तापक्ष की और न विपक्ष की। कारण स्पष्ट है। मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं सरकार पर अंकुश लगाने का काम करती हैं और किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता में रहते हुए अपने पर अंकुश मंजूर नहीं। राममनोहर लोहिया संसद को राष्ट्रीय पंचायत कहा करते थे, यानी एक ऐसा मंच, जिस पर देश की समस्याओं पर खुल कर चर्चा हो, बहस-मुबाहिसा हो और उनका समाधान निकालने का प्रयास किया जाए, और जो देश के आम आदमी की आशाओं-आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति दे।

संविधान के अनुसार सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी है, क्योंकि संसद जनता द्वारा चुनी हुई है और उसका प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन आजादी के अड़सठ साल बाद आज स्थिति यह है कि सरकार संसद को केवल कानून बनाने का माध्यम समझती है और विपक्षी दल शोरशराबा करके उसे अपने विरोध प्रदर्शन करने का एक मंच। संसद को राष्ट्रीय समस्याओं पर संजीदा विचार-विमर्श का मंच समझने, उसके माध्यम से जनता की समस्याओं की तरफ सरकार का ध्यान आकृष्ट करने और उसके जरिए सरकार से जवाबदेही की मांग करने की परंपरा अब लगभग समाप्त हो गई है। सरकार और विपक्ष के बीच भी स्वस्थ विरोध की जगह शत्रुता का संबंध स्थापित हो गया है।

अटल बिहारी वाजपेयी एक संस्मरण सुनाया करते थे कि जब उन्होंने लोकसभा में पहला भाषण दिया, तो उसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कड़ी आलोचना की। शाम को किसी दूतावास की पार्टी में नेहरू उन्हें देख कर उनके पास आए और उनकी पीठ थपथपा कर बोले: ‘आज तुम बहुत अच्छा बोले। लेकिन कुछ ज्यादा सख्त नहीं हो गया क्या?’ और यह कह कर एक बार फिर पीठ थपथपा कर मुस्कराते हुए किसी दूसरे व्यक्ति की ओर मुखातिब हो गए। आज क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अपनी कड़ी आलोचना सुनने के बाद प्रधानमंत्री तो क्या, कोई मंत्री भी किसी नौसिखिए सांसद का इस तरह हौसला बढ़ाएगा?

पहली बात तो यह कि अधिक संभावना यही होगी कि प्रधानमंत्री अपनी आलोचना सुनने के लिए सदन में मौजूद ही नहीं होंगे। और अगर हुए भी, तो उनकी पार्टी के लोग किसी को भी उनकी कड़ी आलोचना करने नहीं देंगे और इतनी टोका-टाकी करेंगे और इतना शोर मचाएंगे कि आलोचना करने वाला सांसद बोल ही नहीं पाएगा। इन दिनों संसद में दलीलें और तर्क कम, शोर ही अधिक सुनने को मिलता है।

अगर कोई यह पूछे कि देश में सबसे अधिक शक्तिशाली संस्था कौन-सी है, तो इसका जवाब क्या होगा? संसदीय लोकतंत्र में सबसे अधिक शक्तिशाली संस्था संसद को होना चाहिए। लेकिन हकीकत यह नहीं है। सबसे शक्तिशाली संस्था प्रधानमंत्री कार्यालय है। इस समय हालत यह है कि केवल संसद की गरिमा और महत्त्व का क्षरण नहीं हुआ है, बल्कि मंत्रिमंडलीय प्रणाली भी बेहद कमजोर हुई है। अक्सर प्रधानमंत्री और उनका कार्यालय जो महत्त्वपूर्ण नीतिगत फैसले करता है, उनके बारे में उनसे संबंधित मंत्रालय अनभिज्ञ ही रहते हैं।

जवाहरलाल नेहरू जितना लोकप्रिय और शक्तिशाली प्रधानमंत्री भारत के इतिहास में अभी तक कोई नहीं हुआ है। राजनीतिशास्त्री वेरनॉन ‘ह्यूआइट का मानना है कि नेहरू के लिए संसद लगभग एक नैतिक संस्था थी, जो आधुनिक भारत का प्रतीक थी और जहां प्रभावशाली भाषण और बहसें होती थीं। वे नियमित रूप से सदन में उपस्थित रहते थे और उसकी कार्यवाही में हिस्सा लेते थे। जब भारत को आजादी मिली थी, तो पश्चिमी देश और वहां के अनेक बुद्धिजीवी इस बात की खिल्ली उड़ाया करते थे कि एक गरीब और अशिक्षित देश में संसदीय लोकतंत्र को अपनाया गया है और प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया है। अधिकतर का मानना था कि भारत में यह व्यवस्था चल नहीं सकती।

नेहरू दुनिया के सामने यह सिद्ध करना चाहते थे कि अपनी गरीबी और अशिक्षा के बावजूद भारत सही मायने में एक लोकतंत्र बनने में समर्थ है। संसदीय कामकाज के प्रति उनके अत्यंत गंभीर रवैए की वजह से उन्हें ‘संसद का स्कूलमास्टर’ भी कहा जाता था। उनके जमाने में प्रधानमंत्री कार्यालय का प्रभारी संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी होता था और कार्यालय की भूमिका काफी सीमित थी, जबकि मंत्रिमंडलीय सचिवालय बहुत प्रभावी भूमिका निभाता था। स्थिति में बदलाव तब आया, जब लालबहादुर शास्त्री ने एलके झा को अपना प्रमुख सचिव बनाया। तब से प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका और शक्ति लगातार बढ़ती गई।

मधु लिमये ने नोट किया था कि नेहरू के कार्यालय में 1958-59 तक एक सौ उनतीस लोग काम करते थे, लेकिन 1975-76 तक इंदिरा गांधी के कार्यालय में यह संख्या बढ़ कर दो सौ बयालीस हो गई थी। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही प्रधानमंत्री कार्यालय सर्वाधिक शक्तिशाली सत्ताकेंद्र की तरह उभरा और महत्त्वपूर्ण नीतिगत फैसले भी मंत्रिमंडल की बैठकों के बाहर होने लगे। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंदिरा गांधी के मॉडल को ही अपनाए हुए हैं। इंदिरा गांधी की तरह ही उन्हें भी संसद की कोई खास परवाह नहीं। महत्त्वपूर्ण सवालों, घोटालों और नीतिगत मुद्दों पर वे लगातार मौन साधे हुए हैं, जबकि रेडियो पर वे नियमित देशवासियों को अपनी ‘मन की बात’ सुनाते हैं। सत्ता पूरी तरह से उनके और उनके कार्यालय के पास केंद्रित है। सरकार के कामकाज में किसी तरह की पारदर्शिता नजर नहीं आती है।

उधर कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष वही गलती कर रहा है, जो भाजपा ने की थी। वह संसद की कार्यवाही ठप्प किए हुए है और भाजपा को उसके आचरण की याद दिला रहा है। कुछ दिन तक इसे जायज भी माना जा सकता था, लेकिन इसे प्रतीकात्मक ही रखना उचित होता। संसद का पूरा वर्षा सत्र बेकार होने जा रहा है। विपक्ष को समझना चाहिए कि संसद सरकार की जवाबदेही का मंच है। इसे नाकारा बनाने का अर्थ लोकतंत्र को कमजोर करना होगा। सत्तापक्ष यही चाहता भी है, और विपक्ष इसमें उसकी मदद कर रहा है। लेकिन क्या यह देश के हित में है?

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