अशोक वाजपेयी

कविमित्र लीलाधर जगूड़ी पचहत्तर के हो गए। किसी ने फोन कर इसे उनकी ‘लीला’ बताया और कहा कि वे कई लोगों से वरिष्ठ होने के लिए यह लीला कर रहे हैं और पचहत्तर के नहीं हुए हैं! उनके मित्रों और वाणी प्रकाशन ने एक आयोजन उन पर केंद्रित किया, जिसमें बड़ी संख्या में लेखक एकत्र हुए। इस अवसर पर उनकी वाणी से दो पुस्तकें लोकार्पित हुर्इं, जिनमें से एक उनका गद्य-संग्रह है ‘रचना से जूझते हुए’। इन दिनों धार्मिक या वैचारिक आस्था की नीवें तक हिली हुई हैं। कोई साहित्य और कविता में आस्था की घोषणा या इजहार नहीं करता है। यह पुस्तक, इस सबसे अलग, कविता में आस्था का एक दस्तावेज है। मुझे याद आया कि 1980 में मुझे लिखे गए एक पत्र में जगूड़ी ने कहा था: ‘जब तक वह सबकी ओर नहीं जाती तब तक यह हवा, पानी और अन्न जैसी जरूरी भी नहीं लगेगी। कविता को अपने जीवन के लिए दूसरों के जीवन के और करीब जाना है, जहां लोग अपनी बातचीत अपने माध्यम से करते हैं।

भाषा उनके लिए उपकरण ही नहीं उपार्जन भी है, जिसमें अभिव्यक्ति के भाषिक आकार उनके जीवन की गति, आलस्य और परिस्थितियों में से बनते हैं। जहां सारी चीजों का जायका वे इस सवाल से लेते हैं कि इससे फायदा क्या होगा? कविता भी जीवन और भाषा का अंतिम मुनाफा है।… कविता एक जरूरी बातचीत है, जो की जानी चाहिए।’

‘कविता के आसपास’ निबंध में, जो इस नई पुस्तक में संकलित है, वे कहते हैं: ‘शब्दों की बहुत बड़ी तादाद के बावजूद आज हमारे पास कुछ भी नहीं कहने वाले शब्द ज्यादा हैं। सबसे कम ही हमारे पास सबसे ज्यादा हैं।’ फिर जोड़ते हैं: ‘अच्छी कविता वह है जो अपने कवि के विचारों को ही नहीं, उसके समय को और उसके जीवन को भी लांघ जाए। कवि का जीवन कविता का जीवन हो जाए। मुझे वह कविता अच्छी लगती है जो सोचने की मुक्ति दे और नए-नए अनुभव क्षेत्रों को ‘गोचने’ के लिए बंद हवा में भी उछाल दे।’ वे मानते हैं कि ‘पुरानी कविता ही नए कवियों और नई कविता को जन्म देती है।’

अन्यत्र उनका मत है: ‘भाषा के माध्यम से अज्ञात और अदृश्य में झांकने की विरल कोशिश है कविता। अभिव्यक्त भी होना है और अनभिव्यक्त को भी समझना है। कहे हुए को समझना है और अब तक नहीं कहे हुए को कहना है। कितना कहना है और कितना छुपाना है, यह काव्याभिव्यक्ति का आत्मसंघर्ष है।’ कविता खतरे में है, इसकी बहस करने वालों पर उनकी टिप्पणी है: ‘कविता को खतरे में देखने की असली चिंता बताती है कि कविता ने संसार में जीवन का जो बौद्धिक प्रतिसंसार रचा है, उसे हम अपने समय में फिर से संभव होते हुए देखना चाहते हैं। सुनना और समझना चाहते हैं।’ आजकल की कविता में गहराई और अनजाने को जनवाने की कविदृष्टि के बढ़ते अभाव का जिक्र करते हुए जगूड़ी कहते हैं कि कविता का ‘…स्पंदन जीवन के यथार्थ, अतियथार्थ और अयथार्थ के द्वंद्व को जाग्रत करता है। वह कविता व्यक्ति को भी समाज से कमतर नहीं आंकती। अच्छी कविता के लिए कुछ भी त्याज्य नहीं। अच्छी कविता अच्छाई के पीछे भी भागती है और बुराई का भी पीछा नहीं छोड़ती। अच्छी कविता भाषा में से अभाषा और विभाषा को पकड़ने की कोशिश करती है।’

जगूड़ी का विश्वास है कि ‘कविता भी हवा, पानी और आग के बाद सबसे पुरानी चीज है। एक आदिम कारखाना, जहां भाषा और जिंदगी हर बार फिर से ढाली जाती है। एक पुराना पहाड़ जो खोद कर निकालना पड़ता है। एक पुराना समुद्र जो बिस्तर के नीचे भी महसूस करना पड़ता है। एक ओर अपना जिया हुआ जीवन है, एक ओर संपूर्ण मानवता का जिया हुआ जीवन और समय है, दोनों तरह के जीवन किसी रचनाकार को आज भी उकसाते और आगे कर देते हैं।’ पचहत्तर की पकी उम्र में कविता में आस्था और उससे बहुत कुछ की उम्मीद करने वालों में जगूड़ी आगे हैं, यह प्रीतिकर और आश्वस्ति कर दोनों है।

चित्रकार की फिल्में:
चित्रकारों द्वारा भारत में फिल्में बनाने का कुछ सिलसिला तो है, पर परंपरा नहीं। तैयब मेहता, मकबूल फिदा हुसेन, अकबर पदमसी आदि ने फिल्में बनाई हैं। उसमें अब जुड़ गए हैं अधिकतर अपने अमूर्त चित्रों और स्वांग-चित्रों के लिए विख्यात गोपी गजवानी। हमें एक साथ, लगभग डेढ़ घंटे की कुल अवधि की, उनके द्वारा बनाई आठ छोटी फिल्में पिछले सप्ताह देखने को मिलीं। उनमें ‘एक समय पवित्र कौआ’ से लेकर ‘मेरी पहली प्रार्थना’ शीर्षक फिल्में शामिल थीं। एकाध को छोड़ कर, जिसमें बाकायदा एक अभिनेता है, सभी के पात्र रोजमर्रा की जिंदगी के चरित्र हैं, जो अभिनय नहीं करते, अपनी जिंदगी बिताते हैं कुछ न कुछ करते हुए। प्राय: सभी फिल्में ध्वनि-विपुल हैं, पर निश्शब्द। साधारणता की कविता और नाटक दोनों ही सहज ढंग से देखे-दिखाए गए हैं।

लेकिन ऐसा करते हुए गोपी कई धारणाओं को प्रश्नांकन के घेरे में बहुत शांत और अनाटकीय मौन भाव से ले आते हैं- पवित्र नदी और पुण्य स्नान, बड़ी पार्टियों के पहले और बाद का खोखला शून्य, सुंदरता का आकर्षण और भंगुरता, युद्ध और उसका विनाश, समय और प्रतीक्षा, प्रार्थना आदि।

गोपी स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहते, पर उनकी फिल्में हमारे आज के जीवन में जो दबी-छुपी हिंसा है उसे बहुत जतन से झलका देती हैं। हमारी संवेदना को झकझोरती हैं कि हमारे चारों ओर जिंदगी जिस तरह से संघर्ष कर रही है उसे हम नजरंदाज करते हैं। गोपी इन फिल्मों से हमारे लिए विचार और संवेदना का एक अंतराल रचते हैं, जिसमें हम सोच सकते हैं कि लगातार जो हमारे आसपास अपनी लय और गति से हो रहा है उसमें कितनी सुंदरता और क्रूरता एक साथ है। सबके बावजूद जिंदगी, लोग और घटनाएं आदि अविराम चलती रहती हैं। हमारे देखे-अनदेखे, जाने-अनजाने इतना कुछ होता रहता है और हम उससे घिरे रह कर भी उसे अलक्षित कर अपने भूगोल को संकरा करते रहते हैं!

सत्ता और विश्वविद्यालय:
इधर वर्तमान विश्वविद्यालय-व्यवस्था में वर्तमान सत्ता द्वारा किए जा रहे लगातार हस्तक्षेप को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। इस ओर ध्यान खींचा गया है कि ऐसा यही सत्ता नहीं कर रही है, पिछली सत्ता ने भी ऐसा ही कमोबेश किया था। अब एक और विशेषज्ञ ने यह तथ्य बताया है कि भारत में वर्तमान विश्वविद्यालय-व्यवस्था अपने आरंभ से ही सत्ता-स्थापित और पोषित रही है। औपनिवेशिक सत्ता ने उसकी शुरुआत की थी और उसका मुख्य लक्ष्य तभी से सत्ता को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होना रहा है।

इस व्यवस्था में ज्ञान का उत्पादन विश्वविद्यालयों में स्वभावत: नहीं होता- उनका काम बुनियादी तौर से अन्यंत्र विकसित-उत्पादित ज्ञान को संप्रेषित करना, उसमें निष्णातता फैलाना और उसका प्रमाणीकरण करना रहा है। ज्ञानोत्पादन के लिए विश्वविद्यालयों से अलग विज्ञान, टेक्नालजी, सामाजिक विज्ञान, बुनियादी शोध आदि के अलग संस्थान बनाए गए हैं। दूसरी ओर, एक बड़े उद्योगपति ने यह रेखांकित किया है कि पिछले साठ वर्षों में भारत से एक भी ऐसा आविष्कार या खोज नहीं है, जो उसके नाम से विश्वव्यापी हुई हो!

इस इतिहास के साथ और अपने मूल पोषण के लिए सत्ता पर निर्भर रहने वाले विश्वविद्यालयों के किसी गहरे-टिकाऊ अर्थ में स्वयत्त या नवाचारी होने की उम्मीद करने का कोई आधार नहीं बनता। यह आकस्मिक नहीं है कि पिछले कई वर्षों से हमारे विश्वविद्यालय, जिनमें कुछ केंद्रीय और लब्धप्रतिष्ठ विश्वविद्यालय शामिल हैं, अपनी निर्भीक नवाचार के लिए नहीं, अपने पीछे ले जाने वाले कदमों के लिए विवाद में आए हैं। उनमें हो सकता है कि कोई समूह, शिक्षकों या छात्रों का, सजग-सक्रिय हुआ हो, जिसने किसी नए आचार-विचार, नए किस्म के प्रतिरोध का प्रस्ताव किया हो- पर विश्वविद्यालय नाम की संस्था ने उसे दबाने या हतोत्साह करने के अलावा कभी कुछ और नहीं किया। जिस तरह की असहिष्णुता, सांप्रदायिकता, जातिवाद आदि हमारी सत्ताकामी राजनीति के अनिवार्य अंग और पक्ष बन गए हैं, वैसे ही विश्वविद्यालय के भी, कमोबेश। यह कहना बहुत गलत या यथार्थ से परे न होगा कि हमारे विश्वविद्यालय, उनमें संपुंजित प्रतिभा और ज्ञान, ऊर्जा और युवा शक्ति के रहते भी राजनीति का अनुकरण करते रहे हैं; उसका प्रतिरोध या उसका विकल्प बनने के प्रति उदासीन और अनिच्छुक।

हालत तो इस कदर खराब है कि हमारे विश्वविद्यालयों से निकले छात्र न तो अच्छे नागरिक हैं, न उनमें किसी तरह की सांस्कृतिक और वैचारिक साक्षरता का ही कोई प्रमाण दीख पड़ता है। अपवाद हैं, पर वे नियम को ही सिद्ध करते हैं। फिल्म संस्थान के छात्र एक अपात्र को अध्यक्ष बनाने के विरोध में हड़ताल कर रहे हैं, कभी शिक्षकों-छात्रों ने किसी अपात्र को कुलपति बनाने के विरोध में हड़ताल की है?

अकेले साहित्य और कलाओं के क्षेत्र को ही लें, तो इनमें विश्वविद्यालयों की भूमिका अत्यंत रूढ़ और प्रतिगामी रही है। उनका अपने समय के जीवंत सृजन से कोई संवाद तक नहीं है। यह भी नोट करना जरूरी है कि भाषाओं को ज्ञान-सक्षम बनाने और उनमें ज्ञानोत्पादन की क्षमता विकसित करने में विश्वविद्यालयों ने लगभग कोई भूमिका नहीं निभाई है। इस समय अनेक भारतीय भाषाओं को कई लोकप्रिय माध्यम दूषित-भ्रष्ट-विकृत कर रहे हैं और हमारे विश्वविद्यालय और उसके लोग इस क्षरण को हाथ पर हाथ धरे या आंख मूंद कर देख भर रहे हैं!

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