अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

देश की वर्तमान स्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर ‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम सही तरीके से लागू किया जाए, तो निस्संदेह अवसरों के अनेक दरवाजे खोल सकता है। पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में अनेक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश के एक बड़े तबके ने सूचना-क्रांति का स्वागत किया है, खासकर मोबाइल संपर्क के क्षेत्र में। पर यहां सवाल सरकार के रवैए को लेकर है, जो इस कार्यक्रम को आक्रामक ढंग से पेश कर और देश की हर समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है।

दावा किया जा रहा है कि इससे अमीरी और गरीबी के बीच की खार्इं मिटेगी। पर इस पूरी कवायद को सुविधासंपन्न लोगों की सुविधाओं में विस्तार के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अगर इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन में स्थानीय आवश्यकताओं को नकारा गया, तो सरकारी दावों के विपरीत सुविधाहीन लोगों के शोषण का एक नया माध्यम बनेगा। लिहाजा ‘डिजिटल इंडिया’ को लागू करने से पहले मुकम्मल तैयारी करनी चाहिए। इसमें भारतीय विविधता के संरक्षण का प्रश्न भी प्रमुख है।

पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में देश की राजनीतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि ने एक ऐसे मध्यवर्ग को तैयार किया है, जिसको सब कुछ ‘स्मार्ट’ चाहिए। इसी वर्ग को आकर्षित करने के दबाव में सरकारें बिजली, सड़क, शिक्षा स्वास्थ्य जैसी आधारभूत आवश्यकताओं पर ध्यान देने के बजाय मुफ्त में लैपटॉप, टैबलेट और वाई-फाई की सुविधा बांटने लगी हैं। इस शोर में उस वर्ग की आवाज लगातार दबती जा रही है, जिसको सूचना-प्रौद्योगिकी के बजाय दो जून की रोटी जुटाना कठिन होता है।

वर्तमान स्थिति में ‘डिजिटल इंडिया’ में शामिल होने की परोक्ष शर्त है कि लोकभाषा और संस्कृति का परित्याग किया जाए। यह कहीं से न्यायसंगत नहीं दिखता कि जिन व्यापक भारतीय उपभोक्ताओं के भरोसे अमेरिकी संचार कंपनियां लगातार फल-फूल रही हैं, उन्हीं उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की शर्त को अंगीकार करना पड़े। इस संबंध में प्रधानमंत्री मोदी की यह अपील सराहनीय है कि भारत में उद्यमियों को गूगल के विकल्प के बारे में सोचना चाहिए। लेकिन यह भी देखना होगा कि गूगल एक शक्तिशाली सामंत की तरह है, उसके समक्ष जब भी कोई नया उत्पाद तैयार होने का प्रयास करता है, वह कुचले जाने को मजबूर होता है।

कभी आइआइटी दिल्ली के कुछ शोधार्थियों ने बंगलुरु में गुरुजी डॉट इन नामक सर्च इंजन का विकास किया था और बड़े उत्साह के साथ खड़ा होने का प्रयास किया था, जो कई मायनों में गूगल से बेहतर भी था, लेकिन आज उसका कोई नामलेवा नहीं है। इस बाजारी प्रतिस्पर्धा में किसी स्थापित गूगल के बरक्स नया उत्पाद खड़ा करना बड़ी चुनौती है। वर्तमान परिदृश्य में कोई निजी कंपनी उसमें निवेश का साहस शायद ही करे। ऐसे में अगर मोदी सरकार सही मायनों में गूगल का भारतीय विकल्प चाहती है, जो होना भी चाहिए, तो ऐसे प्रयासों को सरकारी संरक्षण की आवश्यकता होगी। चीन ने यह सब करके दिखाया भी है। भारत में भी यह संभव है, बस सच्ची निष्ठा होनी चाहिए।

इसमें प्रयास यह होना चाहिए कि यह सब कुछ भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हो, जिससे देश के बहुसंख्यक लोग अपनी भाषाओं के साथ इस प्रक्रिया से जुड़ सकते हैं। यह भी देखना होगा कि इसे लोगों पर थोपा नहीं जाए, बल्कि स्वाभाविक रूप से इससे लोग जुड़ें तो बेहतर है। इसके विपरीत वर्तमान स्थिति यह है कि ‘डिजिटल इंडिया’ को हर मर्ज की दवा बताया और आक्रामक ढंग से पेश किया जा रहा है।

पर तमाम सफलताओं के बावजूद तकनीक मानव का विकल्प नहीं हो सकती। आज सीसीटीवी कैमरा चोर की पहचान करवा सकता है, इससे जुड़े सेंसर चोर को घर में घुसने से रोक सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को चोर बनने से नहीं रोक सकती। यह काम कोई व्यक्ति ही कर सकता है। इसलिए तकनीक को मात्र एक माध्यम के रूप में देखना चाहिए, उस पर अतिनिर्भरता के अपने खतरे हो सकते हैं।

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