सय्यद मुबीन ज़ेहरा

हमारे यहां विवाह-शादियों में होने वाले दिखावे के खर्चों की वजह से न केवल उम्र हो जाने पर भी शादियों में देरी हो रही है, बल्कि इसके कारण माता-पिता बेटियों को बोझ समझने लगे हैं। अब यह अभिशाप समाज के हर धर्म और वर्ग में प्रवेश कर चुका है। फिजूलखर्ची और एक-दूसरे पर दिखावे में बढ़त ले जाने की कोशिश में लोग कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। एक बुराई कई और बुराइयों को जन्म देती है। विवाह के खर्चों के अलावा बेटी के ससुराल वालों की मांग के अनुसार दहेज देने की चिंता में न केवल घर के घर तबाह हो रहे हैं, बल्कि उन पर कर्ज का ऐसा बोझ लद रहा है कि परिवार के शेष लोगों का भविष्य भी अंधकार में डूब जाता है।

अगर हम वास्तव में ‘बेटी बचाओ’ अभियान में विश्वास करते हैं, तो दहेज के अभिशाप के खिलाफ केवल कानून से कुछ नहीं होगा। कुछ साल पहले बिहार के एक जिले के इमामों ने फैसला किया था कि वे ऐसी किसी शादी में निकाह नहीं पढ़ाएंगे, जहां दहेज लिया या दिया जा रहा हो। तब लगा था कि इस प्रयास से पूरे समाज का भला होगा और यह कोशिश तेजी से समाज में फैलेगी, इस अभिशाप से मुक्ति मिल जाएगी। पर ऐसा नहीं हुआ। अब दक्षिण से एक सुखद समाचार आया है।

दक्षिण में एक ऐसा गांव है, जहां बड़े बोर्ड पर लिखा है कि आप दहेज मुक्त क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। केरल के गांव निलांबर के लोगों ने अपने समाज में क्रांति ला दी है। सात साल पहले तक इस गांव के एक तिहाई लोग अपनी बेटियों की शादी के लिए अपने घर तक बेचने पर मजबूर थे, बेघर होने लगे थे। तब वहां की पंचायत ने गहराई से इस समस्या पर विचार किया। इस गांव में हर महीने लगभग साठ विवाह होते हैं, जिनमें दहेज पर तीन-चार लाख रुपए खर्च आता है। जो दहेज नहीं दे सकते थे, उनकी बेटियों की शादी नहीं हो पाती थी। जिन लोगों ने अपनी बेटियों का विवाह किया था, वे चालीस प्रतिशत के करीब थे और सब के सब दिवालिया हो चुके थे। जो बेटियों का विवाह करके कंगाल हो चुके थे, वे अपने बेटों की शादी में दहेज की मांग करते थे। जो संबंध बहुत पवित्र और दो परिवारों के बीच की कड़ी होना चाहिए, उसमें व्यापार की तरह का गुणा-भाग होने लगा था।

निलांबर नगर पालिका के अध्यक्ष के अनुसार 2009 में एक अभियान के तहत यह निर्णय किया गया कि निलांबर को दहेज मुक्त गांव बनाना है। इस संबंध में गांव में लोगों को जागरूक करने के लिए कार्यशाला आयोजित हुई, जिसमें उन्हें समझाया गया कि अगर वे दहेज लेने-देने के मकड़जाल में उलझे रहे तो एक दिन निलांबर गांव का अंत हो जाएगा। धीरे-धीरे लोगों की समझ में आने लगा। चूंकि दहेज के कारण हर परिवार परेशान रहता है, जब इसके खिलाफ लोग एक होने लगे तो अधिकतर लोग उनका साथ देने निकल पड़े। इस प्रकार निलांबर गांव में लोग दिल से दहेज प्रथा के विरुद्ध एकजुट होते चले गए।

इस संबंध में नुक्कड़ नाटकों के अलावा घर-घर जाकर लोगों को समझाया गया। अगर कहीं दहेज के बारे में पता चल जाता, तो लोग तुरंत इसका विरोध करते। जैसे जासूस काम करते हैं वैसे ही लोग दहेज के खिलाफ खबर इकट्ठा करते थे, ताकि उसे जड़ से उखाड़ फेंका जाए। दहेज के विरुद्ध लामबंद हुए स्वयंसेवकों ने लोगों का मन बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। निलांबर गांव के शब्बीर अली के अनुसार दहेज के खिलाफ माहौल बनाया गया कि इससे बड़ा अपराध कोई और नहीं है। यहां की पंचायत और कुछ गैर-सरकारी संगठनों ने दहेज के बिना शादी विवाह कराने और रिश्ते बनाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब आप एक नेक काम शुरू करते हैं तो फिर उसके साथ कई और अच्छाइयां अपने आप जुड़ने लगती हैं। दहेज के खिलाफ शुरू हुआ यह जिहाद यहां तक जा पहुंचा कि खर्चीली शादी, घरेलू हिंसा और वैवाहिक जीवन में कलह और अन्य सामाजिक बुराइयों तक के मामलों में समाज जागरूक होने लगा। यहां पर काम कर रहे गैर-सरकारी संगठन कई अन्य प्रकार की सहायता भी प्रदान करने लगे, जिनसे समाज को एक सकारात्मक दिशा मिलने लगी। नीलांबर गांव की अफ्सात और साजिदा ने बाल विवाह के विरुद्ध अपने समाज को जागरूक करने का काम किया, क्योंकि उनका बाल विवाह हुआ था और वे इसके दुष्परिणाम झेल चुकी थीं। इसलिए उन्होंने फैसला किया कि कोई उनकी तरह उस दौर से नहीं गुजरे, जिससे वे निकल कर आई हैं। वे बाल विवाह के विरुद्ध आवाज बन गर्इं और लोगों को समझाने लगीं कि कानूनी रूप से शादी की आयु क्या है और समय पूर्व विवाह का अंजाम क्या हो सकता है।

आज यह गांव न केवल खुद को दहेज मुक्त कहते हुए गर्व महसूस करता है, बल्कि यहां शिक्षा को लेकर भी नया सोच परवान चढ़ रहा है। वे ढाई हजार लोग, जो दसवीं कक्षा तक पास नहीं कर पाए थे, उन्हें एक शैक्षिक कार्यक्रम में लाकर पढ़ाया गया और अधिकतर ने यह परीक्षा पास करने में सफलता पाई। इसलिए यह कहना उचित लगता है कि इस गांव को ग्रामीण भारत पर अध्ययन के लिए चुना जाना चाहिए, ताकि दूसरे गांव में इस प्रकार की क्रांति लाई जा सके। इस गांव ने जो दहेज के अभिशाप के खिलाफ आदर्श सफलता पाई है, उससे इस गांव में न केवल शांति और संतुष्टि का वातावरण बना है, बल्कि भविष्य के लिए भी विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

हम भी इस गांव का अनुकरण कर सकते हैं ताकि अपने समाज में व्याप्त दहेज के अभिशाप को कुचला जा सके। क्या हम दहेज के अभिशाप को देश निकाला दे सकते हैं। समय आ गया है कि हम अपने असली मुद्दों की ओर ध्यान दें। अगर अपने समाज में पैठ बना चुकी ऐसी कुप्रथाओं को रोक लगाने में हम सफल हो जाते हैं तो अपनी उलझनों और परेशानियों को काफी हद तक कम कर सकते हैं। एक बुराई कई बुराइयों को अपने साथ लेकर आती है। जो रस्म अपनी बच्चियों को घर से विदा करते समय जरूरत के अनुसार उपहार देने से शुरू हुई थी कैसे वह मांग व्यापार का हिस्सा बन गई, इसका अहसास ही नहीं हुआ। हम चाहें तो अब भी इस पर रोक लगा सकते हैं। अकेले नहीं, सब मिल कर। सबको साथ लेकर। हमारे धार्मिक गुरु, उलेमा, बुद्धिजीवी, शिक्षक, नेता, कलाकार, खिलाड़ी, पत्रकार और वे सब, जिन्हें सुना या पढ़ा जाता है, अगर दिल से दहेज के अभिशाप के खिलाफ मन बना लें, तो समाज को इस अभिशाप से मुक्त कराने में अधिक समय नहीं लगेगा।

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