अशोक वाजपेयी
प्रेमचंद ने कभी कहा था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। मशाल होने का दावा तो आज साहित्य शायद ही करे। खासकर उस राजनीति का, जो आज चल रही है। इक्यावन वर्ष पहले मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ प्रकाशित हुई थी: बहुत चकाचौंध का अभ्यस्त हो गई राजनीति को शायद ही इस बढ़ते हुए अंधेरे की पहचान है- साहित्य अपने अंधेरे में चल रहा है, उसकी शिनाख्त करता हुआ। सभी जानते हैं कि एक ओर तो राजनीति समाज और राज को चलाने, बदलने आदि का वैचारिक अनुशासन है और दूसरी ओर सत्ताकामी शक्ति। अगर अपने इतिहास पर नजर डालें तो उन्नीसवीं शताब्दी तक कमोबेश भारत अपनी स्वतंत्रता और एकता राजनीति में नहीं, संस्कृति में खोजता-पाता था।
स्वतंत्रता-संग्राम की नायक छवियां उनकी हैं, जो सांस्कृतिक हस्तियां भी थे- तिलक, गांधी, अरविंद, रवींद्रनाथ, नेहरू, मौलाना आजाद, मदनमोहन मालवीय, नरेंद्र देव, लोहिया, सरोजिनी नायडू आदि। आज के राजनेताओं पर, जिनमें सोनिया गांधी, नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव, शिवराज सिंह चौहान, मायावती आदि शामिल हैं, सांस्कृतिक हस्ती भी होने का लांछन कतई नहीं लगाया जा सकता। दरअसल, हम आज जहां हैं वहां यह कहा जा सकता है कि संस्कृति में तो राजनीतिक चेतना बढ़ी है, राजनीति में सांस्कृतिक चेतना घटी है। हमारी संसद की राज्यसभा में इस समय, बल्कि कुछ दशकों से कोई सांस्कृतिक मूर्धन्य नहीं है। उसे फिर भी उच्च सदन क्यों कहा जाता है, यह समझना मुश्किल है।
राजनीति में विचार और सत्ता के बीच अक्सर तनाव, द्वंद्व, विसंवाद आदि होते हैं। राजनीति को प्रभावित करने वाले अनेक तत्त्व होते हैं, जो उसमें एक साथ सक्रिय होते हैं: सामाजिक संरचना, विभिन्न वर्गहित, धर्म-जाति-संप्रदाय, आर्थिकी और बाजार, मीडिया, शिक्षा, संस्कृति आदि। संस्कृति का नंबर लगभग आखिर में आता है। सांस्कृतिक चेतना से हमारा अभिप्राय होता है- संस्कृति की जरूरत और महत्त्व का एहतराम, उसके लोकप्रिय रूपों का सामाजिक व्यवहार, धर्म-आचार, नैतिकता, सामाजिक संबंध, अनुष्ठान, कर्मकांड, मेले-त्योहार आदि का आकर्षण और दबाव; संस्कृति के कलारूपों जैसे भाषाओं, साहित्य, कलाओं, ज्ञान आदि के प्रति संवेदनशीलता और सजगता, सांस्कृतिक संस्थाओं के ढांचों, उनकी स्वायत्तता का समर्थन, परंपरा की व्याख्या, समझ और उसके पुनर्नवीकरण की कोशिश, आर्थिकी धर्म, जाति आदि से ऊपर सांस्कृतिक बहुलता की पहचान आदि।
क्या समाज के अन्य क्षेत्रों में सांस्कृतिक चेतना है? मीडिया में, शिक्षा में, वाणिज्य-व्यापार में, बाजार में, पर्यावरण आदि में? टाटा ने एनसीपीए, टीआइएफआर आदि बनाए-पोसे, अजीम प्रेमजी ने शिक्षा-संस्थान, बिड़ला ने मंदिर बनाए और अंबानी ने बीस से अधिक मंजिलों का निजी आवास! कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी में संस्कृति की जगह नगण्य है।
वर्तमान परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि सक्रिय राजनीति में आदिवासी संस्कृति के प्रति उदासीनता, कृषि-संस्कृति की अवहेलना, नदी-वन-पर्वत की संस्कृतियों की उपेक्षा, अल्पसंख्यक संस्कृतियों के प्रति असहिष्णुता है। भारतीय संसद ने अपने समूचे इतिहास में संस्कृति पर चर्चा के लिए आधा दिन तक नियत करना उचित नहीं समझा। भाषाएं राजनीति के एजेंडे के बाहर हैं: भाषाओं के लिए एक स्थायी राष्ट्रीय आयोग बनाने का प्रस्ताव पंद्रह वर्षों से लंबित है। किसी राजनीतिक दल ने अपने किसी अधिवेशन या तथाकथित चिंतन-शिविर में संस्कृति और उसकी समस्याओं पर विचार करना जरूरी नहीं समझा। सत्ता द्वारा संस्कृति की सार्वजनिक संस्थाओं में हस्तक्षेप या अत्याचार होने पर विपक्ष अधिकांशत: उदासीन और निष्क्रिय ही रहता है।
इधर संस्कृति में हस्तक्षेप के नए रूप उभरे हैं: घरवापसी, लवजिहाद आदि। सत्ता अपने दर्प में हस्तक्षेप का नया भूगोल बना रही है: ललित कला अकादेमी का अधिग्रहण, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद में एक चापलूस अध्यक्ष की नियुक्ति, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की अध्यक्षता ऐसे इतिहासकार के हाथों, जिसका अपने अनुशासन में योगदान अज्ञात है, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास को एक अल्पज्ञात पत्रकार को सौंपना, फिल्म टेलीविजन इंस्टीट्यूट की अध्यक्षता एक अज्ञात फिल्मी अभिनेता को सौंपना आदि। अज्ञात कुलशीलों का आधिपत्य बढ़ रहा है और सांस्कृतिक बौनों का अभूतपूर्व अभ्युदय हो रहा है! वर्तमान सत्तारूढ़ राजनीतिक गठबंधन जब भी, जहां भी सत्तारूढ़ हुआ है, उसने संस्थाओं को तोड़ा, अवमूल्यित किया है: कहीं भी, कभी भी एक नई प्रतिष्ठित संस्था नहीं बनाई है!
सत्ता के समर्थन या उदासीनता से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जगह सिकुड़ती जा रही है। सरकारें सीधे कुछ न कर आहत भावनाओं के समूहों को उकसाती हैं और फिर बंदिश, प्रतिबंध लगाने पर उतारू होती हैं। हद यह है कि आइआइटी, आइआइएम को (जिनकी विश्वख्याति है) इधर ‘हिंदू-विरोधी’ संस्थाएं करार दिया गया है। हमारी विडंबना यह है कि लोकतंत्र में लोकतंत्र घट रहा है, अधिनायकता बढ़त पर है। लुप्त सरस्वती की खोज हो रही है और इस समय भारतीय सृजन, कल्पना और बुद्धि की जो सरस्वती अविरल प्रवाहित है उसकी राजनीति या तो अनदेखी कर रही है या उसे भरसक गंदला! यह कहने का वक्त आ गया है कि सारी राजनीति जिस तरह से चल-चला रही है, संस्कृति ही उसका सच्चा और बहुत हद तक अड़ियल विपक्ष है!
कब था आधुनिक:
दिल्ली की एक कलावीथिका इस सप्ताह एक बहस आयोजित कर रही है: ‘कब था आधुनिक’। इसमें साहित्य, ललित कला, रंगमंच आदि के विशेषज्ञ हिस्सा लेने जा रहे हैं। पिछले लगभग सौ बरसों से हम आधुनिकता से इस कदर आक्रांत रहे हैं कि उसके बारे में यह सोचना कि वह एक बीता हुआ चरण है, थोड़ा अप्रत्याशित और अटपटा लगता है। पश्चिम में तो दशकों से आधुनिकता को चिंतन और व्यवहार में उत्तर-आधुनिकता ने अतिक्रमित कर दिया। लेकिन हमारे यहां अक्सर हम समकालीनता, युवा आदि की बात करते तो रहे हैं, पर कुल मिला कर आधुनिकता के ही संदर्भ में। एक अर्थ में आधुनिक था नहीं, है।
हमने पहले इस पर भी विचार किया है कि हम पहली बार आधुनिक पश्चिम से अपने संपर्क-संवाद और मुठभेड़ के बाद आधुनिक नहीं हुए हैं। उससे पहले भी हमारी परंपरा में आधुनिकता के मुकाम आए हैं: मैं ही चार गिनाता रहा हूं- अमीर खुसरो, कबीर, तुलसीदास और गालिब। मुकुंद लाठ ने हमें बताया है कि सबसे पहले आधुनिक होने का दावा दरभंगा के नव्यनैयायिक आचार्य उदयन ने किया था, जब दसवीं शताब्दी में कश्मीर के नैयायिकों से अपने को अलग बताते हुए उन्हें पुराना करार दिया था और कहा था ‘हम आधुनिक हैं’। जाहिर है कि भारत में आधुनिकता का एक लंबा इतिहास है, भले हम पर इस समय जो आधुनिकता हावी है वह पश्चिम-प्रेरित है। यह दावा किया जा सकता है कि हमारे यहां परंपरा सदियों से अपने को पुनर्नवा करती रही है, आधुनिक हस्तक्षेपों से। बाद में ये हस्तक्षेप परंपरा में ही समाविष्ट हो गए और कई बार हम इन्हें आधुनिकता के एक मुकाम की तरह पहचानना भूल जाते हैं। आजकल की बहुत सारी आधुनिकता जातीय विस्मृति से उपजी और उसी के द्वारा पोषित-प्रेरित है।
दिए हुए की अपर्याप्तता को जान कर उसमें कुछ नया जोड़ने की कोशिश, जरूरी लगे तो कुछ तोड़-फोड़, निर्भीक प्रयोगशीलता, जिसमें नया कथ्य और नया शिल्प खोजने-पाने की विकलता हो, अपने प्रभावों के भूगोल का विस्तार आदि आधुनिकता के ऐसे गुण हैं, जिनकी एक लंबी परंपरा देखी जा सकती है। तनाव, विध्वंस, विपथगामिता, प्रश्नांकन आदि सभी को जब-तब परंपरा में खोजा-पाया जा सकता है। इसका एक आशय यह निश्चय ही है कि आधुनिकता अभूतपूर्व घटना नहीं है- वह चिंतन, कलाव्यवहार, सामाजिक आचरण आदि में होती रहती है। दूसरे शब्दों में आधुनिक था और है। वह होता रहेगा।
हमारे यहां इस पर भी विचार किया गया है कि कबीर, तुलसीदास, वचनकवियों आदि से लेकर गांधी, रवींद्रनाथ आदि ने जो देशज भारतीय आधुनिकता गढ़ी, वह पश्चिम केंद्रित आधुनिकता से कई मौलिक अर्थों में भिन्न है और पश्चिम के रैडिकल प्रश्नांकन को भी शामिल करती है। उदाहरण के लिए, उसमें जीवन का उत्सव मनाना और उससे प्रबल आसक्ति, प्रकृति के प्रति आदरभाव, अपने को विराट से अनुगुंजित और उसके प्रति जिम्मेदार आदि मानने के भाव शामिल हैं। उसमें सामाजिक अन्याय और व्यक्ति की गरिमा का भी तीखा अहसास है। वह स्वतंत्रता, समता और न्याय पर आग्रह करती आधुनिकता है।
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