प्रभाकर श्रोत्रिय

प्रतिष्ठित रंग-समीक्षक जयदेव तनेजा का बृहत दस्तावेजी ग्रंथ है- रंग-साक्षी। यह ग्रंथ विगत पचास वर्षों के हिंदी नाट्य प्रदर्शन से जीवित संपर्क का साक्षी है। इस बीच वह समय भी था, जो हिंदी रंगमंच का स्वर्णयुग था। समीक्षक ने न केवल उत्कृष्ट नाट्य प्रदर्शन देखे, बल्कि उन पर सतत लिखा भी।

कहने को यह पचास वर्षों के मंचन का अनुवीक्षण या टिप्पणियां हैं। पर इसमें जो नाटक खेले गए वे देश-विदेश के हजारों वर्षों की स्मृतियां हैं। इस तरह यह ग्रंथ उन तमाम महत्त्वपूर्ण नाटकों का इतिहास भी है, जो नाटक का सर्जनात्मक इतिहास रचते हैं। जयदेव ने नाटकों की सैद्धांतिकी और प्रयोग पर अनेक पुस्तकें लिखी हैं। इनमें बृहद ‘रंगकर्मी कोश’ भी शामिल है।

पर यह कार्य उन सबसे भिन्न और आधारभूत है, क्योंकि नाटक के सारे सिद्धांत रंगकर्म से जन्म लेते हैं। भरत ने जो अनूठा नाट्यशास्त्र लिखा वह भी अपने पूर्व रंगकर्म से जन्मा था। मुझे लगता है कि दूर समर्थ निर्देशक, श्रेष्ठ अभिनेता और रंगकर्म की व्यावहारिकता से जुड़े समर्पित कलाधर्मी अपनी-अपनी जगह छोटे-छोटे भरत हैं, जो अतीत के रंगानुभव से सीखते और भविष्य की सिखाते हैं।

इस दृष्टि से यह पुस्तक रंगकर्म की दीक्षा भी है और ज्ञान भी, जिसमें केवल मंचन की सूची नहीं, बल्कि उनके प्रदर्शन पर लिखे अनुवीक्षण और टिप्पणियां हैं, जिनमें समीक्षा भी आ जाती है और नाट्य विवरण भी। अनायास ही इसमें अपने समय के महत्त्वपूर्ण निर्देशक, अभिनेता और रंगशिल्पी भी आते ही हैं।

1962 में इब्राहिम अलकाजी द्वारा प्रस्तुत मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ की अत्यंत प्रभावशाली प्रस्तुति नए प्रयोगवादी रंगमंच का ‘स्पष्ट’ प्रारंभ मानते हैं। ‘स्पष्ट’ के भीतर पूर्व में किए प्रयोगों की भी सांकेतिक स्वीकृति है, जो संभवत: इतने प्रभावशील न रहे हों। उनका मानना है कि सातवें से नौवें दशक तक हिंदी रंगमंच का स्वर्णकाल था। मैं समझता हूं कि जयदेव को बाद में इस उत्कर्ष के न बने रहने के कारणों पर भी विचार करना था। क्योंकि मंचन का अनवरत उत्कर्ष सामाजिक-राजनीतिक और वैचारिक निरंतरता के लिए जरूरी है। यह मैं नहीं कहता कि जो काम किया गया वह कमतर है, क्योंकि अंतत: किसी बड़े-से-बड़े काम की सीमा होती है। बहरहाल।

राजधानी में रहने का जयदेव ने जो लाभ लिया और उसे जिस परिणति तक पहुंचाया, ऐसा कम ही लोग कर पाते हैं। छठे-सातवें दशक से दिल्ली रंगभूमि रही है- यहां हजारों की तादाद में नाट्य प्रयोग हुए हैं, जिसमें देश भर के रंगकर्मियों ने सीखा और सिखाया भी है।

यह तथ्य है कि छठे दशक के प्रारंभ में इब्राहिम अलकाजी ने दिल्ली में जिस आधुनिक प्रयोगवादी हिंदी रंगमंच की नींव रखी उसने पूरे देश में राष्ट्रीय रंगमंच की स्थापना की। जिसमें प्राचीन और नवीन के साथ विदेशी रचनाओं और नाट्य प्रयोगों को भी भारतीय परिवेश की अनुकूलता में ढाला। पूर्व-पश्चिम के इस सम्मिश्र से अनेक नए प्रयोग सामने आए। क्योंकि दिल्ली में अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और ढेरों रंगशालाएं हैं। जैसे- राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, संगीत नाटक अकादेमी, इंदिरा गांधी कला केंद्र, साहित्य कला परिषद, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और अनेक निजी समूहों की संस्थाएं हैं। इसलिए यहां के रंगप्रेमियों, समीक्षकों, कलाकारों, निर्देशकों आदि की विश्वस्तर के समानधर्मियों से सघन मुलाकातें होती रहती हैं। जयदेव ने भी ऐसी अनेक मुलाकातें की हैं।

जयदेव की यह ईमानदार कोशिश रही है कि इस दौर का कोई महत्त्वपूर्ण प्रदर्शन ‘रंग-साक्षी’ में आने से न रहे। इसलिए उन्होंने नाट्योत्सवों में मंचित नाटकों को भी इस पुस्तक में शामिल किया है। जैसे 2000 से जारी ‘भारंगम’ (भारतीय रंग महोत्सव) में आए सैकड़ों प्रदर्शन- जिसमें देश-विदेश के मंचन शामिल हैं- इस पुस्तक में चर्चित हैं।

अगर इस ग्रंथ की विषय सूची पर विचार करें तो लेखक आधुनिक हिंदी रंगांदोलन के प्रारंभिक प्रतिमान में लेखक इब्राहिम अल्काजी द्वारा निर्देशित तीन नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘तुगलक’ और ‘अंधायुग’ लेते हैं। ओम शिवपुरी के ‘आधे अधूरे’ और हबीब तनवीर के ‘चरनदास चोर’ को भी वे इस सूची में शामिल करते हैं। दूसरे खंड में जयदेव ‘प्रयोगधर्मिता के विविध आयाम’ में इस बीच मंचित नाटकों की चर्चा करते हैं। इनमें कई बार मंचित नाटकों को भी लेते हैं, अगर उनमें नए प्रयोग हों।

तीसरे खंड में वे दिल्ली और अन्य स्थानों पर हुए नाट्य समारोहों के प्रदर्शन को शामिल करते हैं। चौथे खंड में वे 1975 से 1996 तक के अठारह वर्षों में मंचन और उनकी उपलब्धियां, नए प्रयोग या विकास का सार देते हैं। पुस्तक पूरी हो जाने के बाद भी कुछ मंचन शेष रह गए, इसकी चर्चा ‘छपते-छपते’ में कर वे यथासंभव इस बीच मंचित नाटकों को शामिल करते हुए पूर्णता का प्रयास करते हैं। इनसे भी उनकी गंभीरता और ईमानदारी प्रकट होती है।

‘पूर्वरंग’ यानी उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिसमें कार्य का विवरण ही नहीं, उनका सोच, अवधारणा और विश्लेषण है। मेरे विचार से यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और पुस्तक पढ़ने की गहरी जिज्ञासा आम पाठक को होती है। यों यह पुस्तक संदर्भ ग्रंथ तो है ही- पूरी तरह से पठनीय भी है। इतनी सच्चाई और परिश्रम से अगर हिंदी में काम होने लगा तो निश्चय ही हिंदी में अनेक महत्त्वपूर्ण काम हो सकेंगे।

रंग-साक्षी: जयदेव तनेजा; तक्षशिला प्रकाशन; 98-ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली; 1995 रुपए।

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पुस्तकायन : कोमल उम्मीद
युवा कवि अनिल त्रिपाठी का दूसरा संग्रह है- अचानक कुछ नहीं होता। इस संग्रह की कविताएं अपने समय और समाज के हाहाकारी शोर में कुछ कोमल उम्मीदें रचती हैं। विडंबनाओं पर हल्के हाथों चोट करतीं और एक कचोट के साथ मानवीय रेशों को सहलाती हैं। अपने समकाल पर तल्ख टिप्पणियां करते हुए अक्सर कविता के नारेबाजी की शक्ल अख्तियार कर लेने का खतरा बना रहता है, पर अनिल त्रिपाठी ने काफी सजग भाव से अपने को ऐसा करने से बचा लिया है। भाषा की ताकत को आक्रोश में जाया नहीं होने दिया है।

किताब के ब्लर्ब में वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने उचित ही कहा है कि ‘कई कविताओं में अवधी और ठेठ शब्दों का सटीक और अर्थगर्भ इस्तेमाल किया गया है। मैं तो यह शुरू से मानता रहा हूं कि हिंदी की ताकत उसकी बोलियां हैं और मुझे यह देख कर अच्छा लगा कि अनिल त्रिपाठी उस भाषिक सच्चाई के प्रति सजग हैं।’

अनिल त्रिपाठी ने मनुष्य की क्षुद्रताओं पर अंगुली उठाई है तो उसकी विवशताओं को भी रेखांकित किया है। कहीं वे बिंबों के जरिए अपनी बात कहते हैं तो कहीं सीधे सवाल की शक्ल में। ‘कहो कैसे हो?/ आजकल?/ क्यों बीत गया है?/ तुम्हारा आभ्यंतर/ सावन की हरीतिमा में भी/ क्यों नहीं नाचता/ तुम्हारे भीतर का मोर।’ यहां शायद ‘बीत’ के बजाय ‘रीत’ शब्द होगा।

अचानक कुछ नहीं होता: अनिल त्रिपाठी; शिल्पायन, 10295, लेन नं.-1, वैस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली; 150 रुपए।

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पुस्तकायन : कश्मीर की कूक
कश्मीरी कविताएं उस तरह अनूदित होकर हिंदी में नहीं आ पातीं, जिस तरह बांग्ला और मराठी से आती हैं। खासकर भक्तिकालीन प्रेमपरक कश्मीरी गीतों की तासीर हिंदी में उसके मूल स्वभाव के साथ उतार पाना कठिन रहा है। ललद्यद की कविताओं के अनुवाद तो फिर भी मिल जाते हैं, पर कश्मीर की कोकिला कही जाने वाली हब्बा खातून के गीत कम आ पाए हैं। सुरेश सलिल और मधु शर्मा ने इस कमी को पूरा किया है।

हब्बा खातून और उनकी परवर्ती अरणिमाल की कविताओं और गीतों का सुघर अनुवाद हब्बा खातून और अरणिमाल के गीत-गान नाम से प्रस्तुत करके। संग्रह की कविताओं और गीतों में कश्मीरी मूल का स्वाद सुरक्षित रखने की कोशिश है। गेयता बनाए रखने का सार्थक प्रयास।

इन दोनों कवयित्रियों के काव्यात्मक अवदान पर सुरेश सलिल की सुंदर टीपें भी हैं। ‘सुन री सखी, मेरा यार लापता है/ सोच-सोच अनहोनी दिल कांपता है/ रोज-रोज आते-जाते हम उसे तलाशेंगे।’ हब्बा खातून के गीत की ये पंक्तियां उनकी विरह-वेदना की साक्षी हैं।

हब्बा खातून और अरणिमाल के गीत-गान: अनुवाद- सुरेश सलिल, मधु शर्मा; वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 175 रुपए।

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पुस्तकायन : स्मृति में कथा

सूर्यनाथ,
सुनील विक्रम सिंह का उपन्यास कांपता हुआ इंद्रधनुष मॉरिशस यात्रा के अनुभवों पर आधारित है। परदेस में जिस तरह अपनी जमीन की स्मृतियां जब-तब आवाजाही करती और विगत का मोह रचती हैं, वह सब इस उपन्यास में है। मॉरिशस के अनुभवों के साथ-साथ इलाहाबाद की यादें इसमें घुलती-मिलती रहती हैं। स्मृति के भीतर स्मृतियां चलती रहती हैं। काव्यात्मक भाषा लेखक की नॉस्टेल्जिया को बहाव देती है।

हालांकि इस पुस्तक को सायास उपन्यास का कलेवर देने के बजाय यात्रा संस्मरण के रूप में रहने दिया जाता तो यह ज्यादा प्रभावशाली बन पाती। संस्मरणों को उपन्यास का कलेवर देना सिद्ध रचनाकारों का काम है। जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह न तो संस्मरण रह जाता है, न उपन्यास बन पाता है। इस उपन्यास के साथ यही हुआ है।
कांपता हुआ इंद्रधनुष: सुनील विक्रम सिंह; विभा प्रकाशन, 50 चाहचंद, इलाहाबाद; 150 रुपए।

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