अभय कुमार दुबे की किताब हिंदी में हम का उपशीर्षक है- ‘आधुनिकता के कारखाने में भाषा और विचार’। इस विमर्श की बुनियाद है- सरकारी या रघुवीरी हिंदी से भिन्न दैनिक व्यवहार, मीडिया और समसामयिक लेखन में बरती जाने वाली हिंदी का वह आधुनिक स्वरूप, जिसकी व्याप्ति या क्षमता का अनुमान शिष्टजन या जमीनी सच्चाई से कटे आत्ममुग्ध अंगरेजीदां नहीं लगा सके हैं। दुबेजी इस आधुनिकता की स्पष्ट पहचान विविधवर्णी हिंदी गद्य के विकास में देखते हैं।
लेखक ने बताया है कि संविधान की स्वीकृति पर संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने 14 सितंबर, 1949 को कहा था कि ‘हमने जो किया है उससे ज्यादा अक्लमंदी का फैसला हो ही नहीं सकता था… (एक समान भाषा) ऐसे एक और सूत्र की रचना करेगी, जो (पूरे देश को) एक सिरे से दूसरे तक एकता में बांध देगा।’ पर यह भविष्यवाणी बीच के वर्षों में संदिग्ध प्रतीत हुई, क्योंकि 1968 में जो राजभाषा कानून संशोधित हुआ, उसमें अंगरेजी को सहयोगी राजभाषा के पद से हटाने और हिंदी को भारतीय संघ की वास्तविक राजभाषा बनाने की संभावनाएं काफी कमजोर हो गई थीं।
अंगरेजी भले संविधान की आठवीं अनुसूची का अंग न थी, तो भी अंगरेजी को विदेशी जड़ों वाली एक भारतीय भाषा की संज्ञा देने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई थी। लेकिन हिंदी को रोमन लिपि में लिखा जाए- ऐसा सुझाव देने वाले कुछ लोगों के बावजूद, दुबेजी के विचार से, आज के माहौल में भी, कोई यह कहने की जुर्रत नहीं करेगा कि अंगरेजी को ही राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाना चाहिए। अंगरेजी के बढ़ते महत्त्व और दायरे के बावजूद, सुनने को मिलता है कि अगर अंगरेजी को कोई भाषा देश की ‘मास्टर लैंग्वेज’ बनने से रोक सकती है, तो वह हिंदी ही है।
अभय दुबे ने भारत की भाषाई आधुनिकता के इन दो चेहरों के अंतर्विरोध और विरोधाभास के ऐतिहासिक कारणों की बखूबी पड़ताल करते हुए संविधान से पहले और बाद की स्थितियों का गंभीर लेखा-जोखा लेते हुए भाषा नियोजन संबंधी गांधी और नेहरू के इस विचार की पुष्टि की है कि हिंदी के साथ-साथ सभी क्षेत्रीय भाषाओं के आधुनिकीकरण और विकास की मुहिम चलाई जानी चाहिए। भारतीय अभिजन के पास न तो यूरोप जैसा एक भाषाभाषी राज्य बनाने का विकल्प उपलब्ध था और न ही वह ऐसा राज्य बनाना चाहता था।
इरादा था मुख्यत: वह संपर्क भाषा विकसित करने का, जिसके माध्यम से विभिन्न भाषाभाषी राज्य परस्पर जुड़े रह सकें, क्योंकि भाषिक आधार पर भारत में जो राज्य विकसित हुए थे, वे भी वास्तव में इस अर्थ में बहुभाषी ही थे कि वहां बसने वाले लोग मात्र राजकीय भाषा नहीं बोलते थे। अपने ही राज्य के निवासियों और अन्य प्रांतों से संपर्क करने का व्यावहारिक माध्यम आम लोगों के लिए अंगरेजी नहीं, हिंदी ही सिद्ध हुई। कालक्रम में वही लोकतंत्र की चक्की में पिस कर आम आदमी को सुलभ हुई।
जहां तक सरकारी प्रावधानों और मनसूबों का संबंध था, दुबे ने उदासीनता और भितरघात को प्रमुख रूप से दोषी ठहराया है। उन्होंने समस्या के सभी पहलुओं का संतुलित अध्ययन करते हुए हिंदी, हिंदुस्तानी, उर्दू, संस्कृतनिष्ठ रघुवीरी और पारिभाषिक शब्दावली की परीक्षा की है। भाषिक समायोजन पर जो दोहरे-तिहरे दबाव पड़े, उसके कारण 1967 के राजभाषा संशोधित अधिनियम में व्यवस्था की गई कि अगर एक राज्य भी विरोध करेगा, तो हिंदी को एकमात्र राजभाषा नहीं बनाया जाएगा। उसके बाद राजभाषा के सिलसिले में दो कानूनी परिवर्तन हुए। पहला था- 1975 में गृहमंत्रालय में राजभाषा विभाग का बनना। फिर 1976 में अधिनियम पारित कर राज्यों को ‘क ख ग’ वर्गों में रख कर सरकारी कामकाज के तीन स्तर नियोजित किए गए।
इसके बावजूद अगर नीति कारगर न हो सकी, तो मुख्य कारणों में सरकारी भाषा की जटिलता ही नहीं, उसके विषय में एक समय के समर्थक रहे और बाद में विरोधी हो गए सुनीति कुमार चाटुर्ज्या जैसों का यह तर्क भी था कि हिंदी एक सांस्कृतिक भाषा नहीं है और उसके पास तमिल, तेलुगू या बांग्ला जैसी समृद्ध साहित्यिक विरासत भी नहीं है; इसलिए उसे सारे देश द्वारा नहीं अपनाया जा सकता। इसके अलावा, भारत में विविधता और बहुलता के विचार पर बल देने के कारण उपराष्ट्रीयताओं का इतना असर रहा कि कोई सर्वभाषी चरित्र आरोपित न हो सका।
साठ के दशक में बलदेव राय नायर ने 1961 की जनगणना के आंकड़ों का अध्ययन कर दावा किया था कि देश के लगभग सभी हिस्सों में हिंदी की मौजूदगी किसी सरकारी आदेश का फल न होकर, दीर्घकालीन ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम हैं। उद्योगीकरण-शहरीकरण और आव्रजन का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ सिलसिला हिंदी का प्रसार कर रहा है।
1968 से 2008 के बीच चालीस साल में हिंदी के लगातार विकसित हुए ‘सोशल सेक्टर’ के दोनों सिरों की अनुरेखा कम से कम दो बातों का संदेश देती है। एक, तत्समता और संस्कृतनिष्ठता के कारण जिस सरकारी क्षेत्र ने बेतहाशा नुकसान पहुंचाया, वह सामाजिक क्षेत्र में एकदम असर नहीं डाल पाया। साहित्यिक हिंदी ने भी संस्कृतनिष्ठता को दृढ़ता से बाधित कर रखा है। इस ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ के कारण आज तरह-तरह की हिंदियों का जमाना है- साहित्य की हिंदी, टीवी समाचारों की हिंदी, राजनीतिक भाषाभाषी की हिंदी, अंगरेजी मिश्रित हिंदी आदि। इससे तरह-तरह की बेचैनियां भी पैदा हुर्इं।
इस संदर्भ में दुबे ‘मल्टीप्लायर इफेक्ट’ का महत्त्व बताते हैं और उसकी तुलना में निर्जीव अनुवाद केंद्रित सरकारी हिंदी की कृत्रिमता को भितरघात या निहित स्वार्थों का षड्यंत्र बताने से नहीं झिझकते। दूसरी ओर, ऐतिहासिक प्रकिया की पड़ताल करते हुए, वे आधुनिकता के कारखाने में से ढल कर समूचे देश की संपर्क भाषा के रूप में उभरी हिंदी की सामर्थ्य का बखान भी करते हैं। दलित लेखन, नारी लेखन, समसामयिक कविता और हिंदी की अवमानना का भी मौलिक विवेचन करते हैं। फलत:, ‘हिंदी में हम’ देश की भाषिक समस्याओं और संभावनाओं को समझने-समझाने वाली महत्त्वपूर्ण पुस्तक बन सकी है।
हिंदी में हम: अभय कुमार दुबे; वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 750 रुपए।
अजितकुमार
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छोटा आकार बड़ा प्रभाव
छोटी से छोटी घटना, स्मृति या सूचना को कहानी बना देने में विवेक मिश्र सिद्धहस्त हैं। उनकी कहानियां आकार में छोटी और प्रभाव में बड़ी होती हैं। ऐ गंगा तुम बहती हो क्यों में कुल तेरह कहानियां संकलित हैं। विवेक मिश्र यथार्थ के साथ अपने कलात्मक बरताव के कारण अलग नजर आते हैं। उनकी कहानियों में एक स्पष्ट मुख्य घटना होती है, जिसको बताने के लिए पूरी कहानी की संरचना खड़ी की जाती है। ‘घड़ा’ कहानी की मुख्य घटना राजस्थान में जन्म होते ही लड़की को मार देना है, तो ‘बदबू’ की ‘आॅनर कीलिंग’। ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यों’ की मुख्य घटना बनारस में अंतिम संस्कार के समय पैर को अलग जलाया जाना है, क्योंकि पैर शूद्र हैं।
विवेक मिश्र ने अपनी कहानियों के लिए जो शिल्प चुना है उसमें वे पूरी तरह सफल हैं, पर एक ही शिल्प में बंधे रहने के कारण उनके कहानीकार में ठहराव आ गया है। ऐसी कहानियों में यथार्थ अपने जटिलतम रूप में नहीं, बल्कि अत्यंत सरलीकृत रूप में व्यक्त होता है। यह इन कहानियों की सबसे बड़ी सीमा है, जिससे कहानीकार को पार जाना होगा।
ऐ गंगा तुम बहती हो क्यों: विवेक मिश्र; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 180 रुपए।
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पढ़ाई का पैमाना
पिछले एक दशक से प्रेमपाल शर्मा शिक्षा संबंधी बुनियादी सवालों को लगातार उठा रहे हैं। इन वर्षों में उन्होंने अपने लेखन और गतिविधियों को शिक्षा के इर्द-गिर्द ही रखा है। शिक्षा के सरोकार इसी कड़ी में उनकी नई किताब है। इसमें शिक्षा के विविध पहलुओं को लेकर लिखे गए उनके लेख संकलित हैं। इन लेखों में किसी सैद्धांतिक ज्ञान के आलोक में शिक्षा पर विचार नहीं किया गया है, बल्कि रोजमर्रा के जीवनानुभवों की मार्फत हमारी शिक्षा पद्धति की मूलभूत खामियों को रेखांकित किया गया है। एक तरह से यह पुस्तक अनुभव से ज्ञान की ओर यात्रा है और इसे व्यावहारिक शिक्षा-विमर्श में एक सार्थक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रेमपाल शर्मा शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन की कुंजी मानते हैं। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि भारत का विशिष्ट वर्ग सामाजिक परिवर्तन को रोकने के लिए शिक्षा और ज्ञान को आम जनता तक पहुंचने नहीं दे रहा है। ‘समान स्कूल प्रणाली’ और ‘मातृभाषा में शिक्षा’ को आजादी के बाद से ही नजरअंदाज किया जाना इस बात का ठोस प्रमाण है। ‘शिक्षा के मूल्य’, ‘समाज में रहने की शिक्षा’, ‘दीवार पर लटके मूल्य’, ‘शिक्षा-कुशिक्षा’ आदि लेख इस बात को समझने में मदद करते हैं कि आधुनिक शिक्षा पद्धति बार-बार अपने घोषित उद्देश्यों की पूर्ति में विफल क्यों हो जाती है? इसी तरह ‘शिक्षा की क्रूरता’, ‘डिग्री का प्रोजेक्ट’, ‘नकल: मेरी गैया इंटर पास’, ‘स्कूल का धंधा’ जैसे लेखों में इस बात की गहरी पड़ताल की गई है कि हमारी शिक्षा एक बेहतर मनुष्य और नागरिक के निर्माण में ‘क्यों’ विफल हो रही है।
शिक्षा के सरोकार: प्रेमपाल शर्मा; सस्ता साहित्य मंडल, एन 77, पहली मंजिल, कनॉट सर्कस, नई दिल्ली; 110 रुपए।
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कबीर पर कब्जे के विरुद्ध
भक्ति आंदोलन धार्मिक आवरण में सामाजिक मुक्ति का एक व्यापक आंदोलन था। सामाजिक मुक्ति का सर्वाधिक प्रखर स्वर कबीर की रचनाओं में सुनाई देता है। यही कारण है कि अन्य भक्त कवियों की तुलना में कबीर अधिक प्रासंगिक और सामाजिक विमर्श से जुड़ी बहसों के केंद्र में हैं। कमलेश वर्मा ने अपनी पुस्तक जाति के प्रश्न पर कबीर के माध्यम से इन बहसों में सार्थक हस्तक्षेप किया है। उन्होंने हिंदी आलोचना की कबीर संबंधी स्थापनाओं पर बुनियादी सवाल उठाते हुए हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, पुरुषोत्तम अग्रवाल और धर्मवीर की मान्यताओं का तार्किक खंडन किया है। इस प्रक्रिया में उनका सर्वाधिक टकराव धर्मवीर से है।
लेखक का मानना है कि पिछड़ी जातियों को दलित जातियों के साथ असावधानी पूर्वक घुला-मिला दिया गया है। इस घालमेल का परिणाम यह हुआ है कि ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई में नायक दलित बताए जाने लगे। कबीर भी इसी घालमेल का शिकार हुए हैं। कबीर को दलित बता कर पिछड़ों के योगदान को हड़पने की कोशिश की गई है। लेखक ने ब्राह्मणवाद और दलित-विमर्श को एक ही श्रेणी में रखा है, क्योंकि दोनों के यहां किसी रचनाकार या चिंतक की योग्यता का आधार जन्मना है और दोनों ही हिंदी साहित्य की निर्मिति में पिछड़ी जातियों के योगदान को हड़पना चाहते हैं। कमलेश वर्मा की इस पुस्तक को दलित-विमर्श द्वारा कबीर पर कब्जे के विरुद्ध ओबीसी विमर्श की तरफ से एक सचेत और तार्किक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए।
जाति के प्रश्न पर कबीर: कमलेश वर्मा; पेरियार प्रकाशन, ए/44, अशोकपुरी कॉलोनी, खाजपुरा, पटना; 149 रुपए।
दिनेश कुमार
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