मिथिलेश श्रीवास्तव
सुपरिचित कवि चंद्रकांत देवताले का कविता संग्रह खुद पर निगरानी का वक्त शांत तालाब में फेंके पत्थर की तरह है। देवताले ने जिस सघनता से अपने समय के घटनाक्रमों को समझा, सहा और कविता में बांधा है वैसी सघनता उनके समकालीनों की कविता में नहीं आ पाया है। इस संग्रह के आने के समय में या इसकी कविताओं के रचना समय के दरम्यान भारतीय समाज तेजी से बाजारोन्मुख होता दिखाई देता रहा है। चारों तरफ पूंजी और पूंजी निवेश की बातें हो रही हैं। सरकारी मंच खरबपतियों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के साथ साझा हो रहा है।
चंद्रकांत देवताले की कविता पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करती और बताती है कि इस देश में कालाहांड़ी जैसे अंधेरे में डूबे हुए इलाके हैं, जिनमें पूंजीपतियों और मुनाफाखोरों की कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती। वे अति परिचित घटनाओं के माध्यम से इस भूगोल पर फैले भूख, गरीबी और अभाव का सवाल उठाते हैं। सूरज को सत्ता का हिस्सा मानते हुए उससे पूछते हैं: ‘तुम सतत कालयात्री दरिद्रता और अन्याय के/ अंधेरे में डूबे कालाहांड़ी जैसे/ कई कई इलाकों के बारे में क्या है तुम्हारा विचार।’
साल दो हजार दस पर एक कविता है ‘गुजर गया दो हजार दस’। कविता शुरू ही होती है: ‘सिर मुड़ा कर गुजर गया दो हजार दस।’ दिपदिपाते चारों खंभों की छत्रछाया में इतनी हत्याएं हुर्इं कि उनकी गिनती करना असंभव है। कू्ररता का प्रतीक है दो हजार दस। एक तरफ हत्याएं हो रही हैं, दूसरी तरफ नए साल के स्वागत की तैयारी में लोग गा-बजा रहे हैं। लोगों को क्या हो गया है? उन्हें जरा भी परवाह नहीं कि लोकतंत्र के चारों खंभों की देखरेख में हत्याएं हो रही हैं। कवि निरुपाय है कि इस खतरे की घंटी के बारे में किसे बताऊं। ‘नष्ट हो रहा है साहस का भीतरी कारखाना’।
साहस के कारखाने के नष्ट होने का एक नतीजा निकल चुका है कि देश में सांप्रदायिक ताकतें सत्ता पर काबिज हो गई हैं, पूंजीवाद का उनके हाथों रोज सम्मान हो रहा है, समाज को संप्रदायों के बीच वैमनस्य बढ़ा कर बांटने वाली ताकतें सिर उठा कर चल रही हैं और इन सिरों को कुचलने वाली ताकतों का साहस नष्ट हो रहा है। झूठ का परचम लहराते पूरे देश में मंडरा रहे हैं फर्जी देश-प्रेमियों के दस्ते। कवि याद करता है कबीर, तुकाराम, मुक्तिबोध की प्रभावशाली परंपरा को। प्रतिरोध की परंपरा को अपने भीतर सोच के कारखाने में पैदा करने का समय आ गया है।
चंद्रकांत देवताले की कविता काव्यात्मक न्याय करती और साबित करती है कि किसानों की आत्महत्या के लिए कॉरपोरेट पूंजी जिम्मेदार है। लेकिन दूसरे ही क्षण कवि को लगता है: ‘और आज के हालात देख/ मुझे तो यही लगता/ असंभव है कविता से भी/ सच उगलवा लेना।’ ऐसे हालात में कवि कवियों को भी बख्शता नहीं है। कवियों से ही सवाल करता है: ‘कौन बताएगा क्या हो गया, कवि और कविता की आंच को इन दिनों।’
‘अपने आप से’ कविता में वे लेखकों पर कटाक्ष करते हैं। आगाह करते हैं कि कविता लिखने में ही रम मत जाओ। ‘निकलो अपने साथियों के साथ/ कामनाओं के किलों, हरमों, पिंजरों, बैठकखानों से बाहर निकलो/ यथार्थ की दुनिया को देखो/ दुनिया का यथार्थ देखो।’
संग्रह के अंत में एक परिशिष्ट जोड़ा गया है, जिसमें तीन कविताएं हैं। इनमें एक कविता निराला पर है और दो कविताएं मुक्तिबोध पर। कहते हैं, निराला ने अपने मरने की घोषणा जीते जी उन्नीस सौ साठ में कर दी थी। उनकी इस घोषणा को प्रमुखता से खबरों में छापा गया था। निराला पर चंद्रकांत देवताले ने ‘निराला द्वारा अपनी मृत्यु की घोषणा पर’ शीर्षक कविता उन्नीस सौ साठ में लिखी थी और उसी साल निराला की मृत्यु हो गई थी।
निराला के जीवन संघर्ष को मार्मिक अंदाज में देवताले ने कविता में अभिव्यक्त किया है। ‘तुम पंत से झुके नहीं/ दिनकर और सुमन से बिके नहीं।’ यह कविता निराला के व्यक्तित्व को, उनके संघर्ष को, उनके विचार-दृढ़ता को अभिव्यक्त करती है। उसी निराला का नाम आज/ पूंजीवाद पर तमाचा है/ उसी निराला के देश का/ बेहद जर्जर आर्थिक ढांचा है।’
मुक्तिबोध के व्यक्तित्व और जीवन संघर्ष को लेकर लिखी कविताओं के साथ टिप्पणी से पता चलता है कि दिल्ली के अस्पताल में जहां मुक्तिबोध भर्ती थे, देवताले शमशेर के साथ उन्हें देखने गए थे। अस्पताल से लौटने के बाद ये कविताएं लिखी गर्इं। ‘मुक्तिबोध’ कविता की पंक्तियां हैं: ‘दूर कहीं सुबक कर रोता है/ एक आदमी/ तमाम आदमी के लिए।’
इस संग्रह में कई स्मृति-लेखनुमा कविताएं हैं। इनमें स्मिता पाटील (स्मिता पाटील के लिए), सुदीप बनर्जी (स्मरण सुदीप) और मकबूल फिदा हुसेन (थे फकत मुकम्मल चितेरे तुम) की स्मृति में लिखी कविताएं हैं।
इन कविताओं में गहरे अहसास की अभिव्यक्ति हुई है। सुदीप बनर्जी कवि के लिए प्रेरणा की तरह थे: ‘उकसाते रहते हो/ मेरे जीवन की मिट््टी के दीये में/ कंपकंपाती लौ/ तुम बुझने नहीं देते।’ स्मिता पाटील के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालती पंक्तियां हैं: ‘फिर भी तुम्हारे सांवले मध्यवर्गीय/ समूचे होने और सहजपन पर/ उजास और डालता कुछ न कुछ/… तुम्हारी हस्ती के लिहाज से बेहद छोटा था वह परदा।’ ‘थे फकत मुकम्मल चितेरे तुम’ की यादगार पंक्तियां हैं: ‘कवि मुक्तिबोध को कंधा देने के बाद/ दशकों पहले फेंक कर जूते/ बन गए थे तुम विश्वमार्गी नंगे पैर/ करोड़ों में कद्र हुई कला की तुम्हारी/ पर वैसे ही तुम फकीर/ जैसे कवियों में/ त्रिलोचन और बाबा नागार्जुन अपने।’
खुद पर निगरानी का वक्त: चंद्रकांत देवताले; वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए।
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पुस्तकायन : उलझाव में संस्कृति
शुभू पटवा की नई किताब है- समय समाज और संस्कृति। इससे पहले उनके कहानी संकलन, उपन्यास और कुछ दीगर किताबें छप चुकी हैं। प्रस्तुत किताब अपने शीर्षक में जिस तरह गंभीर मुद्रा अपनाती है, वह भीतर मौजूद नहीं है। ज्यादातर लेख सामान्य हैं, जबकि उनके शीर्षकों की भंगिमा पांडित्यपूर्ण और गंभीर है। कई लेख प्रवचन और उपदेश जैसे हैं। ‘स्वाधीनता-सहिष्णुता’, ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’, ‘परिग्रह-अपरिग्रह’, ‘हृदय का विकास’, ‘शांति और अहिंसा’ जैसे लेखों में उलझाव है। विचारों में भी स्पष्टता नहीं है।
लेखों में विचारों और तथ्यों का ऐसा घालमेल है कि समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि लेखक इतिहासकार है, पत्रकार या प्रवचनकर्ता! ‘कर्म, श्रम और स्वधर्म’ का एक टुकड़ा देखें: ‘धर्म के आध्यात्मिकीकरण और भ्रातृभाव से यहां इतना ही तात्पर्य मानना चाहिए कि जो कर्म या श्रम हम करते हैं, हम अपने को उससे कितना अनासक्त रख सकते हैं। जब तक जीवन है, हमें कर्म तो करते ही रहना है। कर्म करते हुए भी यदि उसमें आसक्त न हों, लालसामुक्त रहें और निजी स्वार्थों का मोहजाल हमें न घेरे तो वैसा कर्म हमारा स्वधर्म ही माना जाएगा। वही कर्म श्रेयस होगा। यही आध्यात्मिकीकरण है और इसी से भ्रातृभाव आ सकता है।’
समय समाज और संस्कृति: शुभू पटवा, वाग्देवी प्रकाशन, विनायक शिखर, पॉलिटेक्नीक कॉलेज के पास, बीकानेर, 275 रुपए।
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पुस्तकायन : इतिहास में शहर
इतिहास केवल सम्राटों या राष्ट्रों का नहीं होता। शहरों, गांवों और जनपदों का भी होता है, हो सकता है। बरेली: एक कोलाज ऐसे ही एक शहर का इतिहास है। इस पुस्तक में शहर ही नायक है। इसके लेखक हैं सुधीर विद्यार्थी, जिन्हें जनपदीय इतिहासकार कहा जाता है। कभी हिंदी के बड़े कवि त्रिलोचन को ‘जनपद का कवि’ कहा गया था। किसी कविता का भूगोल जनपद हो सकता है, तो इतिहास का भूगोल भी हो सकता है।
इसमें भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम यानी सन सत्तावन की क्रांति से लेकर मौजूदा दौर तक का लेखा-जोखा मौजूद है। कम लोगों को पता है कि सत्तावन की क्रांति के एक नायक खान बहादुर खान का नाम बरेली के साथ गहराई से जुड़ा है।
बहादुर खान को ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने के जुर्म में 24 मार्च, 1860 की सुबह बरेली की कोतवाली में फांसी पर लटका दिया गया था। किताब में दामोदर स्वरूप सेठ, कथावाचक पंडित राधेश्याम, इस्मत चुगताई, मुंशी प्रेमनारायण सक्सेना, हरिवंशराय बच्चन के बरेली से जुड़ने का भी विस्तार से ब्योरा दिया गया है।
किताब के दो पाठ बेहद उत्सुकता जगाते हैं- जैमिग्रीन और बरेली कॉलेज की स्थापना का इतिहास। जैमिग्रीन का वास्तविक नाम मुहम्मद अली खान था, उन्हें भी फांसी दे दी गई थी। लेखक ने बड़े दुख के साथ लिखा है- ‘वह बरेली कॉलेज का छात्र था, लेकिन उसके नाम पर न कोई सभागार है, न कोई और स्मारक।’
यह जानना दिलचस्प है कि बरेली कॉलेज की बुनियाद सिडनी से आए बार्गन दंपति ने रखी थी। यह सब 1837 की बातें हैं। किताब में ऐसी कई चीजें हैं, जो स्थानीय महत्त्व का होने के साथ राष्ट्रीय गौरव की भी हैं।
बरेली: एक कोलाज: सुधीर विद्यार्थी, लोक प्रकाशन गृह, बी-131, गली नं.-2, सादतपुर, दिल्ली; 350 रुपए।
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पुस्तकायन : रहस्य का आवरण, राम जन्म पाठक
पारुल पुखराज की कविताएं कई बार रहस्यमयी होने का भ्रम देती हैं, मगर ऐसा है नहीं। हर कविता इस कचोट के साथ खत्म होती है कि काश इसके आगे भी कुछ और होता। एक तरह से ये कसक की कविताएं हैं। जहां होना लिखा है तुम्हारा उनका पहला कविता संग्रह है, लेकिन हिंदी पाठकों के लिए वे कोई अपरिचित नहीं हैं।
प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में वे छपती रही हैं। इन कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि उनके शिल्प में कसाव की कमी है। यों कई जगह अनगढ़ प्रयोग दिखते हैं, इसके बावजूद उनकी अर्थछवियों और ध्वनियों का सामंजस्य बना रहता है।
‘किसके हाथ उठते हैं कौर’, ‘मिट्टी पर मिट्टी’, ‘वही एक’ जैसी कविताओं में टेकनीक पर ज्यादा जोर दिया गया है। पारुल न सिर्फ छोटी कविताएं लिखती हैं, बल्कि उनके शीर्षक भी बेहद छोटे रखे गए हैं। अनेक कविताओं के शीर्षक एक शब्द के हैं, जैसे भोर, अस्त, डूब, जूठन वगैरह।
कह सकते हैं कि पारुल की कविताएं बिना लय-ताल की हैं। उनकी कविताओं में शब्द हावी हैं, बाकी सब कुछ शब्दों के पीछे-पीछे। ‘आवाज है बंसी मछेरे की’ कविता में इसे देखा जा सकता है: ‘डूबी/ नि:शब्द/ सांझ/ में/ आवाज़/ बंसी है मछेरे की/ धंसती/ जकड़ती/ करती/ रक्तरंजित/ मीन/ मन/ निर्मम।’
जहां होना लिखा है तुम्हारा: पारुल पुखराज, सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड) बीकानेर; 150 रुपए।
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