झूठ का बोलबला, सच्चे का मुंह काला वाली पुरानी कहावत अंतत: साबित हो गई है। साइंस मैगजीन के ताजा अंक में छपा आज तक का सबसे व्यापक अध्ययन, जिसको मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट |ऑफ टेक्नोलॉजी के सोरौश वोसौघी के नेतृत्व में संचालित किया गया था, इस नतीजे पर पंहुचा है कि झूठी खबर या सूचना सच्ची खबर से कई गुना ज्यादा तेज प्रसारित होती है और उसकी समाज में पैठ भी सच से ज्यादा होती है। इस नए महाकाय अध्ययन ने अंग्रेजी ट्विटर पर प्रसारित एक लाख छब्बीस हजार ‘स्टोरीज’ का विश्लेषण किया, जिनको तीस लाख लोगों ने ट्वीट किया था और पाया कि हर तरह से और हर समय झूठी खबरों के सामने सच्ची और तथ्यपरक खबरें बुरी तरह से पिटी हैं। उसके अनुसार अफवाह और प्रवाद सिर चढ़ कर बोले हैं और वे ज्यादा लोगों तक सिर्फ पहुंचे ही नहीं हैं, बल्कि उन्होंने जनमानस को व्यापक रूप से प्रभावित भी किया है। दूसरे शब्दों में, ट्विटर और उस जैसे सोशल नेटवर्क झूठ और फरेब का मकड़जाल इसीलिए बन गए हैं, क्योंकि मानव प्रकृति सच से ज्यादा झूठ के प्रति आकर्षित होती है और उसको पकड़ कर बड़े हिसाब से अपनी जिंदगी के ‘सच’ में फिट कर लेती है। अध्ययन ने ट्वीट को फैलाने में ‘वोटों’ की भूमिका को भी जांचा है, पर उसने पाया कि मशीनी रिट्वीट वास्तव में झूठी खबरों को उस तरह प्रसारित नहीं करते हैं, जिस तरह वास्तविक उपभोक्ता करते हैं।
अध्ययन के अनुसार एक झूठी खबर सच्ची खबर की तुलना में डेढ़ हजार लोगों तक छह गुना ज्यादा तेज गति से पहुंचती है। प्रसार की यह तीव्रता हर विषय में एक समान है- चाहे वह उद्योग-व्यापार से संबंधित हो, मनोरंजन से हो, विज्ञान प्रौद्योगिकी या फिर युद्ध-आतंकवाद से। बस एक अपवाद है- राजनीति। इस क्षेत्र में फेक न्यूज की गति बाकी क्षेत्रों से काफी आगे है। साफ है कि राजनीति से संबंधित झूठ को लोग और विषयों की अपेक्षा जल्दी स्वीकार कर लेते हैं। ट्विटर उपभोक्ता झूठ को ज्यादा अधिमान भी देते हैं। अध्ययन ने पाया कि झूठी ट्वीट की रिट्वीट होने की संभावना सच्ची खबर से सत्तर प्रतिशत ज्यादा है। यहां भी वोटों की भूमिका बहुत कम पाई गई है। वे सच्ची और झूठी खबर में फर्क नहीं करते हैं, जबकि वास्तविक उपभोक्ता अमूमन झूठी खबर पर रीझते हैं। यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह ट्विटर के पूरे जीवन काल को अपने में समेटता है। सितंबर 2006 से दिसंबर 2016 तक उस पर जन्मी हर विवादित खबर का उसने विश्लेषण किया है। पर ऐसा करने से पहले उसने दो सवालों का जवाब भी ढूंढ़ने की कोशिश की है- सच क्या है और उसको सच क्यों कहा जाए? इन दोनों प्रश्नों के लिए अध्ययन के संचार विशेषज्ञों ने एक खास अलोग्रिथम बनाया, जो ट्वीट की तीन तरह से जांच करता था- ट्वीट किसने की (वेरीफाइड अकाउंट था कि नहीं), ट्वीट की भाषा कैसी थी और किस तरह से ट्वीट का नेटवर्क पर प्रसार हुआ। इन तीन मापदंडों के तहत बने अलोग्रिथम ने बड़े प्रभावी ढंग से फेक और रियल न्यूज के बीच फर्क जाहिर कर दिया था। उससे यह भी पता चला कि झूठी खबर सच्ची खबर से कम से कम छह गुना और अधिक से अधिक दस गुना ज्यादा तेजी से प्रसारित होती है और वह लोगों को ज्यादा याद भी रहती है। पर झूठ के प्रति लगाव क्यों है, जबकि ट्विटर जैसे माध्यम का इस्तेमाल अपेक्षाकृत ज्यादा पढ़े-लिखे और संपन्न लोग ही करते हैं? अमेरिका की मात्र बारह प्रतिशत जनसंख्या ट्विटर पर है और उसका प्रोफाइल जाहिल और गंवार वाला नहीं है। अध्ययन ने इसके दो कारण बताए हैं। पहला कारण यह है कि झूठी खबरों में अनूठापन होता है, एक नवीनता होती है, जिससे उपभोक्ता आकर्षित होता है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए अध्ययन कर्ताओं ने उपभोक्ता की पिछले साठ दिन की टाइम लाइन को देखा और पाया कि जो खबर उसने रिट्वीट की थी, वह पिछली खबरों से अलग थी।
झूठ को आगे बढ़ाने में दूसरा कारक मनोभाव था। उन्होंने पाया कि वही ट्वीट तीव्र गति से प्राप्त होती थी, जिनमें ऐसे शब्द थे जो आश्चर्य या घृणा का भाव उत्पन्न करते थे। दूसरी तरफ, सच्ची जानकारी वाले ट्वीट में उन शब्दों का अमूमन इस्तेमाल हुआ था, जिनमें अफसोस और रंज के साथ भरोसा दिलाने वाली बात थी। अध्ययन से साफ जाहिर है कि भावनात्मक स्तर पर भड़काने वाली खबरें फैलती हैं। ऐसी खबरें आमतौर पर नकारात्मक, मगर अनूठी होती हैं, जो हमें उस पल के लिए इस तरह चकित कर देती हैं कि हम उसको रिट्वीट कर देते हैं। एक तरीके से ट्विटर पर फेक न्यूज का चलन और स्वरूप वास्तव में मानव स्वभाव को दर्शाता है, जिसमें आशंका हमेशा उपस्थित रहती है और जो हर वक्त नई या अनूठी आशंका के प्रति सजग रहता है। वह आशंका की वजह से झूठ को सच तुरंत मान लेता है। एक और तथ्य, जो सामने आया है वह राजनीति में सोशल नेटवर्क के इस्तेमाल को लेकर है। अध्ययन ने पाया कि राजनीति में इसका व्यापक तौर पर नकारात्मक तरीके से उपयोग हो रहा है। अन्य क्षेत्रों में भी झूठी खबरें चलती हैं, पर राजनीति में इनका प्रयोग बढ़ता जा रहा है। यह समुदायों के बीच डर और द्वेष फैलाने के लिए जानबूझ कर और नियोजित तरीके से इस्तेमाल की गई है, जिस पर अंकुश लगाना जरूरी हो गया है। साइंस मैगजीन के इसी अंक में सोलह प्रमुख विचारकों ने अध्ययन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि झूठ के व्यापक प्रसार की वजह से स्थिति भयावह हो गई है। उनके अनुसार इसे रोकने के लिए हमें इक्कीसवीं शताब्दी के सूचना तंत्र और उससे जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र में बड़े परिवर्तन फौरन लाने होंगे, वरना परिणाम भयानक होंगे। ‘हम कैसे ऐसा प्रसारतंत्र और सामाजिक माहौल बनाएं, जो सत्य के मूल्य और महत्ता को प्रोत्साहित करे और झूठ को जड़-मूल से उखाड़ दे? ऐसा सोचना और करना अब अनिवार्य हो गया है, क्योंकि झूठ की सत्ता बहुत तेजी से फैल रही है।’
इन विचारकों का यह भी मानना है कि ट्विटर और उस जैसे नेटवर्क पर झूठ का चलन लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बन गया है। ऐसे प्लेटफॉर्म पर हर उपभोक्ता लेखक तो है ही, साथ में पाठक और प्रकाशक भी है, जिसके लिए झूठ से दूर रहना नामुमकिन होता जा रहा है। कहीं न कहीं वह गुदगुदी पैदा करने वाली खबरों, अनूठी पर मनगढ़ंत घटनाओं और व्याख्याओं के जाल में फंस ही जाता है। यहां तक कि बेहद धीर-गंभीर व्यक्ति भी अनायास अफवाह से जुड़ सकता है, खासकर गरम चुनावी माहौल के दौरान वह विवाद का हिस्सा बने बगैर नहीं रह पाएगा। उस वक्त वह सच कहने या सुनने में कंजूसी बरतेगा। वैसे भी देखा गया है कि सच जानने के बाद भी ट्विटर उपयोगकर्ता अपना मत नहीं बदलते हैं। विचारकों ने अगाह किया है कि झूठ में लिप्त नागरिक अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति शिथिल होते जा रहे हैं और उन्होंने सार्वजनिक वास्तविकता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उनका ऐसा व्यवहार लोकतंत्र के लिए प्राणघाती साबित हो सकता है।
