अश्विनी भटनागर

अश्विनी भटनागर के सभी पोस्ट

95 Articles

तीरंदाज: पुरुषार्थी का पुरुषार्थ

मान्यवर मुस्कराए- दाढ़ी कर्म का नहीं, बल्कि मन का पुरुषार्थ है। मन चंगा तो कठौती में गंगा। अर्थात कुछ करो या न करो, कठौती...

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तीरंदाज: इतिहास में गधे

हर तरफ से गधों की पुन: इतिहास लिखने की जुर्रत पर वार होने लगा था। पर गधे अड़ गए। पीपल वाले ने इन तत्त्वों...

तीरंदाज: ला बैल जिसे मैं मारूं

आज न्यूज टेलीविजन संयम खो चुका है। वह समाज को कुरेदने का यंत्र बन चुका है। हर चैनल पर ‘एंग्री यंग एंकर’ गुत्थमगुत्था करने...

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तीरंदाज: लाडो खुश है

किसी किताब में हमने एक भव्य राजपूत राणा का चित्र देखा था, जिसमें वह अपनी टेढ़ी उंगली पर एक तोते को बैठाए हुए थे।...

तीरंदाजः लोकतंत्र में रामराज्य

अयोध्या में राममंदिर होने का मतलब रामराज्य की वास्तविकता को स्वीकार करना है। रामराज्य लोकतांत्रिक मूल्यों की पराकाष्ठा था। लोकतंत्र के मूल्यों की स्थापना...

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तीरंदाज: अर्थ अनर्थ

हम चुप थे। वास्तव में, उन सज्जन पुरुष के तर्क हमारे हलक में जबरन घुस जुबान बाहर खींच लाए थे और उसमें गांठ मार...

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तीरंदाज: लोकतंत्र में तानाशाही

हाल के दशकों में लोकतांत्रिक तानाशाहों ने अपने को वैश्विक मीडिया और नई तकनीक के अनुसार ढाल लिया है। अपनी उद्देश्य सिद्धि के लिए...

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तीरंदाज: चौतरफा खतरे के बीच

भारत के पास आज सीमित विकल्प है। यह सच है कि चीन की उग्र साम्राज्यवाद के खिलाफ दुनिया के हर कोने से आवाजें उठ...

तीरंदाज: बहुत नर्क है

हमारी झोपड़पट्टी में जब किसी के पास कुछ बच जाता था तो हमें दे देता था। पर नागा तो करना ही पड़ता था, क्योंकि...

तीरंदाज: झूठ का बोलबाला

यह सच है कि झूठ की हमें लत लग गई है। हमारे प्राकृतिक पूर्वाग्रहों की वजह से यह ललक पैदा हुई थी और उसको...

जनसत्ता तीरंदाज: विषाणु का विष

विषाणुकाल के परिणामों के बारे में कई विद्वानों का कहना था कि यह हमारे जीवन में मूलभूत परिवर्तन देकर जाएगा। उनका कहना सही हो...

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तीरंदाज: जीवन का यह छोर

आज वह सब मिल गया है। आसमान साफ है, फिजाएं साफगोशी से खिल रही हैं, चांद एकदम पास है और प्रकृति फिर गुनगुना रही...

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जनसत्ता तीरंदाज: सभ्यता का फूहड़पन

आज के ह्रासवाद की समस्या पुराने समय से ज्यादा जटिल है, क्योंकि इसने हमें व्यापक स्तर पर जोड़ कर कतरा-कतरा कर दिया है। इतिहास...

तीरंदाज: एक टुकड़ा धूप

उसके सवाल ने मुझे एक पल के लिए अवाक कर दिया। मैं सोच में पड़ गया। चारों ओर से घिरे होने की वजह से...

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तीरंदाज: समय के संदर्भ

पिछले कुछ सालों में ‘वाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ की शागिर्दगी जिस तरह से बढ़ी है, उससे तर्कहीन मेधा का विकास साफ नजर आता है। हम मानें...

तीरंदाज: कीड़े में तब्दील आदमी

अपने उपन्यास में काफ्का कहीं भी नहीं बताते है कि वह आदमी कीड़े में कैसे बदल गया था। बस, वह बदल गया- अचानक एक...

तीरंदाज: अर्थहीन शब्दों का शोर

शब्दों का चुनाव और उनका सही संदर्भ में उपयोग सृजनकर्ताओं को किसी और पर नहीं टालना चाहिए।

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तीरंदाजः जाति में क्या रखा है

मां ने सुझाव दिया था कि आलम का नाम बदल दिया जाए और उसको हिदायत दे दी जाए कि वह अपना धर्म अम्माजी के...

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