ताज़ा खबर
 

अश्विनी भटनागर के सभी पोस्ट

तीरंदाज: आराम बड़ी चीज है

जब व्यक्ति आराम में होता है, तो उसे कुछ नया सूझता है, उसमें नई चाहतें पैदा होती हैं, जिनसे कुछ न कुछ संतुष्टि उत्पन्न...

तीरंदाजः महाबली के दिन

नए खुलासों से साफ है कि ट्रंप के आरोपों, अपशब्दों और धमकियों के बावजूद पत्रकारिता ने अपना धर्म निभा दिया है। उसने साहब की...

तीरंदाजः उम्मीद नजर नहीं आती

चाहे वह कश्मीर का मुद्दा हो, खालिस्तान का या फिर भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध चलाने की उनकी वर्षों पुरानी मुहिम, सब अपनी जगह...

तीरंदाजः अंतर मांही गुरु

गुरु व्यक्ति नहीं, तत्त्व है जो हर व्यक्ति में निहित है। यह तत्त्व व्यक्ति को ईश्वरीय सिद्धांत और प्राकृतिक आचार से जोड़ता है। यह...

तीरंदाजः असुरक्षा का वितंडा

भारतीय महिला असुरक्षित है, कहना एक मानसिकता का परिचायक है। अक्सर बेहद सुरक्षित लोग अपने को, और दूसरों को भी, असुरक्षित मानते हैं। इस...

तीरंदाजः वली खान का सच

अंग्रेजों ने फिरकापरस्ती का उपयोग अपने राज और हुकूमत को कायम रखने के लिए किया था, पर उसका व्यापक नुकसान 1947 में हमारे देश...

तीरंदाजः लहरें गिनने वाले

विकसित और संस्कार संपन्न देशों में भी भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। इसे अपराध माना जाता है और सामाजिक पाप भी। इस धारणा के...

तीरंदाजः पहचान और पता

हम अपना ‘घर’ उसी जगह को मानते हैं, जहां हमारी यादें बसी हैं- पुश्तैनी यादें। इनके साथ जुड़े हुए हैं ‘अपने’ लोग, जिनकी हमारे...

तीरंदाज: मुक्त इच्छा से मुक्ति

निजी जीवन हो, धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर लोकतंत्र, मुक्त-इच्छा के त्याग में मोक्ष प्राप्ति निहित नहीं हो सकती है, क्योंकि भक्ति अपने...

तीरंदाजः भाषा भेद न कीजै

महात्मा गांधी ने कहा था राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। यह बात सच है। राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का...

तीरंदाज: निगहबान पूंजीवाद का अंधा कुआं

निगहबान पूंजीवाद मतदाता को बरगला कर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार कर रहा है। चुनाव को डिजिटल तरीके से फिक्स या तय करके अपने...

तीरंदाज: झूठ का बोलबाला

विचारकों ने अगाह किया है कि झूठ में लिप्त नागरिक अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति शिथिल होते जा रहे हैं और उन्होंने...

तीरंदाज: स्वाद महिमा

स्वाद से जिंदगी का हर पहलू जुड़ा हुआ है। हमारे अनुभव खट्टे-मीठे होते हैं। हम अकसर किसी घटना या आयोजन को यह कह कर...

तीरंदाज- भय से अभय की ओर

हमारी उमंग भय-मुक्त होने की भी है। धर्म से टकराव और धर्मों में टकराव का कारण हमारे भय से अभय की ओर जाने की...

तीरंदाज- हमें गांव जाना है

‘बाउजी, हमें गांव वापस जाना है। हमको गांव भिजवा दीजिए। यहां हम जी नहीं पा रहे हैं। इतने साल हो गए हैं, पर अब...

तीरंदाज- है और होने के बीच

ब्राह्मण होने से कोई हिंदू नहीं हो जाता, भाई साहब। हां, मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा जरूर हुआ था, इसलिए नाम के साथ चतुर्वेदी...

तीरंदाज- आशा नहीं रही

आशा खत्म हो गई है। कुछ अरसे से बीमार चल रही थी। बीच-बीच में ऐसा लगता था कि शायद उसकी तबीयत सुधर जाएगी, पर...

तीरंदाज- भाषण के आका

वास्तव में नेहरू की सोच की खास बात यह थी कि वह व्यक्ति से निकल कर सामाजिक इंद्रधनुष को मुखरित करती थी, उसके...