अपमान-अपराध-प्रार्थना-चुप्पी… से उपजीं वर्तिका नंदा की ये कविताएं उन रानियों ने कही हैं, जिनके पास सारे सच, पर जुबां बंद। पलकें भीगीं। सांसें भारी। मन बेदम।
इन कविताओं को समाज में बिछे लाल कालीनों के नीचे से निकाल कर लिखा गया है- सुनंदा पुष्कर का जाना, बलात्कार की शिकार निर्भया, एसिड अटैक से पीड़ित या बदबूदार गलियों में अपने शरीर की बोली लगातीं या फिर बदायूं जैसे इलाकों में पेड़ पर लटका दी गर्इं युवतियां इस संग्रह की सांसें हैं। …
ये कविताएं प्रार्थनाएं हैं, जो हर उस तीसरी औरत की तरफ से सीधे रब के पास भेजी गई हैं। जवाब आना अभी बाकी है। इसलिए यह भाव अपराध के सीलन और साजिशों भरे महल से गुजर कर निकले हैं। वे तमाम औरतें जो मारी गई हैं, जो मारी जा रही हैं या जिनकी बारी अभी बाकी है- उनकी दिवंगत, भटकती आत्माएं इनके स्वरों से परिचित होंगी।
रानियां सब जानती हैं: वर्तिका नंदा; वाणी प्रकाशन, 4695, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 225 रुपए।
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