Article 15 Movie Review and Rating: पिछले कई बरसों से भारतीय समाज में दलित चेतना का उभार हो रहा है और इसको रेखांकित करने वाली फिल्में भी बन रही हैं। अनुभव सिन्हा की फिल्म `आर्टिकल 15’ भी इसी कड़ी में है। भारतीय संविधान का `आर्टिकल 15’ ही आम भारतीय को ये कानूनी सुरक्षा देता है कि जाति या जन्म के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जाएगा। पर सच में क्या भारतीय समाज में ऐसा हो पाता है?

आए दिन ऐसी खबरें आती हैं जिनसे पता चलता है न सिर्फ जाति के आधार पर भेदभाव हो रहे हैं बल्कि आर्टिकल 15 वाले संवैधानिक प्रावधान का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन हो रहा है। अनुभव सिन्हा की फिल्म इसी को सामने लाती है। आयुष्मान खुराना इस फिल्म में अयान रंजन नाम के पुलिस अफसर बने हैं। अयान रंजन की नियुक्ति उत्तर प्रदेश के लालगांव में होती है। हालांकि ये सहज नियुक्ति नहीं है। चूंकि वो कायदे कानून का पालन करनेवाला अधिकारी है इसलिए दिल्ली में हुक्मरानों को खटकता है।

खैर, वो लालगांव पहुंच जाता है और वहां उसके सामने एक मामला आता है। दलित समुदाय की तीन लड़कियां गायब है। उनमें दो-शालू और ममता- की लाश मिलती है। पेड़ पर लटकी हुई। तीसरी गायब लड़की पूजा का कुछ अता पता नहीं। क्या हुआ था उनके साथ? क्यों दो लडकियों की हत्या की गई? क्या हत्या के पहले उनके साथ बलात्कार भी हुए? किसने किया ये सब? अयान तहकीकात के आदेश देता है। लेकिन कौन करे ये तहकीकात क्योंकि जाति संबंधी धारणाएं तो पुलिस महकमें में भी मौजूद हैं।

दलितों के बीच सामाजिक काम करने वाली गौरा (सयाना गुप्ता) अयान को बताती है कि ये लड़कियां एक ठेकेदार के यहां काम करती थीं और अपने लिए अधिक मजदूरी की मांग कर रही थी। इसी कारण ठेकेदार नाराज हो गया। क्या उस ठेकेदार को कानून अपनी गिरफ्त में लेगा? ये आसान नहीं है क्योंकि पुलिस विभाग के लोग ही दस्तावेजों में फेरबदल के लिए लगे हुए हैं। क्या अयान इन तिकड़मों की काट खोज पाएगा और अपराधियों को सजा दिलवा पाएगा?

बेशक फिल्म भारतीय समाज में मौजूद कई तरह के विद्वेषों को सामने लाती है। मुख्य रूप से युवा कथाकार गौरव सोलंकी की कहानी पर आधारित ये फिल्म उत्तर प्रदेश के बदायूं कांड और गुजरात के ऊनाकांड की याद दिलाती है। हालांकि इस तरह के वारदात देश के दूसरे हिस्सों में भी लगातार हो रहे हैं। इस तरह `आर्टिकल 15’ मौजूदा भारत समाज की उस वास्तविकता को सामने लाती है जिसमें कानूनी प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही है और कानून का पालन करने और करवाने के लिए बनीं संस्थाएं, जैसे कि पुलिस, कई तरह के कानूनी फरेब करने में लगी रहती है।

हालांकि ये भी कहना पड़ेगा कि फिल्म का पूर्वार्ध ढीला है। फिर निर्देशक ने कुछ गाने रख दिए हैं। अरे भाई जब, मसाला फिल्म नहीं बना रहे हो तो फिर बेकार के मसाले फिल्म में क्यों डाल रहे हो? कहीं ये डर तो नहीं है कि वैचारिक रूप से बेहतर होने के बावजूद फिल्म न चले? जैसा कि अनुभव सिन्हा की पिछली फिल्म `मुल्क’ के साथ हुआ था। लेकिन ये खतरा तो मोल लेना होगा। दोनों हाथों में तो लड्डू नहीं मिलते। वैसे `कहब त लाग जाई धक्क से’बोल वाला गाना बहुत अच्छा है।

बहरहाल ये फिल्म आयुष्मान खुराना के बेहतरीन अभिनय के लिए भी याद की जाएगी। साथ ही मनोज पाहवा का काम भी कमाल का है। एक ऐसा पुलिसकर्मी जो कुत्तों का तो खयाल रखता है लेकिन उसके दिल में दलित लोगों के प्रति बेशुमार घृणा भी है। मोहम्मद जीशान अयूब ने भी एक दलित एक्टिविस्ट जो भी भूमिका निभाई वो याद रखी जाएगी।

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