हिन्दू धर्म से जुड़े पौराणिक इतिहास की बात करें तो महाभारत, रामायण इसके दो प्रमुख ग्रंथ है। प्रत्येक व्यक्ति से यह भी उम्मीद की जाती है कि वह इन्हें ही आधार बनाकर अपना जीवन व्यतीत करे। महाभारत जहां चचेरे भाइयों के युद्ध, एक पत्नी की प्रतिबद्धता और कृष्ण के उपदेशों पर आधारित है। वहीं रामायण एक पत्नी के समर्पण, मर्यादाओं का पालन और बुराई के अंत से जुड़ी कथा है।

रामायण में रावण को बुराई के रूप में प्रदर्शित किया गया है, जिसे यह वरदान प्राप्त था कि उसका अंत सिर्फ एक सामान्य व्यक्ति के द्वारा ही किया जा सकता है। अपनी ताकत के घमंड में चूर रावण ने सभी बुरे कर्मों का अनुसरण करना शुरू कर दिया था। वह अपने अंत को लेकर बिल्कुल भी चिंतित नहीं था क्योंकि उसका मानना था कि वह इतना शक्तिशाली है कि कोई सामान्य मनुष्य उसके करीब आने तक का भी साहस नहीं कर सकता।

लेकिन कहते हैं कि आपके जन्म के साथ ही आपका अंत भी निश्चित होता है, जिसने जन्म लिया है उसे एक दिन देह को त्यागना ही पड़ता है। इसलिए रावण को उसके अंत से साक्षात्कार करवाने के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया। अनेक बुरे कर्मों के बावजूद रावण की पहचान शिव के सबसे बड़े भक्त के तौर पर की जाती है।

लेकिन क्या आप जानते हैं भारत का ही एक प्रदेश ऐसा है जहां शिव से भी पहले रावण की पूजा की जाती है। संस्कृति से ओत-प्रोत रंगों का प्रदेश राजस्थान भारत के एक ऐसे राज्य के रूप में जाना जाता है जहां कदम-कदम पर मंदिर और किले हैं। लेकिन राजस्थान के उदयपुर शहर से करीब 80 किलोमीटर दूरी पर स्थित भगवान कमलनाथ महादेव का मंदिर है, जहां भगवान शिव से भी पहले रावण की पूजा की जाती है। यह मंदिर स्वयं रावण ने ही बनवाया था और अगर किसी कारणवश रावण की पूजा ना की जाए तो वह पूजा ही खंडित या अधूरी मानी जाती है।

भगवान शिव और रावण से जुड़ी यह कहानी तब शुरू हुई जब अपने आराध्य देव शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण, कैलाश पर्वत पर तप करने गया था। रावण की कठोर तपस्या और एकाग्रता से शिव बहुत प्रसन्न हुए और उससे एक वर मांगने के लिए कहा। रावण ने उस वर के रूप में शिव का साथ मांग लिया और कहा कि वे उसके साथ लंका में निवास करें। शिव ने रावण की ये बात मान ली लेकिन उससे कहा कि वह वह शिवलिंग के रूप में उसके साथ लंका चलेंगे। भगवान शिव ने एक शर्त भी रखी कि जब तक लंका पहुंच नहीं जाते तब तक यह शिवलिंग जमीन को नहीं छूना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो वह शिवलिंग वहीं स्थापित हो जाएगा। बैजनाथ गांव के समीप किसी कारणवश रावण को उस शिवलिंग को एक अन्य व्यक्ति को सौंपना पड़ा।

रावण ने उसे स्पष्ट निर्देश दिया था कि उस शिवलिंग को जमीन पर ना रखे। जैसे ही रावण उस व्यक्ति की दृष्टि से ओझिल हुआ, उसने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया और स्वयं गायब हो गया। जब रावण वापस आया तो उसने देखा कि शिवलिंग जमीन पर पड़ा है और वह आदमी भी मौजूद नहीं है। रावण ने उस शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह शिवलिंग अपने स्थान से हिला तक नहीं। ये सब देखकर करीब 12 साल तक रावण ने घोर तप किया और अपने 10 शीश शिव के चरणों में अर्पण कर दिए रावण के समर्पण से शिव बहुत प्रसन्न हुए, उन्होंने रावण को उसके दस शीश लौटा दिए लेकिन शिवलिंग फिर भी वहीं स्थापित रहा। आज भी इस मंदिर को कमलनाथ महादेव के नाम से जाना जाता है और जब तक यहां रावण की पूजा संपन्न नहीं होती, तब तक शिव की आराधना भी पूरी नहीं होती।