Makar Sankranti (Til Sankranti) 2020 Puja Vidhi, Vrat Katha, Samagri, Mantra: मकर संक्रांति पर्व सूर्य के मकर राशि में गोचर करने पर मनाया जाता है। ये एक ऐसा त्योहार है जो लगभग पूरे देश में मनाया जाता है बस इसके नाम अलग अलग हैं। उत्तर भारत में इसे संक्रांति, पंजाब हरियाणा में लोहड़ी, असम में बिहू और दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से जाना जाता है। इस दिन सूर्य भगवान उत्तरायण होते हैं। मान्यता है कि इस दिन से देवताओं के दिन शुरू हो जाते हैं। इस खास पर्व पर लोग सूर्यदेव को खिचड़ी का भोग लगाते हैं और पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। इस पर्व पर पतंग उड़ाने का भी महत्व है। जानिए इस पर्व की पौराणिक कथा…
मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त:
मकर संक्रांति 2020- 15 जनवरी
संक्रांति काल- 07:19 बजे (15 जनवरी)
पुण्यकाल-07:19 से 12:31 बजे तक
महापुण्य काल- 07:19 से 09: 03 बजे तक
संक्रांति स्नान- प्रात: काल, 15 जनवरी 2020
मकर संक्रांति व्रत कथा 1: पुरानों में जो कथा वर्णित है उसके अनुसार मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य देव अपने पुत्र शनि से मिलने उनके घर जाते हैं। चूंकि शनि मकर राशी के देवता हैं इसी कारन इसे मकर संक्रांति कहा जाता हैं। इसके अलावा संक्रांति की कथा के विषय में महाभारत में भी वर्णन मिलता है। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के महान योद्धा और कौरवों की सेना के सेनापति गंगापुत्र भीष्म पितामह को इच्छा मुत्यु का वरदान प्राप्त था। अर्जुन के बाण लगाने के बाद उन्होंने इस दिन की महत्ता को जानते हुए अपनी मृत्यु के लिए इस दिन को निर्धारित किया था। भीष्म जानते थे कि सूर्य दक्षिणायन होने पर व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त नहीं होता और उसे इस मृत्युलोक में पुनः जन्म लेना पड़ता हैं। महाभारत युद्ध के बाद जब सूर्य उत्तरायण हुआ तभी भीष्म पितामह ने प्राण त्याग दिए।
मकर संक्रांति व्रत कथा 2: एक धार्मिक मान्यता के अनुसार संक्रांति के दिन ही मां गंगा स्वर्ग से अवतरित होकर राजा भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई गंगासागर तक पहुँची थी। धरती पर अवतरित होने के बाद राजा भागीरथ ने गंगा के पावन जल से अपने पूर्वजों का तर्पण किया था। इस दिन पर गंगा सागर पर नदी के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता हैं।


शास्त्रों में बारह संक्रान्तियां सात प्रकार की, सात नामों वाली हैं, जो किसी सप्ताह के दिन या किसी विशिष्ट नक्षत्र के सम्मिलन के आधार पर उल्लिखित हैं। रविवार को घोरा, सोमवार को ध्वांक्षी, मंगलवार को महोदरी, बुधवार को मंदाकिनी, गुरुवार को मन्दा, शुक्रवार को मिश्रिता एवं शनिवार को पड़ने वाली संक्रांति को राक्षसी कहा गया है।
इस अवसर पर देश के कई पवित्र घाटों पर आस्था का मेला लगा हुआ है। यहां आस्था की डुबकी लगाने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा हुआ है। प्रयागराज, ऋषिकेश, वाराणसी में लोग स्नान के लिए पहुंचे हैं।
सर्दी के मौसम में वातावरण का तापमान बहुत कम होने के कारण शरीर में रोग और बीमारियां जल्दी लगती हैं इसलिए इस दिन गुड़ और तिल से बने मिष्ठान्न या पकवान बनाए, खाए और बांटे जाते हैं। इनमें गर्मी पैदा करने वाले तत्वों के साथ ही शरीर के लिए लाभदायक पोषक पदार्थ भी होते हैं। उत्तर भारत में इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बांटा जाता है।
इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं।
उत्तरायण प्रारंभ : सौर मास के दो हिस्से है उत्तरायण और दक्षिणायण। सूर्य के मकर राशी में जाने से उत्तरायण प्रारंभ होता है और कर्क में जाने पर दक्षिणायन प्रारंभ होता है। इस बीच तुला संक्रांति होती है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं। इस दिन से दिन धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है।
प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ 'रामचरित मानस' के आधार पर श्रीराम ने अपने भाइयों के साथ पतंग उड़ाई थी। इस संदर्भ में 'बालकांड' में उल्लेख मिलता है-
'राम इक दिन चंग उड़ाई।
इन्द्रलोक में पहुंची जाई।।'
बड़ा ही रोचक प्रसंग है। पंपापुर से हनुमानजी को बुलवाया गया था, तब हनुमानजी बालरूप में थे। जब वे आए, तब 'मकर संक्रांति' का पर्व था। श्रीराम भाइयों और मित्र मंडली के साथ वे पतंग उड़ाने लगे। कहा गया है कि वह पतंग उड़ते हुए देवलोक तक जा पहुंची।
शास्त्रों में वर्णित एक अन्य कथा के अनुसार माता यशोदा ने संतान प्राप्ति के लिए मकर संक्रांति के दिन व्रत रखा था। इस दिन महिलाएं तिल, गुड आदि दूसरी महिलाओं को बांटती हैं। ऐसा माना जाता हैं कि तिल की उत्पत्ति भगवान् विष्णु से हुई थी। इसलिए इसका प्रयोग पापों से मुक्त करता है। तिल के उपयोग से शरीर निरोगी रहता है और शरीर में गर्मी का संचार होता है।
कई लोग संक्रांति के दिन व्रत रखते हैं। हिंदू धर्म में इस दिन को बेहद ही पवित्र माना गया है। इस दिन तिल को पानी में मिलाकर स्नान करना चाहिए अगर संभव हो तो पवित्र नदीं में स्नान जरूर करें। इसके बाद सूर्य भगवान की अराधना करें। इस दिन पितरों का तर्पण करना भी फलदायी माना गया है। सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए इन मंत्रों का जाप करें...
1- ऊं सूर्याय नम: ऊं आदित्याय नम: ऊं सप्तार्चिषे नम:
2- ऋड्मण्डलाय नम: , ऊं सवित्रे नम: , ऊं वरुणाय नम: , ऊं सप्तसप्त्ये नम: , ऊं मार्तण्डाय नम: , ऊं विष्णवे नम: