चेतनादित्य आलोक

माघ महीने में ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा सुनने का भी बड़ा महत्त्व है। इनके अतिरिक्त माघ महीने में पुराण मुख्य रूप से इन पांच कार्यों के करने का निर्देश देते हैं- कल्पवास, स्नान, दान, सत्संग और स्वाध्याय। पुराणों के अनुसार इन पांचों कार्यों के करने से व्यक्ति को सभी पापों से छुटकारा तो मिलता ही है, उसके संकटों का नाश भी होता है और मनोवांछित सुख की प्राप्ति होने के कारण जीवन में खुशहाली भी आती है।

1-कल्पवास
माघ महीने में कल्पवास करने का बड़ा महत्त्व है। हिंदू धर्म में प्रधानत: तीर्थराज प्रयाग में संगम के तट पर कुटिया बनाकर निवास करने की प्रथा को ‘कल्पवास’ कहा जाता है, जहां पर साधु-संतों के सान्निध्य में व्रत, तप, उपवास, संत्संग और स्वाध्याय इत्यादि करने का अवसर प्राप्त होता है।

हालांकि कल्पवास के लिए तीर्थराज प्रयाग के संगम-तट का होना अपरिहार्य नहीं है, बल्कि कल्पवास तो ऐसे किसी भी स्वच्छ जल से युक्त नदी के तट पर किया जा सकता है, जहां पर साधु-संतों का सान्निध्य प्राप्त हो सके। कल्पवास का समय पौष महीने के ग्यारहवें दिन से माघ महीने के बारहवें दिन तक रहता है। वैसे कुछ लोग माघ पूर्णिमा तक कल्पवास करते हैं।

2-स्नान
माघ महीने में विशेष रूप से माघ पूर्णिमा को संगम में स्नान करने का बहुत महत्त्व है। यदि संगम में स्नान करना संभव न हो तो गंगा, गोदावरी, कावेरी, नर्मदा, कृष्णा, क्षिप्रा, सिंधु, सरस्वती, ब्रह्मपुत्र आदि जैसी किसी भी पवित्र नदी में स्नान किया जा सकता है।

3-दान
माघ महीने में दान करने का भी बड़ा महत्त्व है। वेदों में तीन प्रकार के दान बताए गए हैं- उत्तम, मध्यम और निकृष्ट। इसी प्रकार पुराणों में दान के विभिन्न प्रकारों का वर्णन मिलता है, जिनमें अन्नदान, विद्यादान, अभयदान और धनदान मुख्य रूप से उल्लेखनीय हैं, क्योंकि इन्हें दानों में श्रेष्ठ माना गया है। शास्त्र ऐसे दानों को पुण्यदायी बताते हैं।

वैसे स्वार्थरहित हो श्रद्धा भाव से किया गया दान ही सभी दानों में सर्वश्रेष्ठ होता है। शास्त्रों के अनुसार दान करने से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटतीहै, जिससे व्यक्ति को मृत्युकाल में बड़ा लाभ मिलता है।

4-सत्संग
माघ महीने में मंदिरों, आश्रमों और नदी-तटों पर पारंपरिक रूप से सत्संग एवं प्रवचन के अतिरिक्त माघ महीने के माहात्म्य तथा पुराण कथाओं आदि का आयोजन किया जाता है। आचार्य विद्वानों एवं साधु-संतों द्वारा धर्माचरण की शिक्षा देने वाले विविध प्रसंगों का श्रोताओं के समक्ष वर्णन किया जाता है। सत्संग के दौरान कथा प्रसंगों के माध्यम से भक्तों के तन-मन का स्वास्थ्य तो संवरता ही है, उन्हें धर्म का ज्ञान भी मिलता है, जिससे व्यावहारिक जीवन की तमाम विपत्तियों और बाधाओं से दो-दो हाथ करने का संबल और समाधान प्राप्त होता है।

5-स्वाध्याय
स्वाध्याय के अभ्यास से वैचारिक स्पष्टता और आत्मविश्वास आता है, तो जीवन में अनुशासन की मात्रा में भी वृद्धि होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो स्वाध्याय के अभ्यास से व्यक्ति के मन से नकारात्मक विचारों का नाश होता है। जाहिर है कि इस प्रक्रिया से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।जो कालांतर में व्यक्ति के उतरोत्तर विकास का कारण साबित होता है। इस प्रकार माघ के महीने का न केवल धार्मिक-आध्यात्मिक रूप से, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी बड़ा महत्व है।