हिन्दू धर्म में अपनी आस्था रखने वाला हर व्यक्ति धर्म की अधिक से अधिक जानकारी अपने पास रखना चाहता है। इसके लिए वह बराबर धर्म से संबंधित किसी अच्छी पुस्तकों को पढ़ता है। साथ ही किसी योग्य गुरु के सनिध्य में रहता है। अथवा किसी अच्छे प्रवचन कर्ता का प्रवचन सुनता है। मनुष्य प्रवचन कर्ता और किसी योग्य गुरु के सनिध्य में अपने ज्ञान को और अधिक बढ़ता है। ऐसे ही एक प्रवचनकर्ता हैं जया किशोरी।
जया किशोरी जी ने अपने एक प्रवचन में कहा है कि धर्म आस्था रखने वाले हर इंसान को धर्म की ये पांच बातें जाननी चाहिए। आगे जया किशोरी जी के प्रवचन से ये खास बातें जानते हैं। प्रवचन में जया किशोरी जी ने कहा है कि नारद की के अनुसार वैसे तो धर्म के 30 लक्षण हैं लेकिन उनमें से जो पांच लक्षण हैं वे बेहद खास हैं। जिसे रोजाना करने से धर्म को बचाकर रखा सकते हैं। वहीं यदि इन पांच लक्षणों को मनुष्य अपने जीवन में नहीं उतारा तो बाकी जो बड़े-बड़े लक्षण हैं उसे अपनाने से भी कोई लाभ नहीं होने वाला है।
सबसे पहला लक्षण जया किशोरी जी ने सत्य को बताया। आगे उन्होंने कहा कि मनुष्य को सत्य की राह कभी नहीं छोड़नी चाहिए। जया किशोरी जी ने राजा हरिश्चंद्र का उदाहरण देते हुआ बताया कि जिस प्रकार हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी का त्याग करके भी सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ा, ठीक उसी प्रकार अन्य मनुष्य को भी अपने जीवन में सत्य का आधार लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
दूसरा लक्षण उन्होंने दया को बताया। उन्होंने कहा कि आज लोगों के भीतर में दया का भाव नहीं रहा है। इसका उदाहरण देते हुए जयकिशोरी जी ने कहा कि यदि कोई कष्ट और पीड़ा में है तो लोग उसकी मदद नहीं करते हैं। कुछ लोग तो इससे भी अधिक क्रूरता का काम करते हैं। वे कष्ट से पीड़ित व्यक्ति की मदद तो नहीं करते लेकिन वहां खड़ा होकर वीडियो बनाते हैं। इनका कहना है इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।
धर्म का तीसरा लक्षण उन्होंने पवित्रता को बताया है। जिस घर में जितनी पवित्रता रहती है उस घर में लक्ष्मी आती है। वहीं जिस घर में अपवित्र रहती हैं वहां लक्ष्मी का आगमन भी नहीं होता है। साथ ही अपवित्रता वाले स्थान पर दरिद्रता का आगमन होता है। इस लिए घर में पवित्रता रखनी चाहिए।
जया किशोरी जी ने अपने प्रवचन में चौथा लक्षण तपश्चर्या को बताया। उन्होंने कहा कि जितनी शरीर की पवित्रता आवश्यक है उससे कहीं अधिक मन, वचन और कर्म को पवित्र रखना चाहिए। इसे ही उन्होंने तपश्चर्या कहा। मनुष्य को अपनी वाणी को हमेशा पवित्र रखना चाहिए।
कथा के अंत में जया किशोरी जी ने धर्म का पांचवां लक्षण तीतीक्षा को बताया। इस पर उन्होंने आगे बताया कि भगवान जो भी दे उसे प्रसाद समझकर ग्रहण करना चाहिए। भगवान का दिया हुआ दुख और संकट को भी प्रसाद स्वरूप ही स्वीकार करना चाहिए।

