मणिकर्णिका घाट पर सुबह बहुत जल्दी हलचल शुरू हो जाती है। कहीं मंत्रोच्चार की धीमी आवाज़, कहीं शोक में डूबी आँखें, तो कहीं गंगा की लहरों पर टिकती नज़रें। सदियों से यह घाट जीवन की अंतिम यात्रा का साक्षी रहा है। काशी में जन्म लेना सौभाग्य माना जाता है और मणिकर्णिका में अंतिम संस्कार – मोक्ष का द्वार। लेकिन समय के साथ इस पवित्र स्थल पर चुनौतियाँ भी बढ़ती चली गईं।

बरसात के दिनों में गंगा का जल सीढ़ियों तक आ जाता था। तंग गलियों में शवयात्राएँ अटक जाती थीं। कई बार जगह की कमी और लकड़ी के खर्च के कारण अधजली चिताएँ रह जाती थीं। इससे न केवल वातावरण प्रदूषित होता था, बल्कि शोकाकुल परिवारों के लिए यह दृश्य और पीड़ा बढ़ा देता था। यह आस्था पर सवाल नहीं था, बल्कि व्यवस्था की सीमा थी।

यहीं से बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई- बिना परंपरा से छेड़छाड़ किए, गरिमा को बनाए रखते हुए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस समस्या को केवल धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय और पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखा। उनके मार्गदर्शन में यह तय किया गया कि मणिकर्णिका घाट पर होने वाला विकास सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि CSR फंड के माध्यम से हो—ताकि आस्था से जुड़े इस संस्कार पर किसी प्रकार का राजनीतिक या आर्थिक बोझ न पड़े। उद्देश्य साफ था: अंतिम विदाई सम्मानजनक हो, स्वच्छ हो और पर्यावरण के अनुकूल हो।

इस सोच को ज़मीन पर उतारने में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका निर्णायक रही। राज्य सरकार ने स्थानीय परंपराओं, डोम समुदाय और पुरोहितों से संवाद करते हुए यह सुनिश्चित किया कि किसी की आस्था या आजीविका प्रभावित न हो। मुख्यमंत्री के निर्देश पर यह स्पष्ट किया गया कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा—सरकार केवल सुविधा प्रदाता की भूमिका में रहेगी।

आज घाट पर जो बदलाव दिख रहा है, वह इसी संतुलन का परिणाम है। बाढ़ के स्तर से ऊपर प्लेटफॉर्म बनाए जा रहे हैं, ताकि बरसात में भी अंतिम संस्कार सुरक्षित रूप से हो सके। खुले और कवर्ड दाह-स्थल अलग-अलग विकसित किए जा रहे हैं। धुएँ और गैसों को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग हो रहा है, जिससे आसपास के मोहल्लों में प्रदूषण न फैले। लकड़ी भंडारण, शवयात्रा मार्ग और श्रद्धालुओं की आवाजाही—सब कुछ व्यवस्थित किया जा रहा है।

यह केवल इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी नहीं है। यह उस माँ की कहानी भी है, जो चाहती है कि अपने बेटे को आखिरी विदाई सम्मान के साथ दे सके। यह उस डोम परिवार की कहानी है, जिसकी सदियों पुरानी भूमिका को सम्मान के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। और यह उस शहर की कहानी है, जो अपनी आत्मा को बचाते हुए समय के साथ चलना सीख रहा है।

मणिकर्णिका घाट आज भी वही है – जहां जीवन और मृत्यु आमने-सामने खड़े होते हैं। फर्क बस इतना है कि अब इस अंतिम क्षण में शोक के साथ अव्यवस्था नहीं, बल्कि गरिमा, स्वच्छता और शांति का एहसास भी जुड़ गया है। यही आस्था और विज्ञान का वह संगम है, जो काशी को अविनाशी बनाए रखता है।