कथक नृत्यांगना उमा शर्मा ने कथक नृत्य को सीखा ही नहीं है, बल्कि उन्होंने इसे जीया है। वह पिछले कई सालों से राजधानी दिल्ली में शरद पूर्णिमा को महारास, स्वामी हरिदास तानसेन संगीत नृत्य समारोह, जन्माष्टमी समारोह, गालिब की याद में कई समारोह करती रही हैं। वे बताती हैं कि कथक नृत्य में नटराज और नटनागर का तांडव और लास्य का समागम है। उमा कहती हैं कि मेरे पिता संस्कारी ब्राम्हण थे। वे संस्कृत विलान थे। संस्कृत में साहित्य रचना करते थे। माताजी कृष्ण भक्त थीं। वे अपना समय भगवान की सेवा में बिताया करती थीं। शायद, उनकी भक्ति और शक्ति का प्रभाव मुझ पर पड़ा और मैैं रास और कथक को लेकर सोचने-विचारने लगी। मैंने शरद पूर्णिमा को कथक और रास का समायोजन करके महारास नृत्य रचना की। दो पूर्णिमा-शरद पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा के दौरान महाराज होता है। इसके लिए मैंने श्रीमद्भागवत के दसवें अध्याय का विशद अध्ययन किया। जयदेव को पढ़ा। सूरदास की रचनाओं और सूरसागर को पढ़ा। जब महारास नृत्य का आयोजन किया तब उसे देखने कलाविद् कमलादेवी चट्टोपाध्याय, डॉ कपिला वात्स्यायन, मेरे दोनों गुरुओं ने देखा। उसके बाद कमलोदवीजी ने कहा कि उमा! इस नृत्य रचना को हमेशा करती रहना। मेरे उस नृत्य को देखकर मेरे गुरुओं के आंखों में आंसू आ गए थे।

उमा ने वृंदावन में रास नृत्य की शिक्षा स्वामी लाड़ली शरणजी से ली। उनदिनों निधि वन के मंदिर में मैं सारे दिन बैठी रहती थी। वहां मैं भगवान की अष्टजाम सेवा को देखती थी।
मैंने महसूस किया कि मंदिर में बैठने से बहुत शांति और सुकून मिलता था। फिर, निधि वन के पेड़ों को निहारती। उन्हें देखकर एक अजीब-सा अहसास होता था। कभी-कभी लगता था कि कृष्ण की बांसुरी कहीं आस-पास बज रही है। वहीं से प्रेरित होकर मैंने कृष्ण लीला पर आधारित नृत्य रचना की। उमा कहती हैं कि सुना है कि स्वामी हरिदासजी को तो भगवान कृष्ण के साक्षात दर्शन हुए थे।

उनकी समाधि और मंदिर निधि वन के पास है। वहां उनकी खड़ाऊं, लाठी, माला सब सुरक्षित रखे गए हैं। वे कहते हैं कि आज भी निधि वन में भगवान रास करते हैं। रात में वहां कोई नहीं जाता है। सच तो यह है कि रास तो कथक नृत्य की जननी है। शायद, तभी मेरे गुरुजी शंभू महाराज इसे नटवरी कथक नृत्य कहते थे-नटवरी यानी नटवर का नृत्य यानी कृष्ण का नृत्य। कृष्ण की गोवर्धन लीला, माखन चोरी, गोपियों की वस्त्र चोरी, गोपियों से छेड़छाड़ ये सारे भाव तो कथक में गुरु लोग दिखाते रहे हैं और यही रास के कलाकार भी करते आए हैं। कथक और रास के अथाह सागर में जब गहरे उतरती हूं तब खुद को तलाशती हूं। सोचती हूं-मैं कहां पहुंची हूं, आधे रास्ते में हूं, मंजिल तक पहुंचने वाली हूं। यह सफर अभी लंबा है।

स्वामी हरिदास महान कृष्ण भक्त थे। उनका संगीत और जीवन उनके प्रिय भगवान कृष्ण को समर्पित था। उनके पद आज भी वृंदावन और मथुरा के मंदिरों में ठाकुरजी की सेवा में भक्त गाते हैं। उनके शिष्य बैजू बावरा और तानसेन ने भी बंदिशों और ध्रुपदों की रचना की। गुरु-शिष्य के ऐसे आदर्श ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनसे प्रेरित होकर मैंने स्वामी हरिदास तानसेन संगीत नृत्य महोत्सव का आयोजन दिल्ली में शुरू किया।  इस महोत्सव में मैं देश के नामी कलाकारों को प्रस्तुति के लिए बुलाती हूं ताकि लोगों को घरानेदार और उच्चकोटि का संगीत सुनने को मिले। मैं समझती हूं कि यह सिर्फ एक समारोह भर नहीं है, बल्कि यह कलाकारों का समागम है।